Skip to main content

Posts

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

महिला दिवस पर कार्यक्रमों, संदेशों, कविताओं की झड़ी लग गई है। सारे लोग अपने अपने तरीकों से महिलाओं को सशक्त करने/होने की बात कर रहे। महिला दि वस पर स्री सशक्तिकरण का जितना भी राग अलापें लेकिन ये सच है कि एक सशक्त महिला सबकी आँखों का काँटा होती है। जब वो अपने बलबूते आगे बढ़ती है, उसे कदम दर कदम अपने चरित्र को लेकर अग्नि परीक्षा देनी होती है। अगर वो सिंगल/अनब्याही है, तो हर रोज़ उसे लोगों की स्कैनर दृष्टि से गुज़रना पड़ता है। अक्सर पुरुषों की दृष्टि उसमें अपने ऑप्शन्स तलाशती रहती हैं। उम्र, जाति, खानदान यहां तक कि उनके सेक्सुअल अभिरुचि पर भी सवाल किये जाते हैं।  एकबार एक बहुत ही वरिष्ठ व्यक्ति, जो दिल्ली  में वरिष्ठ पत्रकार है, ने पूछा था, “तुमने शादी नहीं की? अकेली रहती हो या लिव इन में ? तुम्हारा पार्टनर कौन है? “ मतलब ये कि “एक महिला अकेले रहती है, कमाती है, खाती है “  ये बात किसी से हजम नहीं होती। तीस साल की होने के साथ ही शादी का ठप्पा लगना ज़रूरी हो जाता है, अगर शादी नहीं की और हँसते हुए पूरे उत्साह के साथ  जीवन गुज़ार रही तो लोगों को वैसी महिलाएं संदिग्ध नज़र आने ...

प्रेम का रंग

सेमल की लालिमा  बिखर गयी है इस जानिब टेसू भी दहकने लगे होंगे तुम्हारी तरफ सुनो, थोड़े से फूल मसल देना कागजों पर शब्दों में ताज़गी आ जाएगी। मुट्ठी भर टेसू बिखेर देना हवाओं में नफरत के रंग धूमिल पड़ जाएंगे । और हाँ, थोड़े फूल बचा लेना अपने लिए खुश रहने की वजह मिल जाएगी। टेसू के फूल अब मेरा इंतज़ार कभी नहीं करेंगे ! © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

लेखन बनाम अनुभव

फे सबुक के एक पोस्ट पर आज मेरा ध्यान अटक गया।  इस पोस्ट में ये लिखा गया था कि कविताएँ आमतौर पर किसी पंक्ति से प्रेरित भी हो सकती है। इसके लिए ज़रूरी नहीं कि जो लिखा जा रहा है उसका अनुभव किया ही जाए। मतलब सुखी इंसान दर्द भरी कविताएँ कर सकता है और दर्द में डूबा इंसान ख़ुशी की ग़ज़लें कह सकता है... क्या सचमुच ऐसा है? अगर वाकई कोई कविता बिना अनुभव के सिर्फ किसी पंक्ति से प्रेरित होकर लिखी जाए तो क्या वो आत्मा रहित नहीं होगी? क्या उसमें कृत्रिमता नहीं होगी ? एक कार्यक्रम के सिलसिले में एक बार मेरी मुलाक़ात एक वरिष्ठ लेखक से हुई। वे अपना अनुभव साझा कर रहे थे। उन्होंने बताया "लोग कहते हैं कि कल्पना के ज़रिये कुछ भी लिखा जा सकता है, लेकिन मैं कहता हूँ कि हर लेखन के लिए अनुभव ज़रूरी है।" उन्होंने किसी अखबार में छपी एक कहानी का हवाला देते हुए बताया कि "कहानी में बच्चा बहुत गरीब होता है और जाड़े से बचने के लिए एक मुर्दे से लिपट के सो जाता है। सुनने में या पढ़ने में कहानी बड़ी मार्मिक है लेकिन जिसने इसका अनुभव किया है वो बता सकता है कि मुर्दा गर्म नहीं बिलकुल ठंढा ...

