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Showing posts with the label डायरी

ये यादें ....

यादों के तंग गलियारों से गुज़रते हुए अक्सर रूह छिल जाती हैं।  लहूलुहान होने के बाद भी उन गलियारों से गुजरने के मोह से खुद को रोक नहीं पाती।  पुरानी डायरियों को पढ़ने का मोह छोड़ नहीं पाती। दिमाग चाहता है पढ़ना बंद करूँ , और मन उसे बार बार पढ़ना चाहता है।  दोस्त कहते हैं आत्ममुग्धा ना बनूँ, दूसरों की चीज़ें पढूं जो मेरी सोच को विस्तार दे सके।  क्या बताऊँ उन्हें कि ये, उपन्यासों से बेहतर लगती है, जिसकी मुख्य किरदार मैं ही तो हूँ। मेरे आस पास की घटनाएं जो कभी रुलाती है कभी गुदगुदाती हैं, पुरानी यादों को ताज़ा कर जाती हैं। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

हर्फ़ जो दफ़न हो गए थे डायरी के पन्नों में_२६१२१९९३

ए क ज़िंदगी में न जाने कितने रंग समाहित है ।   ज़रूरत है उन रंगों को संवारने की , सजाने की। पूरा जहां रंगों से   सजा हुआ है , आकाश , पेड़ - पौधे , नदियां , फूल , तितलियाँ … सुखद लगता है प्रकृति में बिखरे इन रंगों को देखना, उनसे खेलना।   ऐसा महसूस होता है कि दिल की सारी बातें पेंटिंग के ज़रिये अभिव्यक्त की जा सकती है ।    जब प्रकृति की खूबसूरती को देखती हूँ तो इच्छा होती है कि बस उन्हें कैनवास में कैद कर लूँ, पर अफ़सोस की मेरे पास चित्रकारी का हुनर ही नहीं है।   वैसे देखा जाए तो ये धरती एक कैनवस ही तो है ..... जिसपर प्रकृति की   तस्वीर बड़े ही प्यार से उकेरी गयी है।   हर रंग की अपनी अहमियत।   आजकल मेरी कल्पनायें बेलगाम होती जा रही हैं।    आँखों में सतरंगी सपने युवा दिल जोशीला समुद्र सा उफनता हुआ ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है मोनालिसा की तरह।     © 2008-09 सर्वा...

हर्फ़ जो दफ़न हो गए थे डायरी के पन्नों में #05081997‬

मैं सूर्य को अपनी हथेलियों में कैद करना चाहती हूँ, ताकि उसकी रोशनी किसी और तक ना पहुंचे, परन्तु सत्य तो यह है की वह सूर्य जो दूर से इतना सुन्दर लगता है, सबके लिए इतना उपयोगी है.… सारे संसार को रोशन करता है , वही करीब जाने पर किसी को भी भस्म करने की क्षमता रखता है।   सूर्य को अस्ताचल में जाते हुए देखना अच्छा लग रहा है।  सूर्यास्त के पश्चात ये ज़मीं अन्धकार से भीग जाएगी।  निशा की कालिमा के बीच रवि के प्रकाश से चमकते हुए पूर्णवासी के चाँद को देखने का इंतज़ार करुँगी।  वो चाँद कितना सुन्दर होता है ना बिलकुल गोल, चमकता हुआ सा।  गुलाब के फूल की अनछुई कोमल पत्तियों पर मोतियों सी चमकती हुयी पारदर्शी पवित्र ओस की बूँदें दिल को एक अजीब सा सुकून देती है।  ये सुकून एक अनोखी भावना को जन्म देती है,  जो बासंती  हवा से भी चंचल, फगुनाहट के उमंग से ओत - प्रोत, गन्ने की मिठास से भी मीठी प्रतीत होती है।  लेकिन ये भावनाएं तभी तक हैं जब तक मैं, मुझ तक सीमित हूँ, नहीं तो समाज की भट्ठी की तपिश इन्हें क्षण भर में झुलसा दे। © 2008-09 सर्व...

