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Showing posts from 2014

धुंधली सुबह

सर्द सुबह जब धूप भी धुंध की चादर   में छिपी रहती है - जब दूर तलक सफ़ेद सन्नाटा पसरा होता है - अक्सर कुछ धुंधली आकृतियाँ बनती हैं फिर लुप्त हो जाती हैं कोहरे में कहीं - तब अपने वजूद को बचाये रखने के लिए संघर्ष करती सहमी चिड़िया धुंध छंटने के   इंतज़ार में एक - एक पल ऐसे गुजारती है जैसे बीत रही हों कई सदियाँ। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

इश्क़ की खुशबू

उस रात जब चाँद   भटक रहा था बादलों में कहीं - अल्हड हवा रूमानियत के गीत गुनगुना रही थी - फ़िज़ा में घुल रही थी इश्क़ की भीनी खुशबू - उस रात   चांदनी पहनकर सितारों को दामन में भरकर सारे रस्मोरिवाज को छोड़कर स्याह रातों को रोशन करती अपने दायरे को तोड़ती चली तो आयी थी - तुम्हारी वीरान सुबह में रंग भरने ना सिर्फ एक पल के लिए वरन् उम्र भर के लिए तुम्ही बता दो मेरे हमराज अपने तसव्वुर के आशियाँ में अब तन्हा लौटूं कैसे ?? © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

अनाम रिश्ता

ख़ि ज़ाँ का मौसम था पर खुशनुमा सा था -  सर्द दिन थे और बंद लिफ़ाफ़े से तुम। गुज़रते वक्त में खुली किताब हो गए जिसके हर पन्ने से वाकिफ थी मैं।    जाने -अनजाने एक रिश्ते का आशियाँ सजा लिया था हमने।   साझा किया था शामो - सुबह गोया एक रूह के दो जिस्म हो। मेरे रहबर समय कब एक सा होता है - बेरंग हुए गुलाबी लम्हे बाँझ हुआ मोहब्बत का दरख़्त दफना दिया हर ख्वाब को। अरमानों के थपेड़ों में बमुश्किल सम्हाले रखा खुद को। सोचती हूँ - साल  की आखिरी रात अनाम-अबूझ-अव्यक्त रिश्ते के आशियाँ को छोड़ जाऊं ।    © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

आँखें (चंद हाइकु )

बेरंग जहां रोशन कर गया आँखों का दान ----------- जागती आँखें चाँद पाने की ज़िद उंघते ख्वाब ------------ छलके शब्द नैन करे संवाद एक लौ दिखी ------------ चार थे नैना चश्मा घर में छूटा सब धुंधला ----------- राज़ खोल दी दिल में दफ़न था आँखें बोल दी ----------- सीमा से परे उड़ने को तत्पर नैन परिंदे ------------ जूझते रहे आँखों ने सिखाया था शूल हैं फूल © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

इश्क़ की फुहारें (हाइकु )

इश्क़ बरसा भीग रहे हैं सब बदली फ़िज़ां --------- अमृत रस शबनमी सुकून इश्क़ का नूर --------- इश्क़ तिलस्म सूझे ना कोई तोड़ सब उलझे --------- चाँद - चकोर इश्क़ की हसरत वस्ल की प्यास ---------- इश्क़ मुअम्मा सुलझ नहीं पाए दिल समझे ---------- सुधा - सलिल इश्क़ में भीगी मही वसंत आया ---------- इश्क़ की सजा पाँव लहुलूहान मौत की ख़ुशी ----------- नन्हा दीपक इश्क़ में जला करे खुशियाँ भरे   ------------ © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

साझा रिश्ता

हर रिश्ते से परे एक रिश्ता हमारे दरम्यां- जिसे समझने की ज़रूरत ना तुम्हे पड़ी ना मुझे - साझे हर्फ़ साझा लफ्ज़ साझे ख्वाब साझे जज़्बात साझी हसरतें तेरी हर चीज़ साझी प्रेम भी साझा- बस, मंज़ूर नहीं तेरी बाहों के सरमाया का साझा होना, जिस पर सिर रख कर अनगिनत शामें गुज़ारी मैंने। जानें कितनी दफा आँसुओं से भी धुली थी वो, लेकिन ये भी तो सच है साझे रिश्ते में हक़ कहाँ! मेरे रहबर  कुछ रिश्ते को नाम देना बहुत मुश्किल, लेकिन कितना जरुरी होता है कभी कभी ! © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

‘उदास शाम’ (गीतिका )

उदास शामें और ये तन्हाई , प्यार किया तो ये सज़ा पाई। खोखली रवायतों से लड़ना , बदले में मिली सिर्फ रुसवाई। उनका आना फिर चले जाना , इश्क में दिल ने फिर चोट खाई। इक आशियाँ सजा लिया मिलकर , तोड़ गया वो सनम हरजाई। झरते रहे आँखों से आंसू , बिन मौसम ये बरसात आयी। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

