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वसंतपुत्री का वसंत से पहले चले जाना...


बसे मैंने हिंदी साहित्य पढ़ना और समझना शुरू किया....तब से कुछ लेखिकाओं के लेखन की कायल रही जिनमें कृष्णा सोबती और मन्नू भंडारी का नाम सबसे ऊपर है। दिलचस्प ये कि दोनों ही लेखिकाओं से मिलने और साक्षात्कार करने का कभी सौभाग्य नहीं मिल सका। अपने कार्यक्रम के लिए दोनों से ही मेरी बातें हुई और दोनों ने ही हमेशा मना किया। 2015 से लेकर 2017 के बीच  कृष्णा सोबती जी से तो हर तीन चार महीने में  कॉल कर के उनकी तबियत पूछती और कैमरा टीम के साथ घर आने की अनुमति मांगती...अंततः मैं समझ गई वे इस इंटरव्यू के लिए तैयार नहीं होंगी और मैंने उन्हें फोन करना बंद कर दिया। जब ज्ञानपीठ मिलने की खबर मिली तब ऐसा लगा कि शायद अब साक्षात्कार के लिए तैयार हो जाएं फिर पता चला कि तबियत खराब होने की वजह से उनकी जगह अशोक वाजपेयी जी ने उनका पुरस्कार ग्रहण किया।  वे मेरी प्रिय लेखिकाओं में से थीं और हमेशा रहेंगी। मैंने कम लेखिकाओं के लेखन में इतनी उन्मुक्तता देखी जो यहाँ पढने को मिली।  कई बार उनकी कहानियों पर खासा विवाद भी हुआ क्योंकि  किसी लेखिका ने साहस के साथ स्त्री मन और उसकी ज़रूरतों पर पहली बार लिखा था।  एक वर्ग विशेष ने तो उनकी कहानियों को स्त्री के कुंठित मन की गाथा तक कह डाला किन्तु उन्होने हमेशा अपने समय से आगे की रचना की, नए मुहावरे गढ़े जो सदैव महिला सशक्तिकरण को एक नयी दिशा देता रहेगा। उन्होंने कथा भाषा को भी एक नई दिशा दी।  
कहते हैं उनका जन्म जब हुआ था तब मौसम वसंत का था आज जब कुछ दिनों में वसंत आने को है उन्होने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इस वसंतपुत्री से नहीं मिल पाने का मलाल तो हमेशा रहेगा।    

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