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गोरा

इ न दिनों दूरदर्शन पर धारावाहिक   "गोरा"  देख रही हूँ।  सप्ताह में दो दिन आता है और तीन हफ्ते से मैं इसे देख रही हूँ .... ना कोई हल्ला - गुल्ला, ना ही तेज़ संगीत और ना ही एक ही दृश्य का बार - बार   दोहराव।  पार्श्व संगीत में बाउली  गायकों की सुमधुर  आवाज़ और बांगला संगीत बहुत ही  कर्णप्रिय लगते है। हालांकि तकनिकी खामियां इस धारावाहिक में नज़र आती है लेकिन ये उपन्यास मुझे इतना प्रिय है की उन खामियों के बावजूद मैं खुद को उन्हें देखने से नहीं रोक पाती।   रविन्द्र नाथ टैगोर की लिखी हुई इस किताब का हिंदी अनुवाद पढने का मौका मिला जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी ... और तब से आज तक मैं ना ही उस उपन्यास को और ना ही उसके मुख्य चरित्र को भूल पायी हूँ।   "गोरा" को पढ़ते हुए उस चरित्र की कल्पना अनायास ही हो जाया करती थी हालांकि धारावाहिक के चरित्र और उसमे कोई समानता नहीं है।  इस धारावाहिक की एक और खासियत है की इसके एक - एक डायलोग को आप सुन सकते हैं .... बस यहाँ भी ब्रेक का झमेला है जो बीच बीच में धारावाहिक की एकाग्रता तोड़ देता...