ये हौसला…

उ स दिन गार्गी उदास सी घर के कामों में उलझी थी।  उसकी उदासी को समझ पाना बहुत ही आसान था, क्योंकि जब वो खुश - प्रफुल्लित रहती है, या तो कोई प्यारा सा बांग्ला गीत गुनगुनाती रहेगी या फिर यहां की बातें - वहाँ की बातें बांग्ला मिक्स टूटी फूटी हिन्दी में बताती रहेगी, जिसमें अक्सर लिंग भेद की त्रुटियाँ भी होती थीं, हालांकि करीब  चार - पांच  सालों के हमारे साथ ने उसकी हिंदी में काफी सुधार ला दिया था। अपने नाम के बिलकुल उलट - निरक्षर, अव्वल दर्जे की नासमझ, जिसे कोई भी चकमा दे जाता, रोज़ बेवक़ूफ़ बनती। मज़ाक  करते हुए मै अक्सर उससे पूछा करती कि आखिर तुम्हारा नाम गार्गी किसने रख दिया, पता है गार्गी कितनी पढ़ी लिखी विदुषी महिला का नाम था, वो मेरी बातें सुनती और हंसती…हाँ लेकिन वो बंगाली खूबसूरती से भरी पूरी थी, दुबली पतली सी…बड़ी बड़ी आँखों वाली । अक्सर अपनी बातें मुझसे साझा करती थी -  चाहे तकलीफ - परेशानियां हो या फिर कोई खुशी की बात, यहां तक कि अगर किसी ने उसके मेहनताने की रकम भी बढ़ाई तो भी बेहद खुश होकर बताएगी। कभी किसी की बुराई करते करते नाराज़ हो जाएगी तो कभी किसी की तारीफ़ करते क

चंद हाइकु

   अमृत घट बूँद नहीं बरसे   तडपे मीन। -------------   मोक्ष की चाह सर्वस्व समर्पित   बंधन टूटे। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

हर्फ़ जो दफ़न हो गए थे डायरी के पन्नों में_२६१२१९९३

ए क ज़िंदगी में न जाने कितने रंग समाहित है ।   ज़रूरत है उन रंगों को संवारने की , सजाने की। पूरा जहां रंगों से   सजा हुआ है , आकाश , पेड़ - पौधे , नदियां , फूल , तितलियाँ … सुखद लगता है प्रकृति में बिखरे इन रंगों को देखना, उनसे खेलना।   ऐसा महसूस होता है कि दिल की सारी बातें पेंटिंग के ज़रिये अभिव्यक्त की जा सकती है ।    जब प्रकृति की खूबसूरती को देखती हूँ तो इच्छा होती है कि बस उन्हें कैनवास में कैद कर लूँ, पर अफ़सोस की मेरे पास चित्रकारी का हुनर ही नहीं है।   वैसे देखा जाए तो ये धरती एक कैनवस ही तो है ..... जिसपर प्रकृति की   तस्वीर बड़े ही प्यार से उकेरी गयी है।   हर रंग की अपनी अहमियत।   आजकल मेरी कल्पनायें बेलगाम होती जा रही हैं।    आँखों में सतरंगी सपने युवा दिल जोशीला समुद्र सा उफनता हुआ ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है मोनालिसा की तरह।     © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

हर्फ़ जो दफ़न हो गए थे डायरी के पन्नों में #05081997‬

मैं सूर्य को अपनी हथेलियों में कैद करना चाहती हूँ, ताकि उसकी रोशनी किसी और तक ना पहुंचे, परन्तु सत्य तो यह है की वह सूर्य जो दूर से इतना सुन्दर लगता है, सबके लिए इतना उपयोगी है.… सारे संसार को रोशन करता है , वही करीब जाने पर किसी को भी भस्म करने की क्षमता रखता है।   सूर्य को अस्ताचल में जाते हुए देखना अच्छा लग रहा है।  सूर्यास्त के पश्चात ये ज़मीं अन्धकार से भीग जाएगी।  निशा की कालिमा के बीच रवि के प्रकाश से चमकते हुए पूर्णवासी के चाँद को देखने का इंतज़ार करुँगी।  वो चाँद कितना सुन्दर होता है ना बिलकुल गोल, चमकता हुआ सा।  गुलाब के फूल की अनछुई कोमल पत्तियों पर मोतियों सी चमकती हुयी पारदर्शी पवित्र ओस की बूँदें दिल को एक अजीब सा सुकून देती है।  ये सुकून एक अनोखी भावना को जन्म देती है,  जो बासंती  हवा से भी चंचल, फगुनाहट के उमंग से ओत - प्रोत, गन्ने की मिठास से भी मीठी प्रतीत होती है।  लेकिन ये भावनाएं तभी तक हैं जब तक मैं, मुझ तक सीमित हूँ, नहीं तो समाज की भट्ठी की तपिश इन्हें क्षण भर में झुलसा दे। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!