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Showing posts from 2016

मौत का चक्रव्यूह

अब तक गूँज रही है कानों में वो अधफँसी आवाज़ जो मनाया करती थी उत्सव अपने वजूद का । अधफँसी आवाज़ गुनगुनाती थी ज़िन्दगी के गीत, वो जीना चाहती थी, हाँ, वो जीना चाहती थी, तोड़कर, मौत के सारे चक्रव्यूह। लड़ती रही थी ताजिंदगी ज़िन्दगी की व्यूह रचनाओं से जानती थी जुगत उनसे निकल पाने की ।
उस रात अँधेरा घना था औघड़ ने ऐसा व्यूह रचा अंतिम चक्र में फँस कर रह गई अभिमन्यु की तरह वो आवाज़ खामोश हो गई सदा के लिए !!


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

स्त्री

बदलते घर के साथ अक्सर छूट जाती है थोड़ी सी वो भी हर बार समा जाती है एक नए खोल में पहन लेती है एक अलग चेहरा समय की मांग के अनुसार भरती है स्वांग फिर किसी रोज़- असहनीय पीड़ा और बेचैनी से गुज़रते हुए स्त्री उतारती है अपनी केंचुली निकलती है बिलकुल नई होकर विरोध, मायूसी और शिथिलता उसके कदम रोकते हैं लेकिन वो रूकती नहीं अदम्य जिजीविषा के साथ निकल पड़ती है स्व की तलाश में वो समझ जाती है ओढ़े गये जीवन से कहीं बेहतर होता है
जीना, उन्मुक्तता के साथ, एक पूर्णता के साथ


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अंतर

शीशे के उस पार
ज़िन्दगी का उजास
उजली धूप
गुनगुनाती हवा
फूल-तितलियाँ
आपस में बातें करते आज़ाद पंछी
शीशे के इस पार
अंतहीन दर्द
चुभते हुए दिन
अमावस सी ज़िन्दगी
पृथ्वी जितना उसका भार
शीशे के इस पार और उस पार का अंतर बड़ा है
इस पार से हम देख सकते हैं
उस पार की हरियाली
ज़िन्दगी की सुंदरता
पर वहाँ से नहीं देख पाते
इस तरफ की जीजिविषा
खुद को ज़िंदा रखने का संघर्ष
सच मानो तो असल ज़िन्दगी वही जी पाते हैं
जो रहते हैं शीशे के इस तरफ
कि वो वाकिफ होते हैं ज़िन्दगी के चेहरों से
कि वो क्रूर क्षणों में भी सपने देखना नहीं छोड़ते
कि वो जानते हैं शीशे के उस तरफ सिर्फ एक छलावा है
जीवन का सच तो छिपा है यहीं कही ।
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हंसा सर

आज शिक्षक दिवस पर विद्यालय और शिक्षकों के बारे में दोस्तों से बातें करते हुए कब बचपन में पहुँच गयी पता ही नही चला। हम सभी बारी बारी से अपने शिक्षकों को याद कर रहे थे स्मृति में गोते लगाते हुए कब 'हंसा' सर पर ध्यान केंद्रित हो गया ध्यान ही नहीं रहा। 'हंसा सर' पुकार का नाम था, वैसे तो उनका नाम 'हंसराज महाराज' था, पर हम सब उन्हें हंसा सर ही बोलते थे। हमलोगों को वे 'कत्थक' सिखाते थे। हमेशा उन्हें झक सफ़ेद कुरता और चौड़े पाँयचे वाला पैजामा पहने ही देखा। मुंह में पान की छोटी सी गिलौरी दवबाए, बोली में अवधी की मीठास घुली रहती। केजी में रहे होंगे या उससे थोड़े बड़े जब 'कत्थक' सीखना शुरू किये थे। घुंघरू गूँथने से लेकर बाँधने तक का सलीका उन्होंने सिखाया। मैं और मेरी बड़ी बहन दोनों साथ जाते।  वैसे भी जहां दीदी जाती मुझे भी वहीँ जाना था । हंसा सर लखनऊ से लेकर बनारस घराने तक की खासियत बताया करते थे। दीदी तो सब सीख लेती, मैं पिछड़ जाती, और फिर हंसा सर पीठ पर धम धम धौल जमा देते...बहुत गुस्सा आता था, लगता था मुझे तो नापसंद करते हैं।
एक बार वे हमारे घर आए। मम्मी उनसे …

कॉलेज के दिन

पुरानी डायरियों के पन्ने पलटते हुए अक्सर कई -कई घटनाएं ज़ेहन में ताज़ा हो जाती हैं। कल ऐसे ही पुराने दिनों को याद कर रही थी, पन्ने पलटते हुए कॉलेज के दिनों की यादों में खो गयी।  तब की कुछ घटनाओं का ज़िक्र था उसमें।

