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टुकड़ों में ज़िन्दगी

एक और कहानी प्रकाशित, इस बार दैनिक भास्कर में -- http://epaper.bhaskar.com/detail/147392/7354452310/bihar/map/tabs-1/07-03-2017/384/15/image/

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वक़्त की क़ैद में ज़िन्दगी है मगर...

राह कंटीली और पथरीली, हौस’ला टूट रहा है,
जिस्म-रूह-अहसास-बंधन,सबकुछ छूट रहा है। सुर्ख सपने और फूल सुनहरे, ये तो बीती बातें हैं, कथा-कहानी, खेल पुराने, खो गई ये सौगातें हैं। मौत लगे है अब रूमानी, आँखों से न गिरता पानी। दुःख-चिंता से टूटा नाता, राग-रंग अब कुछ न भाता । यादों का प्यारा आँगन अब पीछे छूट रहा है, राह कंटीली और पथरीली, हौस’ला टूट रहा है।



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‘आई ऍम फैन युसु’

सी साल अप्रैल में चीन की रहने वाली फैन युसु चर्चा में आयी।आत्मकथात्मक निबंध ‘आइ ऍम फैन युसु’ के ऑनलाइन प्रकाशन के साथ ही इसकी लेखिका फैन युसु रातोरात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँच गयी हैं। ये घटना इसी वर्ष अप्रैल की है, जब घरेलु नौकरानी का कार्य करने वाली फैन युसु की आत्मकथा को ऑनलाइन लाखों लोगों ने पढ़ा और सराहा।  देखते-देखते उनकी ये कहानी वायरल हो गयी। चौवालीस साल की फैन युसु ने सपने में भी ये नहीं सोचा होगा कि उनका लिखा लोगों को इतना पसंद आ सकता है।
‘आई ऍम फैन युसु’ के ऑनलाइन प्रकाशन के चौबीस घंटे के अंदर लाखों लोगों ने इसे साझा किया और उस पर बीस हज़ार से ज़्यादा टिप्पणियां आयीं। रातोरात युसु सफलता के शिखर पर पहुँच गयी। दिलचस्प ये कि इतनी लोकप्रियता को हैंडल कर पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा और वे अपने  प्रशंसकों और मीडिया से बचने के लिए  छिपने का जतन करने लगी थीं। एक किसान की बेटी होने के नाते बचपन उनका गाँव में बीता। पढ़ने की शौक़ीन युसु पांच भाई बहनों में सबसे छोटी हैं। फैन युसु की कहानी किसी फ़िल्मी कहानी सी लगती है। गाँव में पली-बढ़ी एक स्त्री के संघर्ष की कहानी…उसकी जिजीविषा की कहानी…

ख्वाहिशें !

र रोज़ कानों में फूँक देते हो अनगिनत ख्वाहिशें ! कहाँ से लाऊँ वो जादुई छड़ी -
जो पूरी कर सके तुम्हारे सारे ख्वाब
जो रात के अँधेरे को बदल दे भोर की पहली किरण में
सूखे पेड़ में फिर से जान फूँक दे 
तपते सूरज को भी शीतलता की छाँव दे दे
खामोश होती गौरैयों को फिर से चहकना सीखा दे
बिलखते बचपन को जादू की झप्पी दे जाए
तुम ही कहो न कहाँ से लाऊँ ?

उस सतरंगे फूल को देखा है कभी-
अपनी दुनिया से बिछड़कर,
सूखी टहनियों और ज़र्द पत्तों के बीच अटक जाता है कभी-
कभी ज़मीं पर ठोकर खाता है तो कभी आसमाँ छूने निकल पड़ता है,
तब तक -जब तक कि उसकी पंखुड़ियाँ सूख कर बिखर ना जाएँ-
वो, मैं हूँ!
जाने कब से हूँ इस सफ़र में,
पंखुड़ियों के सूख कर बिखरने के इंतज़ार में -
वो मैं ही तो हूँ ।
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मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी नहीं बल्कि मनुष्य एक सामूहिक प्राणी है। पहले जाति विशेष का समूह, फिर धर्म विशेष, फिर गाँव विशेष, शहर विशेष, क्षेत्र विशेष, राज्य विशेष, भाषा विशेष, देश विशेष, विचारधारा विशेष- सुविधानुसार हम सब अपने-अपने समूह में शामिल रहते हैं। इतना ही नहीं ये सामूहिक विभेद का काम विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर भी चलता रहता है। बंटवारे का बीज तो हम सब बचपन से ही अपने मन में बोये रहते हैं। समय-समय पर कोई महापुरुष या स्त्री इसमें खाद पानी दे जाते हैं, और ये फलने फूलने लगते हैं। फेसबुक और व्हाट्सएप्प जैसे सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म भी समूह बनाने की सहूलियतें दे रहा है। यहाँ भी लोग सामूहिक बँटवारे को बड़े प्यार से अपना रहे। अगर आपको सामूहिक बँटवारा पसंद नहीं तो भी लोग आपको बाँट कर ही रहेंगे। कोई आपको जातिगत समूह में शामिल करेगा तो कोई शहर, राज्य, पेशेगत समूह में शामिल करेगा, लेकिन बँटवारा ज़रूरी है।
बँटवारे के बाद शुरू होता है सामूहिक बड़ाई और बढ़ावा देने का सिलसिला। तू मेरी पीठ थपथपा मैं तेरी थपथपाऊँ, और अगर किसी और समूह वाले ने किसी दूसरे समूह के लोगों पर टिप्पणी कर दी तो 'च…

सपने ही तो हैं...

इन दिनों अक्सर कुछ अजीब सा सपना आता है। कभी उन सपनों में राजस्थान की तंग गलियों में लोगों से रास्ता पूछते हुए खुद को नंगे पाँव अकेले चलते हुए देखती हूँ, तो कभी ऐसी जगह खुद को देखती हूँ, जहां चारों ओर सिर्फ बर्फ है। उस दौरान मैं अपने ऊपर गिरते बर्फ के फाहों को महसूस भी करती हूँ। कभी-कभी ये भी देखती हूँ कि किसी लाश को कँधे पर उठाए, उसके भार को महसूस करते हुए अनंत में चली जा रही। कभी कभी सपने में ही कुछ याद करने की कोशिश करती हूँ और फिर किसी गहरे कुँए में गिरती चली जाती हूँ। एक रोज़ बिल्कुल सुबह सुबह देखी पापा किताब लेकर कुछ पढ़ा और समझा रहे थे...कुछ समझ नहीं आया। क्या सपने भी डिकोड हो सकते हैं क्या?
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कहानी 'समानांतर' का प्रकाशन

http://www.grihshobha.in/parallel-1998

आज ये कहानी भी मिल गई, जिसने मेरे अंदर ये आत्मविश्वास जगाया कि मेरा लिखा प्रकाशन योग्य है...प्रथम कहानी जिसके प्रकाशन पर मेहनताना भी मिला था....संपादक को धन्यवाद....😊😊


http://www.grihshobha.in/parallel-1998

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