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भूलने का मौसम

आज कल हिंदी धारावाहिकों में भूलने का मौसम है. जिसे देखो अपनी याददाश्त ही खो बैठा है. चाहे स्टार चैनल पर आने वाला धारावाहिक "ससुराल गेंदा फुल" का इशांत हो , कलर्स के धारावाहिक "लागी तुझसे लगन" की नकुशा हो, स्टार वन का धारावाहिक " प्यार की ये एक कहानी" की पिया हो या फिर जी पर आने वाला धारावाहिक "संजोग से बनी संगिनी" का रूद्र हो. सब के सब याददाश्त खो चुके हैं. हाँ रूद्र की याददाश्त तो वापिस आ चुकी है लेकिन ईशांत, नकुशा , पिया ये सब अपनी पिछली बातों को याद करने के लिए संघर्षरत हैं. इन किरदारों को देखकर लगता है की याददाश्त जाना और आना कितना आसान है. बस सिरिअल्स बनते रहे और हमारा मनोरंजन होता रहे. © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

भ्रष्टाचार के खिलाफ एक और अभियान

४ जून से एक और अभियान भ्रष्टाचार के खिलाफ. इस बार बाबा रामदेव ने कमर कसी है. हालाँकि उनके अनुयायियों की कमी नहीं है लेकिन एक बात जो आशंकित करती है वो ये की क्या इन आंदोलनों का कुछ असर होगा . हालाँकि इस आन्दोलन को लेकर केंद्र सरकार की घबराहट दिख रही है लेकिन एक बात हमेशा परेशां करती है की आम आदमी का क्या होगा ? कभी कभी ये सवाल भी मन में उठता है की आखिर जब इतने सारे और ऐसे लोग इस अभियान को समर्थन दे रहे हैं फिर भी भ्रष्टाचार आखिर जिंदा कैसे है ? कोई भी सरकारी काम हो बिना पैसे दिए काम नहीं हो सकता . यहाँ तक की पिछले दिनों जब मैं घर गयी थी ... दुगुना भाडा देकर एक दलाल से ट्रेन की टिकेट खरीदी . यानी कही ना कही मैंने भी भ्रष्टाचार में योगदान दिया और इसका मुझे बेहद अफ़सोस है. ऐसे ही बहुत से लोग छोटी छोटी जगहों पर किसी न किसी तरीके से भ्रष्टाचार को सपोर्ट करते हैं तभी तो वो इस कदर जकड़ा हुआ है जिसे निकाल पानें में शायद वर्षों लगेंगे. © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

चाय कि चुस्की ऑर ढेर सारे सवाल

दिल्ली के घर में सुबह चाय कि पहली चुस्की पर कोई मेरे साथ होता है तो वो है मेरी काम वाली " मीनू" । चाय पीते पीते बहुत सी बातें हो जाती हैं । कुछ उसकी कुछ मेरी... कभी कभी उसकी समस्याओं को सुलझाने कि कोशिश भी करती हूँ कभी सिर्फ सुन कर रह जाती हूँ। मीनू अकेले रहती है.... अशिक्षित बंगाली महिला... जो ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पाती है... तीन बेटियां है उसकी , उनके साथ वो एक रूम के घर में रहती है। हालाँकि उसकी बातों से कभी बेचारगी नहीं झलकी ... पर एक सच जो उसे अक्सर बीमार बना देता है वो है उसका पति .... वो किसी दूसरी औरत के साथ यही दिल्ली में ही दूसरी जगह रहता है। मैंने मीनू से पूछा कि क्यों नहीं वो उसके साथ रहती है .... मीनू का कहना था कि जब भी वो आया मुझे माँ बनाकर किसी और के साथ भाग गया। अब तीन बेटियां मेरे लिए बहुत है , इन्हें पालना ही मुश्किल होता है दीदी । बड़ी बेटी तेरह साल कि हो चुकी है । हमारे गाँव के ही लोग है वो उसके लिए रिश्ता लेकर आये थे। मैंने बात काटते हुए कहा तेरह साल में शादी आपका दिमाग ख़राब हो गया है। जो आप झेली है वो उसको क्यों झेलवाना चाहती हैं। अभी उसे पढ़ाईये ।...

