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Showing posts from 2018

टुकड़े में ज़िन्दगी ( कहानी)

https://epaper.prabhatkhabar.com/1918875/Surbhi/Surbhi#page/6/1 ( एक और कहानी प्रकाशित ) 

मूल कहानी पढ़ें --


“नींद भी तो मौत ही है और सपने, मन की गहराई में बैठे अहसास। ऐसी चाहत जो छद्म रूप में सपनों में पूरी होती है। मिस शर्मा अक्सर सपनों में भटकती है, जैसे किसी की तलाश हो ।” वे जहां रहती हैं उसका नाम ‘नवांकुर’ है। ‘नवांकुर’ नाम है पर असल में लोगों के जीवन की सांध्य बेला का ठिकाना है ये आश्रम। यहाँ जाड़े की सुबह बेहद सुस्त होती है। जब तक मारिया चाय के लिए आवाज़ ना लगाए, सब अपनी-अपनी रजाईयों में दुबके होते हैं। इस वृद्धाश्रम में आमतौर पर दो ही तरह के लोग होते हैं एक वो जिन्हें अपना कहने के लिए कोई नहीं, दूसरे वो जिनके अपनो ने हीं उन्हें पराया कर दिया।  मिस शर्मा पहले केटेगरी में आती थी। वृद्धाश्रम में रहने का निर्णय उन्होंने स्वयं लिया था। अपने घर को किराए पर देकर तीन सालों से वे यहां रह रही थी। क्षमता के अनुसार यहां कमरे उपलब्ध थे। पैसे वालों के लिए व्यक्तिगत कमरा था और जिनके पास ज़्यादा पैसे नहीं थे उनके लिए डॉरमेट्री में रहने की व्यवस्था थी। डॉरमेट्री में रहने वाले ज़्यादातर लोग अपनो के …

जो बीत गई सो बात गई

"जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर कहाँ मिले पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई " शायद आठवीं या नौवीं कक्षा में थी जब ये कविता पढ़ी थी... आज भी इसकी पंक्तियाँ ज़ेहन में वैसे ही हैं।  उससे भी छोटी कक्षा में थी तब पढ़ी थी - "आ रही रवि की सवारी। नव-किरण का रथ सजा है, कलि-कुसुम से पथ सजा है, बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी। आ रही रवि की सवारी।" बच्चन जी की ऐसी न जाने कितनी कविताएँ हैं जो छात्र जीवन में कंठस्थ हुआ करती थीं। संभव है इसका कारण कविताओं की ध्वनि-लय और शब्द रहे हों जिन्हें कंठस्थ करना आसान हो। नौकरी के दौरान बच्चन जी की आत्मकथा का दो भाग पढ़ने को मिला और उनके मोहपाश में बंधती चली गयी। उसी दौरान 'कोयल, कैक्टस और कवि' कविता पढ़ने का मौका मिला। उस कविता में कैक्टस के उद्गार  - "धैर्य से सुन बात मेरी कैक्‍टस ने कहा धीमे से, किसी विवशता से खिलता हूँ, खुलने की साध तो नहीं है; जग में अनजाना रह जाना कोई अपरा…

बिहार का अर्थ ही होता है छठ

उस दिन का इंतज़ार कर रही जब साड़ी-चूड़ी पहनने... हाथ जोड़कर नमस्कार करने, इन्हें भी गुलामी और अंधविश्वास का प्रतीक माना जाएगा।  जो हिन्दू आस्था के खिलाफ जितना घटिया बोलेगा/लिखेगा वह सर्वाधिक बुद्धिसंपन्न माना जाएगा।  'हिन्दू आस्था' जी हाँ...क्योंकि सिन्दूर पर शुरू हुई चर्चा आँचल पसारने और इकहरी सूती साड़ी पहनकर पानी में भीगने और अंग प्रदर्शन तक पहुँच गई।  समझ नहीं आता कि इन महान लोगों की  ऐसी तार्किक और क्रांतिकारी सोच 'छठ पूजा' दौरान ही क्यों उमड़-उमड़ कर बाहर आती है।  कभी तो ये लगता  है कि इन्हें भी पता है कि इनकी लोकप्रियता उसी क्षेत्र के लोगों से है जिन्हें ये अनपढ़, अंधविश्वासी और भी न जाने किस-किस उपमा से सम्बोधित करती रहती हैं, और इस क्षेत्र के लोग उनकी तारीफ़ में कसीदे पढ़ते रहते हैं। यह सवाल भी मन में उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी 'बिहारी' ने इन्हें कुछ व्यक्तिगत क्षति पहुंचाई हो?  जिस छठ को लेकर हर बार ये लोग हाय तौबा मचाते हैं, जिसके हर विधि-विधान  पर इन्हें समस्या है, मुझे लगता है कि शायद इन्हें कभी मौक़ा नहीं मिला कि वे इसके साक्षी भी बने सकें, दूर-दूर…