हमारी यात्रा : लैंसडॉउन और ऋषिकेश

रोज़मर्रा की भागदौड़ से कुछ पल सुकून के चुराने की चाहत में निकल पड़े हम लैंसडॉउन  की ओर । भीड़ भाड़ और सड़क जाम से पार पाते हुए रात नौ बजे कोटद्वार पहुंचे। वहाँ से लैंसडॉउन कि चढ़ाई शुरू होती है। घुमावदार पहाड़ी रास्ते से गुजरते हुए जाने कितनी कल्पनाएं सजीव हुई जा रही थी।  लम्बे और घने चीड़, देवदार और बांज के पेड़ों से ढंकी घाटी  .... दूर तक चांदनी छिटकी हुई  .... ऐसा लगता था जैसे किसी सपनों की दुनिया से गुज़र रहे हो। हमारी गाड़ी अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही थी।  दूर तक घुप्प अन्धेरा फैला था  …फिर अचानक जाने कहाँ से चाँद आ गया और पेड़-पौधे - रास्ते सब चांदनी में नहा गए, चन्दा के साथ आँख मिचौली खेलते हुए, नैसर्गिक सुंदरता का आनंद लेते हुए, रात के सन्नाटे में पहाड़ों की भाषा सुनने और समझने कि कोशिश करते हुए आखिरकार रात करीब ग्यारह बजे हम लैंसडॉउन पहुच गए। रात के ग्यारह बजे पहाड़ के लिहाज से थोड़ी देर हो जाती है.। हर तरफ सन्नाटा था.। दूर दूर तक कोई भी नहीं दिख रहा था  .... यूँ लग रहा था जैसे लोगों के...

बदलाव....

ह र सुबह कि तरह आज भी 6 बजे का अलार्म बजा था और हर सुबह कि तरह आज भी मै अलार्म से पहले ही जाग गयी थी. लेकिन आज नींद खुली किसी के रोने कि आवाज़ से. किसी स्त्री की सिसकियां सुबह कि नीरवता को भंग कर रही थी. मन आशंकाओं से भर गया. अनमनी सी बिस्तर से उठी और रोजमर्रा के कामों में जुट गयी.  लेकिन सिसकियां अब दहाड़ वाले रुदन में बदल गयी थी. मैं ख़ुद को दफ्तर जाने कि तैयारियों में व्यस्त करने कि कोशिश कर रही थी, लेकिन दिमाग में उथल पुथल मची थी. सुबह तो कितनी शांत और सुकून होती है ना फिर आख़िर उसकी क्या तकलीफ रही होगी जो इतनी ज़ोर ज़ोर से  रो रही होगी. कही उसका कोई सगा ज़िंदगी भर के लिए उसे अकेला तो नही छोड़ गया...  या फिर ... तरह तरह कि आशंकाये मुझे परेशान करने लगी थी... लेकिन मैं भी पुरी तरह से अपनी भावनाओं और सम्वेदनाओ पर नियंत्रण रखते हुए अनाप शनाप सोचती रही... बस सोचती ही रही, लेकिन बाहर तभी निकली जब द़फ्तर जाने समय हो गया था . शायद मै भी बदल रही हूँ... या फिर कुछ ऐसा है मेरे अन्दर जो बदल गया है या कह सकते है कि समाज और परिस्थिति के अनुसार ढल गया है. © 2008-...

पड़ोस कि कुछ बातें और बचपन कि यादें

ती न मंज़िल वाले मकान के दूसरी मंज़िल पर स्थित है मेरा छोटा सा फ्लैट. फ्लैट्स आपस में इस तरह से जुड़े हुए हैं कि ऊपर वाले या नीचे वाले फ्लैट में सामान्य आवाज़ में भी बातें कि जाए तो हमारे फ्लैट में स्पष्ट सुनायी देती है. हम अपने किचन में काम करते रहते है...और हर फ्लैट कि ख़बर हो जाती है कि कहाँ क्या हो रहा है. हमारे फ्लैट के बिलकुल ऊपर वाले फ्लैट में जो परिवार रहता है उसमें पति पत्नी और दो बच्चे शामिल है. सनी बेटे का नाम है तीन या चार साल का होगा.  मई में उस परिवार में परी का आगमन हुआ है. पहले अक्सर उस घर से ज़ोर ज़ोर से झगड़ने कि आवाजें आती रहती थी. कभी कभी तो उनकी वजह से हमारी नींद खराब हो जाती थी. परी के आने के बाद से माहौल में थोड़ी शान्ति है. बस सब उस में ही व्यस्त रहते है... परी को ये चाहिए... परी को वो चाहिये. सुनकर (देख नही पाती) अच्छा लगता है कि घर में बेटी का आना वहाँ के लिये सुखद है. बि लकुल नीचे वाले फ्लैट में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते है. अंकल कि उम्र क़रीब पचहत्तर साल होगी. उन्हें ऊँचा सुनायी देता है. पोपली ज़ुबान है उनकी. आंटी चिल्ला चिल्ला कर उनसे बात करती है....

पापा आपकी बहुत याद आती है.

