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Showing posts from 2022

कच्चे प्रेम की कच्ची दास्तां

मैं इस पर कुछ लिखना नहीं चाहती थी पर ये तस्वीरें बार - बार लिखने के लिए दबाव बना रही थीं। सोशल मीडिया पर प्रेम में डूबे युगलों की तस्वीरें देख कर सच में ये तय कर पाना मुश्किल है कि इनमें कौन सी तस्वीर सच्ची है और कौन सी झूठी। एक तस्वीर और ट्वीट का हवाला देकर ही सुष्मिता सेन की शादी की खबर सुर्खियां बटोर ली। सोशल मीडिया के सच और वास्तविकता में कितना अंतर है इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो श्रद्धा और आफताब की ये तस्वीर ही हैं। सोशल मीडिया पर प्रेम की तस्वीरें, रील और वास्तविक जीवन में हत्या, शव को 35 टुकड़ों में बांटने जैसा वीभत्स कार्य, उसे फेंकने का दुस्साहस... अविश्वसनीय...पर सच।   आफताब ने अपनी लिव-इन पार्टनर श्रद्धा की हत्या कर दी। उस के शव के 35 टुकड़े किए और दिल्ली में कई दिनों तक फेंकता रहा। दिल्ली पुलिस ने छह महीने बाद उसे  गिरफ्तार कर लिया। ये कम बड़ी बात नहीं कि छह महीने बाद कम से कम गिरफ्तार तो कर लिया। बड़ी बात तो यह भी है कि आफताब ने जुर्म कबूल भी लिया वर्ना जिंदगी खत्म होने तक मां - बाप लापता बेटी को ढूंढते रह जाते (हालांकि घटनाक्रम के ताजा अपडेट से पता चला कि श्रद्धा

किस ओर जा रहा समाज ?

यूँ ही समाचारों को स्क्रॉल करते हुए इस खबर पर नजर चली गयी.इसे पढने से खुद को रोक नहीं पायी.आप किसी पर भरोसा कैसे करें? इसे पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो गए, मतलब क्रूरता की पराकाष्ठा है. कई सवाल भी मन में उठे मसलन ऐसा करने वाले कि मानसिक स्थिति कैसी रही होगी? क्या कोई सामान्य इंसान ऐसा कर सकता है? मामला बच्चा चुराने का है किन्तु बच्चा चोरी की यह घटना बिलकुल अलग ही स्तर की है. घटना ब्राज़ील की है. बच्चा चुराने वाली एक महिला है, किन्तु चुराने का तरीका वीभत्स. उस महिला ने अपनी बेस्ट फ्रेंड की हत्या कर उसके कोख से नौ माह का शिशु निकाल लिया. इसके पहले उस महिला ने खूब रिसर्च किया कि डेड बॉडी से शिशु को कैसे निकाला जा सकता है. इस पूरी घटना और हत्या का खुलासा तब हुआ जब महिला उस बच्चे को लेकर हॉस्पिटल पहुंची. हॉस्पिटल स्टाफ को ये मामला संदिग्ध लगा और उसने पुलिस को खबर किया. पुलिस कस्टडी में महिला ने सच उगल दिया. इस घटना का ज़िक्र करने का सीधा सा मतलब है कि हम किस ओर जा रहे हैं. आप जिसके साथ दिन-रात रहते हैं वह आपके साथ क्या कर सकता है ये घटना एक जीता जागता सबूत है. © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्

सिसकियां (एक और कहानी प्रकाशित)

