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हाइबरनेशन में इश्क़

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बादलों की छुपन छुपाई, आसमां में थिरकता चाँद, ‘फॉरएवर इन लव’ की धुन और इन सबकी साक्षी ‘वो’ - कुरेदती रही दिल-दिमाग-मन कहीं से तो फूटे सोता प्रेम का या किसी कोने में अब भी बचा हो इश्क़ एक कतरा ही सही- हर खोज मुकम्मल हो लेकिन ये ज़रूरी तो नहीं। काश! ज़िन्दगी कोई साज होती, जिसे वो साध लेती यहाँ ज़िन्दगी तो रस्सी है, संतुलन बनाना आसान कहाँ !
‘फॉरएवर इन लव’ की धुन पर नाचता चाँद भी आखिर डूब गया…
अँधकार का ये संगीत ‘केनी’ के सैक्सोफोन की धुन से ज़्यादा मादक था ।



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

पराठा VS पास्ता (रहे न रहे, हम महका करेंगे...)

उन दिनों पास्ता खाने का और बनाने का शौक चरम पर था। यूट्यूब पर देखती रहती पास्ता कितने तरीके से बनाया जा सकता है फिर बनाने की कोशिश करती। बिना ज़्यादा कैलोरी के कैसे क्रीमी पास्ता बनाया जाए या फिर पास्ता को कैसे ज़्यादा हेल्थी बनाया जाए इसी कोशिश में जुटी रहती, और अक्सर सफल भी होती। एक अकेले के लिए बनाना कोई मुश्किल काम भी नहीं था। आरा गई तो रविवार की सुबह तय हुआ कि मैं पास्ता बनाऊँगी। मम्मी भी खुश कि खाने में कुछ नया प्रयोग किया जा रहा। मेरी मम्मी स्वादिष्ट खाना बनाने में माहिर थी। कितनी भी बीमार हों ज़रा सी ठीक होते हीं रसोई में चुपचाप कुछ चटपटा बनाकर रख देती। उन्हें ख़ुशी होती थी जब उनके बच्चे स्वादिष्ट खाना बनाते थे। इसलिये मम्मी खुश थी। पास्ता बना, सुबह का नाश्ता सर्व हुआ। मम्मी एक चम्मच खाईं। मैंने विजयी मुस्कान के साथ पूछा- “कैसा बना है?” मम्मी बोली -“बहुत बढ़िया बेटा” फिर पूछा मैंने- “और ले आएं ?” बोली “हमरा खातिर दुगो पराठा बना द आ बैगन चाहे परवल के चोखा।” अब मेरा मुँह चोखा जैसा बन गया था।  मैंने पूछा -”पसंद नहीं आया” वे बोलीं-”ना बेटा बहुत बढ़िया बना है, लेकिन हमको पराठा खाने का मन…

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

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का मथS तार... क्षीर समुद्र...का खोजS तार...अनंत भगवान... मिललें... ना। यूँ तो हमारे घर में पूजा पाठ ज़्यादा नहीं हुआ करता था। 'बाबा-अम्मा' दयालबाग से जुड़े थे...लेकिन कुछ पूजा हमारे घर में ज़रूर होती, उनमें से एक अनंत चतुर्दशी की पूजा भी थी। सुबह-सुबह बालकनी धो दी जाती। वहीँ पूजा का सारा इंतज़ाम होता। हमें जो इंतज़ार रहता वो था 'चनामृत' का और साथ ही 'क्षीर समुद्र' को मथने का। 'अनंत पूजा' और 'कलम दवात' की पूजा का चनामृत बाकि पूजा के चनामृतों की तुलना में थोड़ा ज़्यादा स्वादिष्ट होता है 😉। (बचपन से जीभचटोर वाली प्रकृति है)

खीरा से दूध और पानी के 'क्षीर समुद्र' को मथा जाता, जिसमें से सोने के अनन्त भगवान निकलते, जो पहले ही रख दिया जाता। मोहल्ले भर से लोग हमारे घर पर अनंत पूजा के लिए आते। पूजा के बाद रंग बिरंगा अनन्त हमारे बाजुओं में बांधा जाता। वो अनंत मुझे बहुत सुन्दर लगता था। पूजा के बाद सिवई, दोस्ती पराठा और अच्छी सी सब्जी का भोग लगता, हालांकि पण्डी जी नमक नहीं खाते, लेकिन घर के सदस्यों को नमक खाने पर कोई पाबंदी नहीं थी।

अम्मा हमें बताती थीं कि …

जाने अब कब उगेगा इन्द्रधनुष !

जब तेज़ बारिश होगी,
धूप भी छिटकी होगी,
बादल की ओट में, सूरज
थोड़ा सुस्ताएगा, और
रश्मियाँ पानी संग 
रास रचाएंगी-
तब नभ मुस्काएगा और इन्द्रधनुष उग आएगा...
यही कहा था उसने-
झूठ कहा था उसने !
सालों से आकाश बेरंग हुआ जाता है।
सालों से मौसम बदरंग हुआ जाता है।
आज भी बारिश थी और धूप भी छिटकी थी
बादल की ओट लिए सूरज खड़ा था
धुंए से उसका दम घुट रहा था।
रश्मियाँ, पानी,नभ, सब खामोश हुए,
पौधों की हरियाली अब जाती रही।
नभ नहीं, मुस्कुराया, आज भी,
इन्द्रधनुष, नहीं उग पाया,आज भी !