मैं आजाद हूँ नहीं

मैं आजाद हूँ नहीं पर दिखती हूँ । मैं भी उड़ना चाहती हूँ, असीम - अनंत आकाश में । आजाद होना चाहती हूँ, भावनाओं के बंधन से, कर्तव्यों से, जिम्मेदारियों से, अपने आप से । पर सच है कि मैं आजाद हूँ नहीं दिखती हूँ ।

प्रेम पर्व और प्रिये तुम

प्रेम पर्व के परम मौके पर दो साल पहले लिखे इस लेख को मैंने दोबारा अपने ब्लॉग पर डाला है। अगर इससे किसी किसी की भावनाएं आहत होती है तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ... सभी प्यार करने वालों को समर्पित है ये लेख .... प्रेम .... प्यार ... इश्क.... मोहब्बत... कितने अच्छे शब्द हैं । किसी ज़माने में प्रेम में पड़े लोगों के लिए इनका गहरा मतलब हुआ करता था। एक प्यार से भरा दिल अपनी चाहत का इज़हार अक्सर पत्रों के माध्यम से किया करता था। फ़िर वो पत्र या तो 'मुग़ल ऐ आज़म ' फ़िल्म की तरह कमल के फूल की पंखुरियों में छिपा कर बहते जल के माध्यम से प्रियतमा तक पहुँचाया जाता था, या फ़िर किताबों में रख कर या फ़िर 'मैंने प्यार किया' फ़िल्म की तरह कबूतर बनता था संदेशवाहक। कितना रोमांटिक हुआ करता होगा तब प्रेम पत्र, जिसे पढ़ते ही नायिका चाहे ना चाहे इजहारे मोहब्बत को तुंरत स्वीकार कर लेती थी। आज दुनिया हाईटेक हो गई है, नायक नायिका बिंदास हो गए हैं। आज मिले...कल प्यार हुआ.... परसों शादी... और फ़िर तलाक, मामला ख़त्म और फ़िर नई कहानी शुरू । हाथ में मोबाइल है ...घर में कंप्यूटर। जब मन किया एस एम् एस क...

अंतर्मन

ज़िन्दगी चलती जा रही ... या यूँ कहें भागती जा रही है। खानाबदोश सी हालत हो गयी है। ऐसा लगता है जैसे सबकुछ छुटता जा रहा है ... सबकुछ । कभी कभी लगता है मैं क्या कर रही हूँ , क्यों कर रही हूँ ? शायद मैं ऐसी ही ज़िन्दगी चाही थी .... पर अब पता नहीं क्यों मुझे वापस वही पुरानी ज़िन्दगी में जाने की चाहत हो रही है। इस बार घर गयी ...लम्बे समय तक रही, शायद उसी का असर हो । धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा । मैं फिर से इस दुनिया में रम जाउंगी...शायद। बहुत दिनों बाद मैंने ब्लॉग पर कुछ डाला है ...वास्तव में इन दिनों मैं काफी उथल पुथल से गुज़र रही हूँ। छोटे शहर की ज़िन्दगी और महानगर की ज़िन्दगी के बीच बिलकुल फंसी हुई सी। दोनों जगहों में कुछ अंतर है तो कुछ समानता है। अंतर मिटा नहीं सकते पर समानता से थोडा कष्ट होता है। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

हमारे घर भी गिल्लू...

दिल्ली का घर... बिल्कुल छोटा सा... तीन कमरे का फ्लैट । कहते हैं की दिल्ली के फ्लेट्स में अगर सूरज की रोशनी पहुँच जाए तो ये बड़े सौभाग्य की बात है। कुछ ऐसा ही सौभाग्य हमें प्राप्त है। जी हाँ वैसे तो हम तीन कमरे और एक बड़े से हॉल वाले फ्लैट में रहते हैं ...लेकिन वास्तव में छोटे से क्षेत्र में ही ये चारो कमरे, रसोईघर सिमटा पड़ा है। बेडरूम से सटे एक छोटी सी बालकनी भी है जहाँ जाकर ये अहसास होता है की फ्लैट बनाने वाले ने कितना दिमाग लगाया होगा हर छोटे बड़े कोने का इस्तेमाल करने में। कहाँ हमारे आरा का घर जहाँ बालकनी में हमलोगों ने कितनी बार छुआ छुई खेली, यही नही मैंने तो वहां ढेर सारे गमले लगा रखे थे। गर्मी के दिनों में हम सब भाई बहन बालकनी में आराम से सकते थे इतनी जगह वहां थी। यहाँ... दिल्ली के घर में अगर तीन लोग खड़े हो जाएँ तो ऐसा लगता है की कितनी भीड़ हो गई ... अब चौथे के लिए जगह ही नही है। खैर... इन सब के बावजूद हम ख़ुद को बेहद सौभाग्यशाली मानते है क्योंकि ये घर काफ़ी खुला हुआ सा है। दिन चढ़ते ही सूरज की रोशनी से हमारी नींद खुलती है। दूसरा कमरा, वो भी बालकनी से ही सटा है, बहुत से जीवों की ...