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यूँ हीं ....

1.  लफ्ज़ चंद अंगारे जैसे लफ्ज़, फेंक दिया मेरी रूह पर, झुलस गयी ख्वाहिशें लेकिन- ज़िंदा है अब भी मेरा इश्क़ सहमा-सा ही सही !! 2. कमीज एक पीली -सी कमीज थी तुम पर बेहद जंचती थी आयरन करते हुए उस दिन,  उसका कॉलर जल गया था, कुछ कहा नहीं था मैंने, लेकिन,   बहुत कुछ खो दिया था - कल वैसी ही कमीज   किसी और ने पहनी थी लगा कि तुम हो  !! © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

शेष (क्षणिका)

कुछ पीले, उदास दिन, चंद खामोश, डूबती शामें, अनगिनत जागती रातें, और... सफ़ेद, संदली, सुबह का इंतज़ार - ज़िन्दगी के पन्नों में, अब यही तो शेष है । © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

कड़वा सच

कभी कभी राह चलते हुए कुछ ऐसे दृश्य नज़र आ जाते है, जो मन -मस्तिष्क को झकझोर कर रख देते हैं , नतीजतन  देर तक हम उसके असर से बाहर नही आ पाते । मेरा ऑफिस आना - जाना अक्सर निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन से होता है।  वहाँ सीढ़ियों पर कुछ भीख मांगने वाले अक्सर बैठे दिख जाते है । वैसे मैं व्यक्तिगत तौर पर भीख देने के सख्त खिलाफ हूँ। उनलोगों को लेकर मेरा अनुभव भी कड़वा ही रहा है, फिर भी उनकी तरफ ध्यान चला ही जाता है।   उनलोगों में एक बेहद बुज़ुर्ग है, शायद कुष्ठ रोगी भी है... देह के नाम पर हड्डियों का ढांचा मात्र है। अक्सर अपने भिक्षापात्र , जो स्टील का जग है, एक जंजीर से बाँध कर रखते है और उस जंजीर का एक छोर उनके कमर से बंधा होता है । वहीं,एक ऐसा व्यक्ति भी है, जिसके दोनों हाथ नहीं है। ये सभी साथ हैं या अलग अलग, मेरी समझ में अब तक ये नहीं आया ।   वहाँ  अक्सर कुछ बच्चे भी नज़र आते हैं ,जो हर रोज़ भीख मांगने का अलग अलग तरीका अपनाते रहते हैं। कभी लिफ्ट में चढ़ कर ऊपर - नीचे करते रहेंगे, तो कभी किसी और तरीके ...

शक (कहानी "समानांतर" का एक अंश)

सू रज की पहली किरण के साथ मीता नींद से जागी। ऐसा लग रहा था जैसे अपनी ज़िंदगी के कितने खुशनुमा पल उसने सोते हुए गुज़ार दिए थे। एक लम्बी और गहरी नींद के बाद आज वो जागी थी, बेहद ताज़गी महसूस कर रही थी वो। मीता पुरानी सभी यादों को अपनी ज़िंदगी से मिटा देना चाहती थी। राजन की दी हुई जिस पायल की रुनझुन से उसका मन नाच उठता था आज वही उसे बेड़ियां लगने लगी थीं, कुमकुम की बिंदी लगाकर वो अपना चेहरा घंटो आईना में निहारा करती थी आज वही उसे दाग से लगने लगे थे।  मीता ने अपना लैपटॉप ओन किया और राजन को सारी बातें लिख डाली।  ये भी लिखा कि जिस दिन तुमने पहली बार मुझे शक की नज़र से देखा था सच कहूँ राजन तब ज़िंदगी में सिर्फ तुम थे, लेकिन मेरे प्रति तुम्हारा अविश्वास और मेरे लिए वक़्त नहीं होना, मुझे मोहन के करीब - और करीब लाता गया।  जब भी मुझे तुम्हारी ज़रूरत थी राजन, तुम मेरे पास नहीं थे लेकिन मोहन हमेशा साथ रहा और इसके लिए मै तुम्हारी हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगी, क्योंकि अगर तुम ऐसा नहीं करते तो मैं मोहन की अहमियत को कभी समझ नहीं पाती। मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना, मैं तुम्हारी दुनिय...

क्षणिकाएँ

१. मेट्रो की ज़िन्दगी कंक्रीट का जंगल मशीन से लोग खोजती रही खुद को दिख रही थी दूर तक सिर्फ धुंध । २. परेशानियों के थपेड़े यादों की रेत से बहा ले गए कई अनमोल पल शेष रह गया तो सिर्फ तुम्हारे प्यार का मोती जो अब भी बंद है मन की सीपी में कहीं। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

पुनर्जन्म

अब जानना चाहते हो मेरी मौत का कारण ?? याद नहीं - सड़ी गली रिवायतों   की   बोझिल मान्यताओं   की लिजलिजी सोच की आडम्बरयुक्त   रिश्ते की ज़िम्मेदारियों के बोझ की ज़हरीली घुट्टी तुमने ही तो पिलाई थी। बचपन में ही मेरे कोमल मन पे गोदा था तुमने दकियानूसी तालीम को , दर्द से कराही थी मैं रोना भी चाहती   थी लेकिन ज़हर के असर ने छीन लिया था हक़ - रोने का सवाल पूछने का अपनी बातें कहने का आज़ादी की सांस लेने का। मैंने भी समेट लिया खुद को अपने ही खोल में तुम सब मेरी हंसी देखते रहे लेकिन वो तो खोखली थी मै तुम्हारे पास बैठ कर सुडोकु खेलती पर   दिमाग तो उलझा था ज़िन्दगी के जाल में मैं अभी मरना नही चाह्ती थी   कई अरमान थे जिन्हें पूरा करना था कई ख्वाब थे जो अब अधूरे ही रहेंगे सच कहूँ - मुझे मौत देनेवाले तुम्ही हो - तुमसब ।। -------------- प्रियम्बरा © 2...

धुंधली सुबह

सर्द सुबह जब धूप भी धुंध की चादर   में छिपी रहती है - जब दूर तलक सफ़ेद सन्नाटा पसरा होता है - अक्सर कुछ धुंधली आकृतियाँ बनती हैं फिर लुप्त हो जाती हैं कोहरे में कहीं - तब अपने वजूद को बचाये रखने के लिए संघर्ष करती सहमी चिड़िया धुंध छंटने के   इंतज़ार में एक - एक पल ऐसे गुजारती है जैसे बीत रही हों कई सदियाँ। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!