"परी ने जैसे ही छड़ी घुमाई कद्दू रथ बन गया। छोटे- छोटे चूहे रथ के घोड़े बन गए। परी ने छड़ी घुमाई और सिंड्रेला की फटी पुरानी ड्रेस सुंदर, राजकुमारियों के गाऊन जैसी हो गई। देखते ही देखते सुंदर चमचमाती चांदी की जूतियां सिंड्रेला के पैरों में थीं। सिंड्रेला खुशी से नाच उठी।" "मम्मा परी कैसी होती है?" "परी…उम्म... बिल्कुल तुम्हारी तरह" "नो मम्मा परी आपकी तरह होती है। मेरी तरह तो सिंड्रेला…। मम्मा आगे की कहानी बताओ न?" पायल ने बिन्नी के माथे पर हाथ फेरते हुए पूछा "क्यों मैं कैसे परी हुई ?" " पलक झपकते आप मेरी हर विश पूरी नहीं करतीं?" पायल हंसते हुए उसे गुदगुदी लगाने लगी। दोनों खिलखिलाने लगीं। बिन्नी एक साल की भी नही थी जब प्रेम की मौत हो गई थी। बिन्नी प्रेम की इकलौती निशानी थी। उसकी तोतली बोली पायल की ज़िन्दगी से सारी कड़वाहट मिटाकर मिठास घोल जाती। उसकी हँसी अँधेरे जीवन में उजास भर जाती। कभी वह उदास होती बिन्नी अपनी नन्ही हथेलियों से उसका माथा सहलाने लगती और सच में उसकी सारी थकावट, सारी उदासी उड़न-छू हो जाती। वह घंटो टकटकी लगाए बिन्न

-साइबर ट्रैप-

“ OMG कहाँ थे यार ? ”  “ थोड़ा बिजी था, तुम सुनाओ, एनीथिंग न्यू,? हाउ आर यू ?कैसा चल रहा है तुम्हारा काम” “K”  “मतलब?”  “ओके...शार्ट फॉर्म K”  “हा हा हा, तुम और तुम्हारे शार्ट फॉर्म्स”  “हा हा हा को तुम LOL भी लिख सकते हो,मतलब- लाफिंग आउट लाउड”  “हाँ हाँ वही LOL”  “ पर एक पहेली अब तक नहीं सुलझी, अब टालो नहीं बता दो”  “KP”  “मतलब?”  “कौन पहेली... हा हा हा”  “मतलब कुछ भी शॉर्ट”  “और क्या?”  “ओके मुझे बहस नहीं करनी। अब पहेली बुझाना बंद करो और जल्दी से ऑनलाइन वाला नाम छोड़कर अपना ‘रियल नेम’ बताओ?”  “दि रॉकस्टार”   “उहुँ ये तो हो ही नहीं सकता, कुछ तो रियल बताओ, ना चेहरा दिख रहा, न नाम रियल”   “ हा हा हा, तुम तो बस मेरे नाम के पीछे ही पड़ गई हो! अरे बाबा ये तो बस फेसबुक के लिए है, जैसे तुम्हारा नाम ‘स्वीटी मनु’ वैसे मेरा नाम ”  “ तो तुम्हारा असली नाम क्या है?” “असलियत फिर कभी, बाय”  “बाय ! हमेशा ऐसे ही टाल जाते हो, कह देती हूँ अगर अगली बार तुमने अपना असली नाम नहीं बताया और अपना चेहरा नहीं दिखाया तो फिर सीधा ब्लॉक। याद रखना कोई मज़ाक नहीं”   “LOL”  “मज़ाक नहीं, बिलकुल सच”  “ चल चल

शायरी का जादूगर : साहिर

“उफ़क के दरीचे से किरणों ने झांका फ़ज़ा तन गई, रास्ते मुस्कुराए सिमटने लगी नरम कुहरे की चादर जवान शाख्सारों ने घूँघट उठाए परिंदों की आवाज़ से खेत चौंके पुरअसरार लै में रहट गुनगुनाए वो दूर एक टीले पे आँचल सा झलका तसव्वुर में लाखों दिए झिलमिलाये” साहिर, जिनका नाम बीसवीं सदी के महान शायरों में शुमार है, आज चर्चा शायरी के जादूगर साहिर लुधियानवी की। उर्दू के अज़ीम शायर साहिर लुधियानवी का जन्म पंजाब के लुधियाना में 8 मार्च 1921 को हुआ था। उनका पूरा नाम अब्दुल हई था। साहिर ने अपनी मैट्रिक तक की पढ़ाई लुधियाना के खालसा स्कूल से पूरी की। कॉलेज के कार्यक्रमों में वह अपनी गजलें और नज्में पढ़कर सुनाया करते थे जिससे उन्हें काफी शोहरत मिली। चार सालों तक लुधियाना कॉलेज में अध्ययन के बाद साहिर लुधियानवी को 1941 में कॉलेज छोड़ने के लिए कह दिया गया। उनके करीबी बताते हैं कि दो घटनाओं की वजह से ही साहिर को कॉलेज से निष्कासित किया गया था। 1941 में साहिर छात्र संगठन के अध्यक्ष थे और उनका लेखन अंग्रेजी सरकार के खिलाफ हुआ करता था हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उनके प्रेम प्रसंग की चर्चा की वज

