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-साइबर ट्रैप-

“ OMG कहाँ थे यार ? ”  “ थोड़ा बिजी था, तुम सुनाओ, एनीथिंग न्यू,? हाउ आर यू ?कैसा चल रहा है तुम्हारा काम” “K”  “मतलब?”  “ओके...शार्ट फॉर्म K”  “हा हा हा, तुम और तुम्हारे शार्ट फॉर्म्स”  “हा हा हा को तुम LOL भी लिख सकते हो,मतलब- लाफिंग आउट लाउड”  “हाँ हाँ वही LOL”  “ पर एक पहेली अब तक नहीं सुलझी, अब टालो नहीं बता दो”  “KP”  “मतलब?”  “कौन पहेली... हा हा हा”  “मतलब कुछ भी शॉर्ट”  “और क्या?”  “ओके मुझे बहस नहीं करनी। अब पहेली बुझाना बंद करो और जल्दी से ऑनलाइन वाला नाम छोड़कर अपना ‘रियल नेम’ बताओ?”  “दि रॉकस्टार”   “उहुँ ये तो हो ही नहीं सकता, कुछ तो रियल बताओ, ना चेहरा दिख रहा, न नाम रियल”   “ हा हा हा, तुम तो बस मेरे नाम के पीछे ही पड़ गई हो! अरे बाबा ये तो बस फेसबुक के लिए है, जैसे तुम्हारा नाम ‘स्वीटी मनु’ वैसे मेरा नाम ”  “ तो तुम्हारा असली नाम क्या है?” “असलियत फिर कभी, बाय”  “बाय ! हमेशा ऐसे ही टाल जाते हो, कह देती हूँ अगर अगली बार तुमने अपना असली नाम नहीं बताया और अपना चेह...

शायरी का जादूगर : साहिर

“उफ़क के दरीचे से किरणों ने झांका फ़ज़ा तन गई, रास्ते मुस्कुराए सिमटने लगी नरम कुहरे की चादर जवान शाख्सारों ने घूँघट उठाए परिंदों की आवाज़ से खेत चौंके पुरअसरार लै में रहट गुनगुनाए वो दूर एक टीले पे आँचल सा झलका तसव्वुर में लाखों दिए झिलमिलाये” साहिर, जिनका नाम बीसवीं सदी के महान शायरों में शुमार है, आज चर्चा शायरी के जादूगर साहिर लुधियानवी की। उर्दू के अज़ीम शायर साहिर लुधियानवी का जन्म पंजाब के लुधियाना में 8 मार्च 1921 को हुआ था। उनका पूरा नाम अब्दुल हई था। साहिर ने अपनी मैट्रिक तक की पढ़ाई लुधियाना के खालसा स्कूल से पूरी की। कॉलेज के कार्यक्रमों में वह अपनी गजलें और नज्में पढ़कर सुनाया करते थे जिससे उन्हें काफी शोहरत मिली। चार सालों तक लुधियाना कॉलेज में अध्ययन के बाद साहिर लुधियानवी को 1941 में कॉलेज छोड़ने के लिए कह दिया गया। उनके करीबी बताते हैं कि दो घटनाओं की वजह से ही साहिर को कॉलेज से निष्कासित किया गया था। 1941 में साहिर छात्र संगठन के अध्यक्ष थे और उनका लेखन अंग्रेजी सरकार के खिलाफ हुआ करता था हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उनके प्रेम प्रसंग की चर्चा की वज...