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

एक युवा आइकॉन की मौत....

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३२ साल के मुकेश असम के रहने वाले थे। 2012 में ऑल इंडिया में 14वीं रैंक लाने वाले मुकेश पांडेय तेज तर्रार, बेदाग और कड़क अफसर थे। उन्हें वर्ष 2015 में संयुक्त सचिव रैंक में प्रमोशन मिला था।इतने काबिल और देश के सबसे कठिन परीक्षा में सफलता पाने और प्रशिक्षण के बाद भी अगर व्यक्ति अपने तनाव से नहीं जूझ सका तो  ये किसी आश्चर्य से कम नहीं।  2012 बैच के आईएएस अधिकारी मुकेश पांडेय को 31 जुलाई को बक्सर का डीएम बनाया गया था। एक जिलाधिकारी के तौर पर यह उनकी पहली पदस्थापना थी। इसके पहले वे बेगूसराय के बलिया अनुमंडल में एसडीएम व कटिहार में डीडीसी के पद पर सेवाएं दे चुके थे। गुरुवार को दिल्ली में उनके आत्महत्या की खबर ने सभी को सकते में डाल दिया। उन्होंने किन कारणों से आत्महत्या जैसा कदम उठाया यह पता नहीं चल सका है, हालांकि सूत्रों का कहना है कि उन्होंने अपने फोन से एक सन्देश भेजा था जिसमें आत्महत्या की बात लिखी गयी थी।   उन्होंने सन्देश में लिखा था - “मैं जीवन से निराश हूं और मानवता से विश्वास उठ गया है।” सोचने और विचारने की बात है कि आखिर क्या वजह रही होगी जो इतना कड़क और बेदाग़ अफसर ने ये लिखा कि …

हम सब मशीन तो नहीं बन रहे?

अशिक्षा, गरीबी, बेरोज़गारी जैसी समस्याओं से जूझते हुए भारत ने आज़ादी के सत्तर साल पूरे कर लिए हैं। सौर्य ऊर्जा के क्षेत्र में जहां भारत का स्थान दूसरा है वहीं भारत की सैन्य शक्ति विश्व की सैन्य शक्तियों में तीसरे स्थान पर है। तकनीक के मामले में भी भारत पीछे नहीं है।  भारत की तकनीक दुनिया की सर्वाधिक आधुनिक तकनीकों में से एक है। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी बड़ी सफलता प्राप्त की है। हमारा देश हर क्षेत्र में आगे बढ़  रहा है, लेकिन आगे बढ़ने की इस दौड़ में भारत के सांस्कृतिक मूल्यों का भी ह्रास भी हो रहा।  कहीं न कहीं हम भारत के मूल स्वरुप से दूर हो हैं।  एक समय था जब देश में संयुक्त परिवार की परम्परा थी। आगे बढ़ने की दौड़ में एकल परिवार तक सिमट कर रह गए हम और फिर अकेलापन और अवसाद जैसी बीमारियों ने पाँव फैलाना शुरू किया। अगर संयुक्त परिवार होता तो शायद आशा साहनी कंकाल में तब्दील नहीं होती। बेटे से खुद को साथ रखने का गुहार नहीं लगाती।
सब यहीं छूट जाएगा, साथ कुछ नहीं जाएगा... न दाम, न चाम, फिर ये पैसे की भूख...आगे बढ़ने की अंधी दौड़ में हम अपनी संवेदनशीलता खो तो नहीं रहे हैं। आशा साहन…

अनंत की ओर...

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मेरे विचारों की कोमलता पर
अक्सर हावी हो जाते हैं
तुम्हारे अनगढ़ विचार
तुम्हारी संगत में मन सूफी सा हो गया
और तुम रहे औघड़ के औघड़
कहाँ सोच पाती कुछ अलग से तुम्हारे लिए
अक्सर सैकड़ों तितलियाँ
मेरे इर्द गिर्द पंख फैलाए बे-परवाह उड़ती हैं
इन्हें छोड़ जाते हो अक्सर मेरे आस पास रंग भरने को
दूर मुस्कुराते फूलों की सुगंध पहुँच हीं आती है मुझ तक,
तय है इसमें भी हाथ तुम्हारा ही है,
ये तुम ही तो हो जो ले आते हो इन्हें मेरे करीब। ज़िन्दगी के साथ दौड़ लगा रही हूँ,
जानती हूँ एक दिन तुम आओगे
फिर ये रफ़्तार थम जाएगी हमेशा के लिए
लिबास, चेहरा और किरदार -सब बदल जाएंगे
जन्म लेगी एक नई कहानी-
या फिर शायद ये कहानी आखिरी हो !
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