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तिनका तिनका तिहाड़ : सबकी अलग कहानी

ति हाड़ कि महिला कैदियों द्वारा लिखी कविताओं का संकलन 'तिनका तिनका तिहाड़'  पढने का मौका मिला. उनकी कविताओं से याद आया मुझे वो दिन जब एक कार्यक्रम के शूट के लिए तिहाड़ में बंद महिलाओं से मिलने का मौका मिला था. तब तक जेल को मैंने या तो कल्पनाओं में देखा था या फिर फिल्मों में. पहली बार तिहाड़ के अन्दर जाते हुए एक अजीब सी सिहरन हुयी थी. वहाँ बंद महिला कैदियों से जब बातें हुई तो उनका दर्द हमें भी दुखी कर गया. उनकी बातों से एहसास हुआ कि अपनों से दूर् होने कि चुभन.... ज़िंदगी को एक चहारदिवारी के भीतर समेट लेने कि घुटन क्या होती है...और कैसे एक घटना ( दुर्घटना कहना ज़्यादा उचित होगा ) किसी कि पूरी ज़िंदगी बदल देती है. वहाँ ज्यादातर ऐसी मिली जो कहना बहुत कुछ चाहती थी पर कुछ भी कह नही पा रही थी... सिर्फ़ उनकी आँखें सजल हो जा रही थी.  और कुछ ऐसी भी मिली जो वहाँ के माहौल से पुरी तरह जुड़ गयी थी... अब सलाखों से कोई फर्क नही पड़ता था... वही उनकी दुनिया थी. कु छ वैसा ही उनकी कविताएँ पढ़ते हुए मैंने महसूस किया. एक कसमसाहट है उनकी कविताओं में...किसी कि दुधमुँही बेटी को माँ के ...

अह्सास ( लघु कथा 2)

तुमने जो बोरोलिन का ट्यूब दिया था... बहुत सम्हाल कर रखी थी मै. उसके साथ ही एहसास हुआ था तुम्हारे प्यार का...ये भी एहसास हुआ था कि तुम्हे मेरी कितनी परवाह है. सुनो... बोरोलिन का ट्यूब खत्म होने को है...क्या तुम्हारा प्यार भी ? © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित! 

अन्तर्द्वन्द

ल ड़ती हूँ एक मुकदमा हर रोज़ मैं कभी तुम्हें कटघरे में रखती हूँ तो कभी तुम्हारी तरफ़ से जिरह भी मैं करती हूँ तब सवाल भी मेरे होते हैं और जवाब भी मैं ही देती हूँ जिरह के इस खेल में... रात सुबह में तब्दील हो जाती है और, सुबह रात में.... पर, ना ही कभी तुम जीत पाते हो और ना मैं . यूँ लगता है जैसे मस्तिष्क कि जटिल बनावट में 'तुम' अटक से गए हो कही. © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

पड़ोस कि कुछ बातें और बचपन कि यादें

ती न मंज़िल वाले मकान के दूसरी मंज़िल पर स्थित है मेरा छोटा सा फ्लैट. फ्लैट्स आपस में इस तरह से जुड़े हुए हैं कि ऊपर वाले या नीचे वाले फ्लैट में सामान्य आवाज़ में भी बातें कि जाए तो हमारे फ्लैट में स्पष्ट सुनायी देती है. हम अपने किचन में काम करते रहते है...और हर फ्लैट कि ख़बर हो जाती है कि कहाँ क्या हो रहा है. हमारे फ्लैट के बिलकुल ऊपर वाले फ्लैट में जो परिवार रहता है उसमें पति पत्नी और दो बच्चे शामिल है. सनी बेटे का नाम है तीन या चार साल का होगा.  मई में उस परिवार में परी का आगमन हुआ है. पहले अक्सर उस घर से ज़ोर ज़ोर से झगड़ने कि आवाजें आती रहती थी. कभी कभी तो उनकी वजह से हमारी नींद खराब हो जाती थी. परी के आने के बाद से माहौल में थोड़ी शान्ति है. बस सब उस में ही व्यस्त रहते है... परी को ये चाहिए... परी को वो चाहिये. सुनकर (देख नही पाती) अच्छा लगता है कि घर में बेटी का आना वहाँ के लिये सुखद है. बि लकुल नीचे वाले फ्लैट में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते है. अंकल कि उम्र क़रीब पचहत्तर साल होगी. उन्हें ऊँचा सुनायी देता है. पोपली ज़ुबान है उनकी. आंटी चिल्ला चिल्ला कर उनसे बात करती है....

