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धीरे-धीरे ही सही...

एक और कहानी...

दैनिक भास्कर के नोएडा संस्करण में 'पराली का प्रेत' कहानी...
























© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
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तुम्हारे लिए

हर्फ़-हर्फ़ पढ़ती हूँ...

बार-बार, कई बार
कितने ही भावों से गुज़रती हूँ
हर एहसासों से जोड़ लेती हूँ खुद को 
कभी-कभी शब्दों से टकरा जाती हूँ 
तो कभी उन्हें समाहित कर लेती हूँ स्वयं में
तब बोझिल मन नई ऊर्जा से भर उठता है

ये शब्दों का जादू है
जो डूबती शाम को
नई सुबह का न्यौता दे जाता है!

सच-सच बताना !
शब्दों से अंतर्मन की यात्रा के पीछे कितने जन्मों की तपस्या छिपी है?
कितना यथार्थ भोगा है तुमने?
कितने गर्म झरनों को महसूस किया ?
शब्दों को गढ़ने से पहले उसकी ऊष्मा से कितनी बार गुज़रे ?

सच-सच बताना... क्योंकि मैं जानती हूँ
मन के छिलन की कल्पना ज़रा मुश्किल है जादूगर !


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जाना -हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है

हली बार साहित्य संसार के माध्यम से उन्हें सुनने का मौक़ा मिला था लेकिन तब मेरा काम सिर्फ और सिर्फ कार्यक्रम का प्रोडक्शन था।  इसलिए मेरा पूरा ध्यान कैमरे के कोण पर टिका था। कार्यक्रम खत्म होने के बाद हमारी बेहद छोटी और औपचारिक बातचीत हो सकी। शायद 2008 या 2009 की बात रही होगी।  उसके बाद पूरे आठ या नौ साल बाद उनका साक्षात्कार लेने का मौक़ा मिला। ये मौक़ा भी बहुत मुश्किल से मिला था। इसके लिए मैंने जाने कितनी बार उनसे फ़ोन पर बातें की।  हर बार वे तबियत खराब की बात कहकर टाल जाते थे। कभी वे दिल्ली से बाहर होते, जब दिल्ली में होते तो तबियत खराब है बोल कर बात टाल जाते और मैं हर बार उनका साक्षात्कार करने का मेरा जोश कम पड़ जाता। एक दिन जब अनामिका जी के साक्षात्कार के लिए मैं उनके घर पहुंची थी उस दिन वहीं अचानक मेरी मुलाक़ात केदारनाथ जी से हुई। मैंने उनसे बात की और उन्होंने आज्ञा दे दी।
तय दिन उनके घर पहुंचना था। अपनी ओर से पूरी तरह सतर्क थी कि कहीं गलती से भी मुझे
देर ना हो जाए। साक्षात्कार शुरू हुआ।  धीरे-धीरे मैं भी सहज होती गई। उन्होंने अपनी प्रिय
कविता कपास के फूल सुनाई। कविता सुनाने के साथ…

'जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय'

26 जनवरी के साथ ही कई सारी यादें भी ताज़ा हो जाती हैं।  बचपन के उत्साह की, विद्यालय की, जलेबी की, दोस्तों की, खूब सारी मस्ती की। बचपन से ही बच्चों को देशभक्ति और राष्ट्र से प्रेम करना सिखाया जाता है।  अच्छी बात है लेकिन अच्छा इंसान बनना, एक-दूसरे का आदर करना, अपनी धरोहरों को सम्मान और संरक्षण देना ऐसी बातें भी सिखाई जानी ज़रूरी है। 

पिछले हफ्ते सप्ताहांत पर भरतपुर के केवलादेव पक्षी उद्यान  में जाना हुआ। वहाँ देश के अलावा विदेशों से भी पर्यटक आए हुए थे, जो किराए पर साइकिल लेकर उद्यान का आनंद ले रहे थे। मैंने और मेरी मित्र ने भी साइकिल किराए पर लेकर अपनी यात्रा शुरू कर दी।


झील के किनारे बैठकर पक्षियों के कलरव का आनंद ले रही थी तभी कुछ लड़कों  की अश्लील टिप्पणी सुनी जो एक विदेशी महिला पर की गई थी।  वो महिला अकेली थी और साइकिल और बड़े लेंस वाले कैमरे के साथ वहाँ आनंद लेने आयी थी।  मैंने अपनी मित्र से कहा भी कि वे लोग उससे  बदतमीज़ी कर रहे हैं  पर फिर हमने इस पर  प्रतिक्रया  नहीं दी, कि  यूँ हीं किसी के मामले में टांग क्यों अड़ाना।  उद्यान घूमने के बाद वापिस लौटते हुए  मैंने उस महिला को  उनपर च…

सिर्फ विरोध के लिए विरोध या कुछ और ?

बचपन में चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मावती और उसके जौहर की कथा खूब सुनी थी। किसी बाल पुस्तक में भी राजा रतन सिंह की बहादुरी के किस्से और पद्मावती के जौहर की कथा पढ़ी थी। लोककथाओं में आज भी उनके किस्से ज़िंदा हैं। फिर उन किस्सों को फिल्म के माध्यम से दिखाए जाने पर इतना बवाल क्यों ? हमें किस पर आपत्ति होनी चाहिए ? क्या आज हम फंतासी और सत्य के बीच काफर्क भूलते जा रहे हैं या फिर हम सब किसी भ्रम अथवा किसी पूर्वाग्रह में जी रहे हैं।     संजय लीला भंसाली ने पद्मावती में भी अपने पुराने अंदाज़ को बरक़रार रखा है।उन्हें अगर ‘शो मैन’ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी फिल्मों का एक स्टाइल है। उनकी फिल्मों में एक भव्यता दिखाई देती है जो आप सिनेमा हॉल में हीं महसूस कर सकते हैं। संगीत में परिवेश-माहौल का पूरा असर दिखाई पड़ता है। इस फिल्म में भी उन्होंने लोकधुन और लोकगीतों का इस्तेमाल किया है। एक तरफ राजस्थान के लोकगीत तो दूसरी ओर शेरो  शायरी और अरबिक वाद्यंत्रों का प्रयोग। मैंने जायसी के पद्मावत को नहीं पढ़ा है लेकिन इस फिल्म को देखकर उसकी कमी नहीं खली। अलाउद्दीन खिलजी की बर्बरता, पद्मावती का सौंदर्य, रा…

एक लघुकथा :-)

छिटपुट कहानियों-लघुकथाओं के प्रकाशित होने का दौर जारी है ----

http://epaper.prabhatkhabar.com/1503710/Surbhi/Surbhi#page/7/1





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हाइबरनेशन में इश्क़

बादलों की छुपन छुपाई, आसमां में थिरकता चाँद, ‘फॉरएवर इन लव’ की धुन और इन सबकी साक्षी ‘वो’ - कुरेदती रही दिल-दिमाग-मन कहीं से तो फूटे सोता प्रेम का या किसी कोने में अब भी बचा हो इश्क़ एक कतरा ही सही- हर खोज मुकम्मल हो लेकिन ये ज़रूरी तो नहीं। काश! ज़िन्दगी कोई साज होती, जिसे वो साध लेती यहाँ ज़िन्दगी तो रस्सी है, संतुलन बनाना आसान कहाँ !
‘फॉरएवर इन लव’ की धुन पर नाचता चाँद भी आखिर डूब गया…
अँधकार का ये संगीत ‘केनी’ के सैक्सोफोन की धुन से ज़्यादा मादक था ।



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