लता मंगेशकर से जुड़ाव

लता मंगेशकर के गीतों से पहला परिचय कब हुआ याद नहीं। मम्मी अक्सरहा उनके गीत गुनगुनाती थीं। तब किसी के गाने की तारीफ करते हुए यही कहा जाता था कि वह तो एकदम लता मंगेशकर की तरह गाती है, यानी लता मंगेशकर संज्ञा से विशेषण बन चुकी थीं।  गर्मी की उमस भरी रातों को छत पर पानी का छिड़काव होता, फिर सोने के लिए गद्दे बिछाए जाते। खाना खाने के बाद हम सभी छत पर चले जाते। टिमटिमाते तारों से भरे खुले आसमान के तले मम्मी और हम सभी बच्चे लेट जाते, फिर शुरू होता गाने का सिलसिला। मम्मी को लता मंगेशकर और मुकेश के गाने विशेष तौर पर पसंद थे। चाँद, तारे, हवा, बादल - किसी पर भी गाने का सिलसिला शुरू होता तो बस चलता रहता। कभी मन हुआ तो अंत्याक्षरी भी शुरू हो जाती।  जब पहली बार टेपरिकॉर्डर आया तो साथ में लता मंगेशकर और मुकेश के गानों का कैसेट भी आया। पहली बार लता जी के लिए 'दी' का सम्बोधन भी मम्मी से ही सुनी थी। तब ज़्यादा उम्र नहीं थी अल्प बुद्धि थी, मैंने मम्मी से पूछा भी था 'वह तुम्हारी दीदी हैं क्या?' मम्मी हंसते हुए बोली थीं 'हाँ'। 'नैना बरसे रिमझिम', 'झूम झूम ढलती ...

नीला गुलमोहर (कहानी)

1. मौसम बदलने लगा है। मौसम बदलने का पता तब चलता है जब खरीदारों की फूलों को लेकर पसंद बदलने लगती है, जैसे अक्टूबर-नवंबर में पिटूनिया, कैलेंडुला, गेंदा के खरीदार बढ़ जाते हैं तो गर्मियों में उड़हुल, सूरजमुखी, डहेलिया को खरीदने वालों की तादाद बढ़ जाती है।  कुछ फूल सालों भर बिकते हैं तो कुछ मौसमानुसार। यूँ तो मुझे सभी मौसम पसंद है,  पर बरसात और बसंत विशेष प्रिय है। ये मौसम होते हैं जब फूलों की महक सारे गिले-शिकवे, दुःख-कष्ट से हमें दूर ले जाती है। जिन पौधों में साल के अन्य महीनों में फूल नहीं लगते हों वे भी इन महीनों में पल्लवित-सुभाषित हो उठते हैं। रंग-बिरंगे फूलों को देख कितनी ही कल्पनाएं साकार हो उठती हैं। ये फूल कभी झालर तो कभी कंगूरे, कभी बिंदिया तो कभी झुमके से दिखते हैं। बचपन में बड़ी पत्तियों वाले फूलों को नाखून पर लगाकर उन्हें किनारे से बारीकी से कुतरकर नेल पॉलिश-सा सजाकर कितना आनंद आता था। कनेर के पीले-गुलाबी फूलों को उंगलियों में लगाकर लंबे नाखूनों की चाहत पूरी हो जाया करती थी।  रंग छोड़ते लाल-गुलाबी छोटे-छोटे नौ-बजिया और दस-बजिया फूलों को गालों-होठों  पर रगड़कर लिप...

एक कहानी यह थी...

  उन दोनों की वह पहली मुलाकात थी। पहली मुलाकात में ही उसने, इसे "एक इंच मुस्कान" पढ़ने के लिए दी, साथ ही यह आदेश भी कि इसे पढ़ो फिर इसपर चर्चा करेंगे। इसने पहले भी मन्नू भंडारी की कहानियां पढ़ी थीं, महाभोज नाटक भी देखा था, पर कभी चर्चा करने के नज़रिए से नहीं। सच कहूँ तो ये चर्चा शब्द से ही घबराती थी...कविताओं से तो फिर भी पहचान थी...पर कहानियां और उपन्यास, उनसे अभी सही में परिचय होना बाकी था... प्रगाढ़ता तो दूर की बात थी। "एक इंच मुस्कान" अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि अगला आदेश "एक कहानी यह भी" पढ़ने का मिल गया। दोनों पुस्तक का अध्ययन और चर्चा समानांतर चलती रही।  ये इसकी मन्नू भंडारी के लेखन को नए सिरे से समझने की शुरुआत थी और लेखन की भी...। इसके लिए मन्नू भंडारी न जाने कब प्रेरणा बन गई, उनकी सामान्य भाषा में लिखी कहानियां कब ज़ेहन में उतर चलीं एहसास ही नहीं हुआ। हौले से छूकर निकल जाने वाली मखमली भाषा, स्त्री मन को सहजता से शब्दबद्ध करती लेखनी...ज्यों-ज्यों मन्नू भंडारी की कहानियों से इसकी नजदीकियां बढ़ती गईं ये दोनों भी करीब आते गए। फिर तो इसने मन्नू भंड...