हुंकार से उर्वशी तक...(लेख )

https://epaper.bhaskar.com/patna-city/384/01102018/bihar/1/


मुझसे अगर यह पूछा जाए कि दिनकर की कौन सी कृति ज़्यादा पसंद है तो मैं उर्वशी ही कहूँगी।
हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी जैसी कृति को शब्दबद्ध करने वाले रचनाकार द्वारा उर्वशी जैसी
कोमल भावों वाली रचना करना, उन्हें बेहद ख़ास बनाती है। ये कहानी पुरुरवा और उर्वशी की है।
जिसे दिनकर ने काव्य नाटक का रूप दिया है, मेरी नज़र में वह उनकी अद्भुत कृति है, जिसमें
उन्होंने प्रेम, काम, अध्यात्म जैसे विषय पर अपनी लेखनी चलाई और वीर रस से इतर श्रृंगारिकता,
करुणा को केंद्र में रख कर लिखा। इस काव्य नाटक में कई जगह वह प्रेम को अलग तरीके से
परिभाषित भी करने की कोशिश करते हैं जैसे वह लिखते हैं -
"प्रथम प्रेम जितना पवित्र हो, पर , केवल आधा है;
मन हो एक, किन्तु, इस लय से तन को क्या मिलता है?
केवल अंतर्दाह, मात्र वेदना अतृप्ति, ललक की ;
दो निधि अंतःक्षुब्ध, किन्तु, संत्रस्त सदा इस भय से ,
बाँध तोड़ मिलते ही व्रत की विभा चली जाएगी;
अच्छा है, मन जले, किन्तु, तन पर तो दाग़ नहीं है।"
उर्वशी और पुरुरवा की कथा का सबसे पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, इसके अलावा…

हिंदी की विवशता

हिंदी सिर्फ हमारी भाषा नहीं बल्कि एक पूरी संस्कृति है। विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में चौथे
स्थान पर है हिंदी। आंकड़ों के लिहाज से यह कहा जा सकता है कि आज हिंदी विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर
है। हिंदी भाषी जहां भी गए हिंदी के साथ ही उसकी सम्पूर्ण संस्कृति लेकर गए, जिन्हें नए देश की आबो हवा में
भी संरक्षित रखा और नए सिरे से प्रसारित करने का काम किया। मॉरीशस भी ऐसे ही देशों में से एक है जहां
अठारहवीं सदी में बड़ी संख्या में भारतीयों को मजदूरी करने के उद्देश्य से लाया गया था। इन्हीं मजदूरों ने नए
मॉरीशस की नींव रखी। वर्तमान समय में मॉरीशस को छोटा भारत की संज्ञा दी जाती है। आर्यसभा संस्था 1903
से हिंदी के प्रचार प्रसार एवं सामाजिक कार्यों में लगी है। आज इस संस्था की 200 से ज़्यादा शाखाएं हैं जो हिंदी
सिखाती है। इस संस्था की नींव रखे जाने के पीछे की घटना भी दिलचस्प है। गिरमिटिया देशों में हिंदी काफी
फली फूली। त्रिनिदाद एवं टोबैगो के रहने वाले पंडित रामप्रसाद परिसान बताते हैं कि हिंदी को इन देशों में
दूसरी भाषा का दर्जा प्राप्त है। छोटे-छोटे रोजमर्रा के शब्दों के लिए प्रायः हिंदी भ…

इमरोज़ होना आसान नहीं...

आज मैं आपणें घर दा नंबर मिटाइआ है ते गली दे मत्थे ते लग्गा गली दा नांउं हटाइया है- आज मैंने अपने घर का नंबर मिटाया है और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ यह एक शाप है, एक वर है और जहाँ भी आज़ाद रूह की झलक पड़े – समझना वह मेरा घर है- सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम पंजाबी के साथ ही हिंदी के पाठकों के दिलों में आज भी ज़िंदा हैं। मूलतः पंजाबी
में लिखने वाली अमृता जी की ज़्यादातर रचनाएँ हिंदी में भी उपलब्ध हैं। किशोरावास्था से ही लेखन कार्य शुरू
करने वाली अमृता ने कविताएँ, कहानियों  सहित विभिन्न विधाओं में लिखा और इसके लिए उन्हें देश और अनेक
सम्मान और पुरस्कार मिले। उनकी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ को भी लोगों ने खूब पसंद किया।
अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 में पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था।  बचपन लाहौर में बीता, शिक्षा भी