अंधभक्ति का स्याह सच

क ल कुछ चैनल्स पर डिस्कशन चल रहा था... विषय था 'आसाराम'. डिस्कशन में ढेर सारे मुद्दे उठ रहे थे... लेकिन जो बात मुझे बार बार खटक रही थी वो थी आरोपी को बार - बार 'संत' से संबोधित करना या फिर नाम के अंत में 'बापू' संबोधन का प्रयोग . एक तो हमारे देश में वैसे ही इतने 'भक्त' भरे पड़े है, एक व्यक्ति ने किसी कि भक्ति शुरू कि तो पूरा हुजूम उसके  पिछे चल पड़ता है. आश्रम शुरू करना  व्यवसाय बनता जा रहा है. ऐसी घटनाये होती रहती है फिर भी अनुयायियों कि संख्या में कोई कमी नही आती. लाखों का चंदा ऐसे ही  किसी तथाकथित गुरुओं को समर्पित कर दिया जाता है और फिर ऐसे लोग उसे नाजायज तरीके से खर्च करते है. ये भी सोचने वाली बात है कि आम लोगों कि आख़िर ऐसी कौन सी भावना काम करती है जो वे आसानी से किसी के भक्त बन जाते है. भक्त ही नही अंधभक्त बन जाते है और ऐसे गुरुओं को बापू, संत, भगवान से संबोधित करने लगते है. उन गुरुओं का कहा पत्थर कि लकीर हो जाता है... उनकी वजह से खान पान, रहन सहन भी बदल जाता है. यहाँ तक कि अगर कोई उसके खिलाफ बोले तो वो भी दुश्मन हो जाता है.  क भी कभी ऐसा ...

आख़िर जिया ने ऐसा क्यों किया ?

जि या खान नही रही. वैसे एक अदाकारा के तौर पर वे मुझे कुछ ख़ास पसंद नही थी, किन्तु जिस तरीके से उन्होंने अपनी ज़िंदगी खत्म कर ली, एक महिला के तौर पर ना चाहते हुए भी मैं उस से जुड़ती चली गयी. एक समय तो ऐसा लगा कि कुछ देर और उसकी कहानी टी वी पर देखी तो भावनात्मक रुप से कमजोर हो जाऊँगी. एक 25 साल कि प्यार में पागल युवती, जिसने अपने प्यार को साबित करने के लिए अंततः खुदकुशी का सहारा लिया . प्यार में पागल होने का पता भी उसके पत्र से चलता है, जिसपर उसके हस्ताक्षर भी नही है... जिसमें बहुत ही निजी बातें भी लिखी गयी है, जिसे चैनल वाले बार बार दिखा रहे है. जिन बातों को उसने  अब तक सबसे छिपाया होगा वो सार्वजनिक हो चुका है. आ ज कि पीढ़ी "मूव ऑन" वाली है... जब तक प्यार है तब तक रिश्ता है नही तो रास्ते अलग. किसी के लिए जान देने जैसी घटनाएँ अब 'रेअर' होती हैं. आमतौर पर ऐसे कदम अत्यधिक गुस्से में या अत्यधिक डिप्रेशन के कारण उठाते हुए ही अब तक देखा, सुना या पढ़ा है. फिर किसी दुसरे की वजह से ख़ुद को खत्म कर देना ये कहाँ तक सही है ?   मे रे दिमाग में बार बार यही सवाल आ रहा है ...

पापा आपकी बहुत याद आती है.

म ई माह कि शुरुआत हो गयी. ना चाहते हुए भी कुछ यादें कभी पीछा नही छोड़तीं. 2012 का यही तो महीना था जब अन्तिम बार पापा को सही से बैठते हुए और चलते हुए देखे थे. क़रीब बीस दिनों कि छुट्टी लेकर घर गए थे... पापा के हर डाइट कि ज़िम्मेदारी मेरी थी, समय पर नही लेने पर गुस्साते भी थे. बीस दिन देखते देखते बीत गए और फिर आ गया मेरे दिल्ली आने का दिन.... पहली बार पापा को इतना भावुक देखे... उन्होंने कहा - "मेरी बेटी आज जा रही है हम कुछ नही खाएँगे."  हम अपने हाथों से खिचड़ी बनाये थे,  पापा से कहे मेरा मन रखने के लिए खा लीजिए... मेरी जिद पर वो दो चम्मच खा लिए. पहली बार पापा को इतना भावुक देख हमे अच्छा नही लग रहा था, लेकिन हमे क्या पता था कि वास्तव में उन्हें भी ये एहसास था कि अब उनके पास ज़्यादा दिन नही है. ... औ र फिर अगस्त महीने में जब घर गए.... पापा कि स्थिति देख कर बहुत घबराहट हुयी साथ ही अफसोस भी हुआ, तब तो वो उस स्थिति में भी नही थे जो मेरी जिद पर दो चम्मच पी भी सके.       स मय बीत जाता है... पर यादें कभी नही मिटती. उनके जाने के बाद समझ आया कि उस दिन पापा...