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'जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय'

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26 जनवरी के साथ ही कई सारी यादें भी ताज़ा हो जाती हैं।  बचपन के उत्साह की, विद्यालय की, जलेबी की, दोस्तों की, खूब सारी मस्ती की। बचपन से ही बच्चों को देशभक्ति और राष्ट्र से प्रेम करना सिखाया जाता है।  अच्छी बात है लेकिन अच्छा इंसान बनना, एक-दूसरे का आदर करना, अपनी धरोहरों को सम्मान और संरक्षण देना ऐसी बातें भी सिखाई जानी ज़रूरी है। 

पिछले हफ्ते सप्ताहांत पर भरतपुर के केवलादेव पक्षी उद्यान  में जाना हुआ। वहाँ देश के अलावा विदेशों से भी पर्यटक आए हुए थे, जो किराए पर साइकिल लेकर उद्यान का आनंद ले रहे थे। मैंने और मेरी मित्र ने भी साइकिल किराए पर लेकर अपनी यात्रा शुरू कर दी।


झील के किनारे बैठकर पक्षियों के कलरव का आनंद ले रही थी तभी कुछ लड़कों  की अश्लील टिप्पणी सुनी जो एक विदेशी महिला पर की गई थी।  वो महिला अकेली थी और साइकिल और बड़े लेंस वाले कैमरे के साथ वहाँ आनंद लेने आयी थी।  मैंने अपनी मित्र से कहा भी कि वे लोग उससे  बदतमीज़ी कर रहे हैं  पर फिर हमने इस पर  प्रतिक्रया  नहीं दी, कि  यूँ हीं किसी के मामले में टांग क्यों अड़ाना।  उद्यान घूमने के बाद वापिस लौटते हुए  मैंने उस महिला को  उनपर च…

सिर्फ विरोध के लिए विरोध या कुछ और ?

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बचपन में चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मावती और उसके जौहर की कथा खूब सुनी थी। किसी बाल पुस्तक में भी राजा रतन सिंह की बहादुरी के किस्से और पद्मावती के जौहर की कथा पढ़ी थी। लोककथाओं में आज भी उनके किस्से ज़िंदा हैं। फिर उन किस्सों को फिल्म के माध्यम से दिखाए जाने पर इतना बवाल क्यों ? हमें किस पर आपत्ति होनी चाहिए ? क्या आज हम फंतासी और सत्य के बीच काफर्क भूलते जा रहे हैं या फिर हम सब किसी भ्रम अथवा किसी पूर्वाग्रह में जी रहे हैं।     सूरज लीला भंसाली ने पद्मावती में भी अपने पुराने अंदाज़ को बरक़रार रखा है।उन्हें अगर ‘शो मैन’ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी फिल्मों का एक स्टाइल है। उनकी फिल्मों में एक भव्यता दिखाई देती है जो आप सिनेमा हॉल में हीं महसूस कर सकते हैं। संगीत में परिवेश-माहौल का पूरा असर दिखाई पड़ता है। इस फिल्म में भी उन्होंने लोकधुन और लोकगीतों का इस्तेमाल किया है। एक तरफ राजस्थान के लोकगीत तो दूसरी ओर शेरो  शायरी और अरबिक वाद्यंत्रों का प्रयोग। मैंने जायसी के पद्मावत को नहीं पढ़ा है लेकिन इस फिल्म को देखकर उसकी कमी नहीं खली। अलाउद्दीन खिलजी की बर्बरता, पद्मावती का सौंदर्य, रा…

एक लघुकथा :-)

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छिटपुट कहानियों-लघुकथाओं के प्रकाशित होने का दौर जारी है ----

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हाइबरनेशन में इश्क़

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बादलों की छुपन छुपाई, आसमां में थिरकता चाँद, ‘फॉरएवर इन लव’ की धुन और इन सबकी साक्षी ‘वो’ - कुरेदती रही दिल-दिमाग-मन कहीं से तो फूटे सोता प्रेम का या किसी कोने में अब भी बचा हो इश्क़ एक कतरा ही सही- हर खोज मुकम्मल हो लेकिन ये ज़रूरी तो नहीं। काश! ज़िन्दगी कोई साज होती, जिसे वो साध लेती यहाँ ज़िन्दगी तो रस्सी है, संतुलन बनाना आसान कहाँ !
‘फॉरएवर इन लव’ की धुन पर नाचता चाँद भी आखिर डूब गया…
अँधकार का ये संगीत ‘केनी’ के सैक्सोफोन की धुन से ज़्यादा मादक था ।



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पराठा VS पास्ता (रहे न रहे, हम महका करेंगे...)