म ई माह कि शुरुआत हो गयी. ना चाहते हुए भी कुछ यादें कभी पीछा नही छोड़तीं. 2012 का यही तो महीना था जब अन्तिम बार पापा को सही से बैठते हुए और चलते हुए देखे थे. क़रीब बीस दिनों कि छुट्टी लेकर घर गए थे... पापा के हर डाइट कि ज़िम्मेदारी मेरी थी, समय पर नही लेने पर गुस्साते भी थे. बीस दिन देखते देखते बीत गए और फिर आ गया मेरे दिल्ली आने का दिन.... पहली बार पापा को इतना भावुक देखे... उन्होंने कहा - "मेरी बेटी आज जा रही है हम कुछ नही खाएँगे."  हम अपने हाथों से खिचड़ी बनाये थे,  पापा से कहे मेरा मन रखने के लिए खा लीजिए... मेरी जिद पर वो दो चम्मच खा लिए. पहली बार पापा को इतना भावुक देख हमे अच्छा नही लग रहा था, लेकिन हमे क्या पता था कि वास्तव में उन्हें भी ये एहसास था कि अब उनके पास ज़्यादा दिन नही है. ... औ र फिर अगस्त महीने में जब घर गए.... पापा कि स्थिति देख कर बहुत घबराहट हुयी साथ ही अफसोस भी हुआ, तब तो वो उस स्थिति में भी नही थे जो मेरी जिद पर दो चम्मच पी भी सके.       स मय बीत जाता है... पर यादें कभी नही मिटती. उनके जाने के बाद समझ आया कि उस दिन पापा...

गोरा

इ न दिनों दूरदर्शन पर धारावाहिक   "गोरा"  देख रही हूँ।  सप्ताह में दो दिन आता है और तीन हफ्ते से मैं इसे देख रही हूँ .... ना कोई हल्ला - गुल्ला, ना ही तेज़ संगीत और ना ही एक ही दृश्य का बार - बार   दोहराव।  पार्श्व संगीत में बाउली  गायकों की सुमधुर  आवाज़ और बांगला संगीत बहुत ही  कर्णप्रिय लगते है। हालांकि तकनिकी खामियां इस धारावाहिक में नज़र आती है लेकिन ये उपन्यास मुझे इतना प्रिय है की उन खामियों के बावजूद मैं खुद को उन्हें देखने से नहीं रोक पाती।   रविन्द्र नाथ टैगोर की लिखी हुई इस किताब का हिंदी अनुवाद पढने का मौका मिला जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी ... और तब से आज तक मैं ना ही उस उपन्यास को और ना ही उसके मुख्य चरित्र को भूल पायी हूँ।   "गोरा" को पढ़ते हुए उस चरित्र की कल्पना अनायास ही हो जाया करती थी हालांकि धारावाहिक के चरित्र और उसमे कोई समानता नहीं है।  इस धारावाहिक की एक और खासियत है की इसके एक - एक डायलोग को आप सुन सकते हैं .... बस यहाँ भी ब्रेक का झमेला है जो बीच बीच में धारावाहिक की एकाग्रता तोड़ देता...

यादें .... ये यादें

का श की यादों को मिटाया जा सकता .... काश की हम बीते दिनों को वापिस ला पाते, पर सच है की ये संभव नहीं है। पिछले दिनों घर की सफाई करते हुए ऐसी ही यादों के ज्वार भाटे को मैंने महसूस किया।  घर शिफ्ट करने के बाद ये पहला मौका था जब मैं झाड पोंछ करने के साथ ही एक - एक सामान खोल - खोल कर देख रही थी और ज़रूरी चीज़ों को संभाल रही थी, गैर ज़रूरी चीज़ों को फ़ेंक रही थी।  पिछले साल 1 मार्च को  हम इस नए फ्लैट में शिफ्ट किये तब पापा भी हमारे साथ थे।  इससे पहले वाले फ्लैट में करीब 5 साल हमने गुज़ारा .... वे पांच साल एक एक कर आँखों के सामने से गुजरने लगे .... क़ानून से लेकर इंश्युरेंस तक की किताबें, कोट, पेंसिल, इरेज़र,  डायरी  ....  पापा की दवाइयां, प्रिस्क्रिप्शन, टोर्च  और साथ ही  आइसक्रीम स्टिक का वो बण्डल जिससे  रेडिएशन के साथ साथ पापा को माउथ एक्सर्साइस करना था ।  एक एक चीज़ें याद आने लगी .... हालाँकि उन यादों से मै  अपना पीछा छुडाना चाहती थी लेकिन  ऐसा हो नहीं सका...