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इश्क़ की खुशबू

उस रात जब चाँद   भटक रहा था बादलों में कहीं - अल्हड हवा रूमानियत के गीत गुनगुना रही थी - फ़िज़ा में घुल रही थी इश्क़ की भीनी खुशबू - उस रात   चांदनी पहनकर सितारों को दामन में भरकर सारे रस्मोरिवाज को छोड़कर स्याह रातों को रोशन करती अपने दायरे को तोड़ती चली तो आयी थी - तुम्हारी वीरान सुबह में रंग भरने ना सिर्फ एक पल के लिए वरन् उम्र भर के लिए तुम्ही बता दो मेरे हमराज अपने तसव्वुर के आशियाँ में अब तन्हा लौटूं कैसे ?? © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

अनाम रिश्ता

ख़ि ज़ाँ का मौसम था पर खुशनुमा सा था -  सर्द दिन थे और बंद लिफ़ाफ़े से तुम। गुज़रते वक्त में खुली किताब हो गए जिसके हर पन्ने से वाकिफ थी मैं।    जाने -अनजाने एक रिश्ते का आशियाँ सजा लिया था हमने।   साझा किया था शामो - सुबह गोया एक रूह के दो जिस्म हो। मेरे रहबर समय कब एक सा होता है - बेरंग हुए गुलाबी लम्हे बाँझ हुआ मोहब्बत का दरख़्त दफना दिया हर ख्वाब को। अरमानों के थपेड़ों में बमुश्किल सम्हाले रखा खुद को। सोचती हूँ - साल  की आखिरी रात अनाम-अबूझ-अव्यक्त रिश्ते के आशियाँ को छोड़ जाऊं ।    © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

आँखें (चंद हाइकु )

बेरंग जहां रोशन कर गया आँखों का दान ----------- जागती आँखें चाँद पाने की ज़िद उंघते ख्वाब ------------ छलके शब्द नैन करे संवाद एक लौ दिखी ------------ चार थे नैना चश्मा घर में छूटा सब धुंधला ----------- राज़ खोल दी दिल में दफ़न था आँखें बोल दी ----------- सीमा से परे उड़ने को तत्पर नैन परिंदे ------------ जूझते रहे आँखों ने सिखाया था शूल हैं फूल © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

इश्क़ की फुहारें (हाइकु )

इश्क़ बरसा भीग रहे हैं सब बदली फ़िज़ां --------- अमृत रस शबनमी सुकून इश्क़ का नूर --------- इश्क़ तिलस्म सूझे ना कोई तोड़ सब उलझे --------- चाँद - चकोर इश्क़ की हसरत वस्ल की प्यास ---------- इश्क़ मुअम्मा सुलझ नहीं पाए दिल समझे ---------- सुधा - सलिल इश्क़ में भीगी मही वसंत आया ---------- इश्क़ की सजा पाँव लहुलूहान मौत की ख़ुशी ----------- नन्हा दीपक इश्क़ में जला करे खुशियाँ भरे   ------------ © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

साझा रिश्ता

हर रिश्ते से परे एक रिश्ता हमारे दरम्यां- जिसे समझने की ज़रूरत ना तुम्हे पड़ी ना मुझे - साझे हर्फ़ साझा लफ्ज़ साझे ख्वाब साझे जज़्बात साझी हसरतें तेरी हर चीज़ साझी प्रेम भी साझा- बस, मंज़ूर नहीं तेरी बाहों के सरमाया का साझा होना, जिस पर सिर रख कर अनगिनत शामें गुज़ारी मैंने। जानें कितनी दफा आँसुओं से भी धुली थी वो, लेकिन ये भी तो सच है साझे रिश्ते में हक़ कहाँ! मेरे रहबर  कुछ रिश्ते को नाम देना बहुत मुश्किल, लेकिन कितना जरुरी होता है कभी कभी ! © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

‘उदास शाम’ (गीतिका )

उदास शामें और ये तन्हाई , प्यार किया तो ये सज़ा पाई। खोखली रवायतों से लड़ना , बदले में मिली सिर्फ रुसवाई। उनका आना फिर चले जाना , इश्क में दिल ने फिर चोट खाई। इक आशियाँ सजा लिया मिलकर , तोड़ गया वो सनम हरजाई। झरते रहे आँखों से आंसू , बिन मौसम ये बरसात आयी। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

ये हौसला…

उ स दिन गार्गी उदास सी घर के कामों में उलझी थी।  उसकी उदासी को समझ पाना बहुत ही आसान था, क्योंकि जब वो खुश - प्रफुल्लित रहती है, या तो कोई प्यारा सा बांग्ला गीत गुनगुनाती रहेगी या फिर यहां की बातें - वहाँ की बातें बांग्ला मिक्स टूटी फूटी हिन्दी में बताती रहेगी, जिसमें अक्सर लिंग भेद की त्रुटियाँ भी होती थीं, हालांकि करीब  चार - पांच  सालों के हमारे साथ ने उसकी हिंदी में काफी सुधार ला दिया था। अपने नाम के बिलकुल उलट - निरक्षर, अव्वल दर्जे की नासमझ, जिसे कोई भी चकमा दे जाता, रोज़ बेवक़ूफ़ बनती। मज़ाक  करते हुए मै अक्सर उससे पूछा करती कि आखिर तुम्हारा नाम गार्गी किसने रख दिया, पता है गार्गी कितनी पढ़ी लिखी विदुषी महिला का नाम था, वो मेरी बातें सुनती और हंसती…हाँ लेकिन वो बंगाली खूबसूरती से भरी पूरी थी, दुबली पतली सी…बड़ी बड़ी आँखों वाली । अक्सर अपनी बातें मुझसे साझा करती थी -  चाहे तकलीफ - परेशानियां हो या फिर कोई खुशी की बात, यहां तक कि अगर किसी ने उसके मेहनताने की रकम भी बढ़ाई तो भी बेहद खुश होकर बताएगी। कभी किसी की बुराई करते करते नाराज़ हो जाएगी तो ...