लता मंगेशकर से जुड़ाव

लता मंगेशकर के गीतों से पहला परिचय कब हुआ याद नहीं। मम्मी अक्सरहा उनके गीत गुनगुनाती थीं। तब किसी के गाने की तारीफ करते हुए यही कहा जाता था कि वह तो एकदम लता मंगेशकर की तरह गाती है, यानी लता मंगेशकर संज्ञा से विशेषण बन चुकी थीं।  गर्मी की उमस भरी रातों को छत पर पानी का छिड़काव होता, फिर सोने के लिए गद्दे बिछाए जाते। खाना खाने के बाद हम सभी छत पर चले जाते। टिमटिमाते तारों से भरे खुले आसमान के तले मम्मी और हम सभी बच्चे लेट जाते, फिर शुरू होता गाने का सिलसिला। मम्मी को लता मंगेशकर और मुकेश के गाने विशेष तौर पर पसंद थे। चाँद, तारे, हवा, बादल - किसी पर भी गाने का सिलसिला शुरू होता तो बस चलता रहता। कभी मन हुआ तो अंत्याक्षरी भी शुरू हो जाती।  जब पहली बार टेपरिकॉर्डर आया तो साथ में लता मंगेशकर और मुकेश के गानों का कैसेट भी आया। पहली बार लता जी के लिए 'दी' का सम्बोधन भी मम्मी से ही सुनी थी। तब ज़्यादा उम्र नहीं थी अल्प बुद्धि थी, मैंने मम्मी से पूछा भी था 'वह तुम्हारी दीदी हैं क्या?' मम्मी हंसते हुए बोली थीं 'हाँ'। 'नैना बरसे रिमझिम', 'झूम झूम ढलती

नीला गुलमोहर (कहानी)

1. मौसम बदलने लगा है। मौसम बदलने का पता तब चलता है जब खरीदारों की फूलों को लेकर पसंद बदलने लगती है, जैसे अक्टूबर-नवंबर में पिटूनिया, कैलेंडुला, गेंदा के खरीदार बढ़ जाते हैं तो गर्मियों में उड़हुल, सूरजमुखी, डहेलिया को खरीदने वालों की तादाद बढ़ जाती है।  कुछ फूल सालों भर बिकते हैं तो कुछ मौसमानुसार। यूँ तो मुझे सभी मौसम पसंद है,  पर बरसात और बसंत विशेष प्रिय है। ये मौसम होते हैं जब फूलों की महक सारे गिले-शिकवे, दुःख-कष्ट से हमें दूर ले जाती है। जिन पौधों में साल के अन्य महीनों में फूल नहीं लगते हों वे भी इन महीनों में पल्लवित-सुभाषित हो उठते हैं। रंग-बिरंगे फूलों को देख कितनी ही कल्पनाएं साकार हो उठती हैं। ये फूल कभी झालर तो कभी कंगूरे, कभी बिंदिया तो कभी झुमके से दिखते हैं। बचपन में बड़ी पत्तियों वाले फूलों को नाखून पर लगाकर उन्हें किनारे से बारीकी से कुतरकर नेल पॉलिश-सा सजाकर कितना आनंद आता था। कनेर के पीले-गुलाबी फूलों को उंगलियों में लगाकर लंबे नाखूनों की चाहत पूरी हो जाया करती थी।  रंग छोड़ते लाल-गुलाबी छोटे-छोटे नौ-बजिया और दस-बजिया फूलों को गालों-होठों  पर रगड़कर लिपस्टिक और लाली की तर