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यादें

मेरा घर

मेरे अपने

और वो मीठी बातें

चाय की चुस्कियों के साथ

जब कटती थी दिन और
रातें

यादें और बस यादें ।

मेरा कमरा

मेरा बिस्तर

और वो दीवारें

जिसके इस पार और उस पार

सजती थी ढेरों तस्वीरें बार बार

मेरी बगिया इस बार

कह रही थी बार बार

करो मेरा श्रृंगार

फिर से करो मेरा श्रृंगार ।

माँ की झिड़की

पापा का ग़ुस्सा

क्यो याद आता है बार बार ।

Comments

rajnish said…
why u forgot ur specs, antena.
whenever u remember those things i sure u always remember me.
cheers
keepit up
bye
Priyambara said…
Rajnish mujhe pata hai tum hamesha meri kami ko hi to dikhaoge but thanks yaar for your funny comment which give me a smile on my face.
Innocent Ediot said…
Hi Blogger !
Accept my heartiest greets for your Blog.
-Gunjan

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https:// epaper.bhaskar.com/ patna-city/384/01102018/ bihar/1/ मु झसे अगर यह पूछा जाए कि दिनकर की कौन सी कृति ज़्यादा पसंद है तो मैं उर्वशी ही कहूँ गी। हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी जैसी कृति को शब्दबद्ध करने वाले रचनाकार द्वारा उर्वशी जैसी कोमल भावों वाली रचना करना, उन्हें बेहद ख़ास बनाती है। ये कहानी पुरुरवा और उर्वशी की है। जिसे दिनकर ने काव्य नाटक का रूप दिया है, मेरी नज़र में वह उनकी अद्भुत कृति है, जिसमें उन्होंने प्रेम, काम, अध्यात्म जैसे विषय पर अपनी लेखनी चलाई और वीर रस से इतर श्रृंगारिकता, करुणा को केंद्र में रख कर लिखा। इस काव्य नाटक में कई जगह वह प्रेम को अलग तरीके से परिभाषित भी करने की कोशिश करते हैं जैसे वह लिखते हैं - "प्रथम प्रेम जितना पवित्र हो, पर , केवल आधा है; मन हो एक, किन्तु, इस लय से तन को क्या मिलता है? केवल अंतर्दाह, मात्र वेदना अतृप्ति, ललक की ; दो निधि अंतःक्षुब्ध, किन्तु, संत्रस्त सदा इस भय से , बाँध तोड़ मिलते ही व्रत की विभा चली जाएगी; अच्छा है, मन जले, किन्तु, तन पर तो दाग़ नहीं है।" उर्वशी और पुरुरवा की कथा का सब...

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