'आएशा' के बहाने से...

2010 में एक फ़िल्म आयी थी 'धोबी घाट'। चार किरदारों वाली इस फ़िल्म का एक किरदार मर चुकी हुई यास्मीन होती है जिसकी  वीडियो डायरी के ज़रिए उसकी कहानी आगे बढ़ती है।  पति की बेवफाई से तंग आकर अंतिम वीडियो में वह खुदकुशी कर लेती है। सारे किरदार अनूठे थे पर यास्मीन, नहीं होकर भी उसकी उपस्थिति...मार्मिक अंत...दुखद था।  दो-तीन दिनों से आएशा का वीडियो देख रही जो वायरल है। आत्महत्या से पहले रिकॉर्ड की गई बातें। क्या अच्छा नहीं होता आएशा ऐसे ही वीडियो के ज़रिए अपने पति को एक्सपोज़ करती। उसे सजा दिलवाती। तुमने ये वाला रास्ता क्यों चुना आएशा? जाने क्यों आएशा के इस वीडियो को देखकर मुझे धोबी घाट की यास्मीन याद आ गयी। फ़िल्म तो सिर्फ दो-तीन घण्टे में खत्म हो जाती है और वास्तविक घटनाएं जीवन भर का मलाल दे जाती हैं।  आएशा कितनी अकेली होगी, कितना परेशान रही होगी, जो उसने उसका चुनाव किया जिसका अधिकार हमें नहीं है। आएशा...काश! तुम ने खुद को थोड़ा और वक़्त दिया होता। आएशा की वीडियो

दिल्ली की एक उदास सुबह

उदास सिर्फ मनुष्य ही नहीं होते. पशु-पक्षी-पेड़-पौधे सब पर उदासी छाती है. सभी मातम मनाते हैं . फिजाएं भी अपनी रौनक खो देती है. धरती और प्रकृति के लिए भले ही साँस लेना आसान हुआ हो पर वह प्रसन्न तो हरगिज़ नहीं है. यह महसूस किया जा सकता है. पूरे  20 दिन बाद आज सुबह 7 बजे ऑफिस के लिए निकली थी. इन 20 दिनों में मेरी ज़िन्दगी, मेरे फ्लैट तक सिमट कर रह गयी थी. ज़रूरत पड़ने पर नीचे स्थित किराने की दूकान में जाना हो रहा था.  20 दिनों बाद मुख्य सड़क पर निकलना...जैसे सारे रास्ते अजनबी हो गए हों. दिल्ली की सुबह कभी इतनी खामोश नहीं देखी. न ट्रैफिक की मारामारी, न किसी तरह की चिल्ल पौं थी. जगह-जगह बैरीकेडिंग. पिछले 20 दिनों में काफी कुछ है जो बदल गया है. 'कोविड 19' ने न सिर्फ लोगों की रहन-सहन को बदल दिया है, बल्कि सोचने समझने की शक्ति में भी बदलाव आया है. सभी 'भय और शक' की गिरफ्त में हैं. सभी किसी उहापोह में जी रहे . घर पर सबकुछ है  पर फिर भी ख़ुशी नहीं. आज से 20 दिन पहले सेमल के वृक्ष लाल फूलों से लदे थे. आज वे ठूंठ से रह गए हैं, कुछ वृक्षों में फूलों का स्थान हरी-ज़र्द पत्तियों ने ल...