पुल और ज़िन्दगी

मे ट्रो स्टेशन से बाहर निकलते हुए पैदल पार पुल से गुज़रते हुए अनेक ज़िंदगियाँ दिख जाती हैं- पुल के शुरुआत में ही मायूसी ओढ़े एक औरत बैठती है आँचल में उसके पड़े होते हैं कुछ सिक्के उसके पास ही कंचे खेल रहा होता है उसका तोतला बच्चा जब भी कोई पास से गुज़रता है, बच्चे के चेहरे पर दर्द उभरता है कंचा छोड़, हाथ पसारे भागता है उसके पीछे दूसरे हिस्से में बैठता है - गंदे कपड़ों में,गन्दी सी चादर बिछाए बैसाखी वाला वो युवक, जो करता है संवेदनाओं का सौदा हर गुजरने वाले को अपनी बैसाखी दिखाता है करुणा के बदले में माँगता है चन्द सिक्के या गुलाबी नोट! पुल के बीच में अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ बैठती है और एक औरत गहरी नींद में सोया बच्चा सिक्का बन जाता है ! पुल और सीढ़ियों के बीच खिलौने और फलों की छोटी छोटी रेहड़ियां भी हैं। कितने सपने हर रोज़ यहां जन्म लेते हैं, कितनी मंज़िलों के रास्ते इसी पुल से गुज़रते हैं, जानें कितनी दोस्ती हर रोज़ यहां बनती और बिगड़ती है कितने प्रेम खामोशी से आगे बढ़ते हैं इसी पुल पर। एक बूढ़ा भी इसी पुल पर रहता था, दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रही थी उसकी सांसें ...

एक उदास शाम

ए क दिन- फूल बेरंग होंगे और बारिश सूखी चिड़ियाँ नहीं सुनाएंगी गीत कोई गिलहरी मुझसे नहीं बतियाएगी पौधे मुझे देखकर झूमेंगे नहीं । वितृष्णा से गुज़रते हुए तब, मैं गढ़ लूँगी अपनी दुनिया- तुम्हारी तरह । करुँगी सबसे बातें कि जैसे कर रही हूँ मैं बातें, खुद से। वहाँ हर चीज़ होगी मेरे मुताबिक़ जो ज़िंदा नहीं वो जीवित होंगे जो पसंद नहीं वो मृत होंगे । रहने लगूँगी मैं कल्पनाओं के घर में बिल्कुल तुम्हारी तरह, और फिर एक दिन- मिटा डालूंगी सत्य और भ्रम के बीच की रेखा, खत्म कर दूँगी सूक्ष्म से विराट का अंतर, तय कर लूँगी अंत से अनंत की दूरी, और विलीन हो जाऊंगी, मैं भी, अनंत में- कि अब समझ पा रही, तुम्हारी सोच को, तुम्हारी तरह- तुम्हारे जाने के बाद । © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

मौत का चक्रव्यूह

अब तक गूँज रही है कानों में वो अधफँसी आवाज़ जो मनाया करती थी उत्सव अपने वजूद का । अधफँसी आवाज़ गुनगुनाती थी ज़िन्दगी के गीत, वो जीना चाहती थी, हाँ, वो जीना चाहती थी, तोड़कर, मौत के सारे चक्रव्यूह। लड़ती रही थी ताजिंदगी ज़िन्दगी की व्यूह रचनाओं से जानती थी जुगत उनसे निकल पाने की । उस रात अँधेरा घना था औघड़ ने ऐसा व्यूह रचा अंतिम चक्र में फँस कर रह गई अभिमन्यु की तरह वो आवाज़ खामोश हो गई सदा के लिए !! © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

स्त्री

बदलते घर के साथ अक्सर छूट जाती है थोड़ी सी वो भी हर बार समा जाती है एक नए खोल में पहन लेती है एक अलग चेहरा समय की मांग के अनुसार भरती है स्वांग फिर किसी रोज़- असहनीय पीड़ा और बेचैनी से गुज़रते हुए स्त्री उतारती है अपनी केंचुली निकलती है बिलकुल नई होकर विरोध, मायूसी और शिथिलता उसके कदम रोकते हैं लेकिन वो रूकती नहीं अदम्य जिजीविषा के साथ निकल पड़ती है स्व की तलाश में वो समझ जाती है ओढ़े गये जीवन से कहीं बेहतर होता है जीना, उन्मुक्तता के साथ, एक पूर्णता के साथ © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!