उन दिनों  दसवीं बोर्ड देने के बाद इंटर के लिए कॉलेज में ही नामांकन लेना होता था।  हमारे आरा में बमुश्किल एक या दो विद्यालय ही ऐसे थे जहां इंटर की पढ़ाई की सुविधा थी। इंटर में नामांकन लेने के लिए भी हमारे लिए सबसे उपयुक्त  'महाराजा कॉलेज' ही था, इसका सबसे आसान कारण था,  उसका एक गेट हमारे मोहल्ले में खुलता था , यानि घर के बिलकुल पास।  मेरे घर की छत से तो उस कॉलेज का मैदान भी नज़र आता था।  सहशिक्षा वाला कॉलेज था। लड़के और लडकियां साथ पढ़ते थे, वैसे कहने को साथ थे, लड़कियों के लिए कक्षा में आगे की तीन बेंच आरक्षित रहती थी उसके पीछे की बेंच खाली, फिर लड़के बैठते थे। क्लास भी हमेशा नहीं चला करती, लड़कियों को तो ये भी सुविधा थी कि जिस रोज़ क्लास चलने वाला हो लड़के बता कर जाते थे।   जबतक प्रोफेसर क्लास में ना जाएँ लड़कियों को जाने की अनुमति नहीं थी। शिक्षक के साथ साथ या यूँ कह लें पीछे…

एक ज़िंदगी में अनेक ज़िंदगियाँ

रात 
जब अंतिम सफर पूर्ण करती है
नई ज़िन्दगी
मुस्कुराती मिलती है ,
नये दिन के साथ 
एक नयी ज़िन्दगी।
एक ज़िन्दगी में
कितनी 'ज़िंदगियाँ '
'जी ' लेते हैं हम ?


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ज़रूरी सवाल....

मेट्रो में सफर करते हुए हर रोज़ एक अलग ही अनुभव होता है, लेकिन इन दो दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।

घटना १ (सामान्य डब्बा)
कल सुबह ऑफिस आते हुए मेट्रो में बहुत भीड़ थी (जो अक्सर होती है ) . मैं कोने में बुज़ुर्गों के लिए आरक्षित सीट के पास खड़ी हो गयी।  वहीं  सीट पर एक बुज़ुर्ग बैठे सुडोकु खेल रहे थे,  उन्होंने मेरे थैले को अपनी गोद में रख लिया, मुझे थोड़ा अजीब लग रहा था इसलिए मैंने मना भी किया लेकिन वो रख कर फिर से सुडोकु में व्यस्त हो गए।  मंडी हाउस पर उतरते वक़्त मैंने उन्हें धन्यवाद कहा।

घटना २  (महिला डब्बा )
शाम के समय भी मेट्रो में कुछ ज़्यादा ही भीड़ थी।  दो मेट्रो के बाद तीसरी के महिला कोच में थोड़ी जगह मिल पायी।  यमुना बैंक स्टेशन पर मेट्रो के रुकते ही भीड़ का सैलाब जिस तरह धक्का देते हुए अंदर घुसा, वो डरावना था।  अंदर एक महिला अपने बच्चे के साथ बाहर निकलने के लिए गुहार लगा रही थी, लेकिन किसी लड़की/महिला ने उसे बाहर निकालने की पहल नहीं की उलटा वो उससे उलझ पड़ी और उलटी सीधी बातें करने लगें। वो महिला दरवाज़े के पास से भीड़ के धक्के की वजह से बिलकुल अंदर दरवा…

ओस की बूँद

फलक पर चाँद -चांदनी गुनगुना रहे थे   सितारे कहकहे लगा रहे थे और, रात सिंड्रेला की तरह अपनी बेबसी पर रो रही थी।   उस रोज़, रात के अश्कों को समेट लिया   लॉन में उग आई नन्ही सी दूब ने भोर की पहली किरण के साथ ही आँखों में उतर आया इंद्रधनुष और खिलखिलाती हुई  अलमस्त सुबह ने अंगड़ाई ली।   


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इंतज़ार

इससे पहले कि-
सभी यादें धुंधली पड़ने लगे
इंतज़ार की रातें नियति बन जाए
ज़िन्दगी की राहें ख़त्म होने को आए-
सिर्फ एक बार
चले आना
उस घरौंदे में,
जहां जी थी हमने 
थोड़ी सी ज़िन्दगी
देखे थे गुलाबी ख्वाब
सेंकी थी अपने हिस्से की धूप
चंद पल के लिए ही सही -

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मेरा संसार

तू पारस, और, मैं हूँ पत्थर
मैं एक शिला, तू शिल्पकार 
तू रवि, मैं तुझसे रौशन
मैं झरना, तू सागर विशाल
भटकूँ मैं तीनो लोक, फिर भी 
तुझ में ही निहित, मेरा संसार

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ये यादें ....

यादों के तंग गलियारों से गुज़रते हुए अक्सर रूह छिल जाती हैं।  लहूलुहान होने के बाद भी उन गलियारों से गुजरने के मोह से खुद को रोक नहीं पाती।  पुरानी डायरियों को पढ़ने का मोह छोड़ नहीं पाती। दिमाग चाहता है पढ़ना बंद करूँ , और मन उसे बार बार पढ़ना चाहता है।  दोस्त कहते हैं आत्ममुग्धा ना बनूँ, दूसरों की चीज़ें पढूं जो मेरी सोच को विस्तार दे सके।  क्या बताऊँ उन्हें कि ये, उपन्यासों से बेहतर लगती है, जिसकी मुख्य किरदार मैं ही तो हूँ। मेरे आस पास की घटनाएं जो कभी रुलाती है कभी गुदगुदाती हैं, पुरानी यादों को ताज़ा कर जाती हैं।


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