उन दिनों पास्ता खाने का और बनाने का शौक चरम पर था। यूट्यूब पर देखती रहती पास्ता कितने तरीके से बनाया जा सकता है फिर बनाने की कोशिश करती। बिना ज़्यादा कैलोरी के कैसे क्रीमी पास्ता बनाया जाए या फिर पास्ता को कैसे ज़्यादा हेल्थी बनाया जाए इसी कोशिश में जुटी रहती, और अक्सर सफल भी होती। एक अकेले के लिए बनाना कोई मुश्किल काम भी नहीं था। आरा गई तो रविवार की सुबह तय हुआ कि मैं पास्ता बनाऊँगी। मम्मी भी खुश कि खाने में कुछ नया प्रयोग किया जा रहा। मेरी मम्मी स्वादिष्ट खाना बनाने में माहिर थी। कितनी भी बीमार हों ज़रा सी ठीक होते हीं रसोई में चुपचाप कुछ चटपटा बनाकर रख देती। उन्हें ख़ुशी होती थी जब उनके बच्चे स्वादिष्ट खाना बनाते थे। इसलिये मम्मी खुश थी। पास्ता बना, सुबह का नाश्ता सर्व हुआ। मम्मी एक चम्मच खाईं। मैंने विजयी मुस्कान के साथ पूछा- “कैसा बना है?” मम्मी बोली -“बहुत बढ़िया बेटा” फिर पूछा मैंने- “और ले आएं ?” बोली “हमरा खातिर दुगो पराठा बना द आ बैगन चाहे परवल के चोखा।” अब मेरा मुँह चोखा जैसा बन गया था।  मैंने पूछा -”पसंद नहीं आया” वे बोलीं-”ना बेटा बहुत बढ़िया बना है, लेकिन हमको पराठा खाने का मन…

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

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का मथS तार... क्षीर समुद्र...का खोजS तार...अनंत भगवान... मिललें... ना। यूँ तो हमारे घर में पूजा पाठ ज़्यादा नहीं हुआ करता था। 'बाबा-अम्मा' दयालबाग से जुड़े थे...लेकिन कुछ पूजा हमारे घर में ज़रूर होती, उनमें से एक अनंत चतुर्दशी की पूजा भी थी। सुबह-सुबह बालकनी धो दी जाती। वहीँ पूजा का सारा इंतज़ाम होता। हमें जो इंतज़ार रहता वो था 'चनामृत' का और साथ ही 'क्षीर समुद्र' को मथने का। 'अनंत पूजा' और 'कलम दवात' की पूजा का चनामृत बाकि पूजा के चनामृतों की तुलना में थोड़ा ज़्यादा स्वादिष्ट होता है 😉। (बचपन से जीभचटोर वाली प्रकृति है)

खीरा से दूध और पानी के 'क्षीर समुद्र' को मथा जाता, जिसमें से सोने के अनन्त भगवान निकलते, जो पहले ही रख दिया जाता। मोहल्ले भर से लोग हमारे घर पर अनंत पूजा के लिए आते। पूजा के बाद रंग बिरंगा अनन्त हमारे बाजुओं में बांधा जाता। वो अनंत मुझे बहुत सुन्दर लगता था। पूजा के बाद सिवई, दोस्ती पराठा और अच्छी सी सब्जी का भोग लगता, हालांकि पण्डी जी नमक नहीं खाते, लेकिन घर के सदस्यों को नमक खाने पर कोई पाबंदी नहीं थी।

अम्मा हमें बताती थीं कि …

जाने अब कब उगेगा इन्द्रधनुष !

जब तेज़ बारिश होगी,
धूप भी छिटकी होगी,
बादल की ओट में, सूरज
थोड़ा सुस्ताएगा, और
रश्मियाँ पानी संग 
रास रचाएंगी-
तब नभ मुस्काएगा और इन्द्रधनुष उग आएगा...
यही कहा था उसने-
झूठ कहा था उसने !
सालों से आकाश बेरंग हुआ जाता है।
सालों से मौसम बदरंग हुआ जाता है।
आज भी बारिश थी और धूप भी छिटकी थी
बादल की ओट लिए सूरज खड़ा था
धुंए से उसका दम घुट रहा था।
रश्मियाँ, पानी,नभ, सब खामोश हुए,
पौधों की हरियाली अब जाती रही।
नभ नहीं, मुस्कुराया, आज भी,
इन्द्रधनुष, नहीं उग पाया,आज भी !



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