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अंतर्मन

ज़िन्दगी चलती जा रही ... या यूँ कहें भागती जा रही है। खानाबदोश सी हालत हो गयी है। ऐसा लगता है जैसे सबकुछ छुटता जा रहा है ... सबकुछ । कभी कभी लगता है मैं क्या कर रही हूँ , क्यों कर रही हूँ ? शायद मैं ऐसी ही ज़िन्दगी चाही थी .... पर अब पता नहीं क्यों मुझे वापस वही पुरानी ज़िन्दगी में जाने की चाहत हो रही है। इस बार घर गयी ...लम्बे समय तक रही, शायद उसी का असर हो । धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा । मैं फिर से इस दुनिया में रम जाउंगी...शायद। बहुत दिनों बाद मैंने ब्लॉग पर कुछ डाला है ...वास्तव में इन दिनों मैं काफी उथल पुथल से गुज़र रही हूँ। छोटे शहर की ज़िन्दगी और महानगर की ज़िन्दगी के बीच बिलकुल फंसी हुई सी। दोनों जगहों में कुछ अंतर है तो कुछ समानता है। अंतर मिटा नहीं सकते पर समानता से थोडा कष्ट होता है। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

हमारे घर भी गिल्लू...

दिल्ली का घर... बिल्कुल छोटा सा... तीन कमरे का फ्लैट । कहते हैं की दिल्ली के फ्लेट्स में अगर सूरज की रोशनी पहुँच जाए तो ये बड़े सौभाग्य की बात है। कुछ ऐसा ही सौभाग्य हमें प्राप्त है। जी हाँ वैसे तो हम तीन कमरे और एक बड़े से हॉल वाले फ्लैट में रहते हैं ...लेकिन वास्तव में छोटे से क्षेत्र में ही ये चारो कमरे, रसोईघर सिमटा पड़ा है। बेडरूम से सटे एक छोटी सी बालकनी भी है जहाँ जाकर ये अहसास होता है की फ्लैट बनाने वाले ने कितना दिमाग लगाया होगा हर छोटे बड़े कोने का इस्तेमाल करने में। कहाँ हमारे आरा का घर जहाँ बालकनी में हमलोगों ने कितनी बार छुआ छुई खेली, यही नही मैंने तो वहां ढेर सारे गमले लगा रखे थे। गर्मी के दिनों में हम सब भाई बहन बालकनी में आराम से सकते थे इतनी जगह वहां थी। यहाँ... दिल्ली के घर में अगर तीन लोग खड़े हो जाएँ तो ऐसा लगता है की कितनी भीड़ हो गई ... अब चौथे के लिए जगह ही नही है। खैर... इन सब के बावजूद हम ख़ुद को बेहद सौभाग्यशाली मानते है क्योंकि ये घर काफ़ी खुला हुआ सा है। दिन चढ़ते ही सूरज की रोशनी से हमारी नींद खुलती है। दूसरा कमरा, वो भी बालकनी से ही सटा है, बहुत से जीवों की ...

शिक्षक दिवस पर मिली अच्छी सीख

सुबह १० बजे ऑफिस के लिए निकली... देर हो चुकी थी....सामने भीड़ से भरी हुई लो फ्लोर बस दिखी । दिल्ली में तीन साल बिताने के बाद अब मुझे आदत हो चुकी है भीड़ वाली बसों में चढ़ने की .... आगे खड़े होने के बाद भी किसी भी अजनबी या यूँ कहें सहयात्रियों से कह कर पैसे पास करने की और फ़िर कही भी खड़े या बैठ कर भी टीकट लेने की ... जी हाँ हर परिस्थितियों में सफर करने की आदत हो चुकी है। आसानी से... बगैर किसी जान पहचान के अपना बोझा दूसरे के गोद में डाल देना यहाँ के लोगों की खासियत है। लेकिन आज जो कुछ भी हुआ उसने हर अजनबियों पर विश्वास ना करने की सीख ज़रूर दे दी। बस में काफ़ी भीड़ थी... मैं आगे महिलाओं वाली सीट के पास जाकर खड़ी हो गई। पर्स से पैसे निकाल कर टिकट के लिए आगे एक सज्जन को पास कर दी ... उन्होंने भीड़ में ही आगे एक दूसरे बन्दे को, जो कंडक्टर के करीब खड़ा था, पैसे पास कर दिया । पाँच मिनट गुज़र गए ... दस मिनट ...दो स्टाप भी आया और चला गया । मैंने उन सज्जन से पूछा- क्या हुआ? उन्हें ख़ुद नही पता था ... फ़िर उन्होंने इधर - उधर देखा और पता चला की जिसे उन्होंने पैसे दिए थे वो बन्दा ही गायब है यानी कि...

ये क्या जगह है दोस्तों.....?

दिनांक : १६.०७.०९ स्थान : जी बी रोड समय : शाम के तीन बजे मैं अपनी टीम के साथ पहुँची । पहले से एक स्वयंसेवी संस्था से बातें हो चुकी थी जिसने उन्हें शूट के लिए तैयार कर लिया था, हालाँकि उन्होने हमसे कैमरा छिपा लेने के लिए कहा था और हमने उनकी बात मान ली थी। गाड़ी हमने वहीं पुलिस चौकी के पास पार्क कर दी और फिर हम चल पड़े कोठा नम्बर पचास में। सीढियों पर एकदम अँधेरा और हम चले जा रहे थे। हर मंज़िल पर महिलाएं भरी पड़ी थी वो भी अजीब से मेकअप और कपडों में सजी - धजी, अब तक जैसा फिल्मों में जैसा देखती आई थी उससे एकदम इतर…बिना किसी चकाचौंध के.… हर तरफ अन्धेरा और बेहद संकरी सी सीढ़ियां। हर मंज़िल से अजीब सी बदबू आ रही थी।  मन में थोडी घबराहट थी ... थोड़ा डर ... पर एक आत्मविश्वास।  जाने कितने मंजिल पार कर हमलोग सबसे ऊपर वाले मंजिल पर पहुचे। वहां भी कमोबेश वही स्थिति थी। कमरे में सीलन ...बदबू... अँधेरा और ढेर सारी महिलाएं । लेकिन उनसब में एक सामंजस्य था,  उनमें इतनी एकता थी कि  अगर उनसे बातें नही होतीं तो मुझे वे सभी एक ही प...

यादें भूल जाती हैं, बातें याद आती हैं...

बहुत दिनों से कुछ लिख नही पाई । कारण बहुत से है ... पर सबसे आसान जवाब है समय की कमी। व्यस्तता थोडी बढ़ गई थी । ऑफिस में काम से फुर्सत नही मिलता था ... घर पर थकावट कुछ लिखने नही देती थी। आज सारे काम निपट चुके हैं , कार्यक्रम का आउट चल रहा है। सोचा लगे हाथ क्यों ना कुछ लिख डालु। शनिवार की शाम यानी अभी ऑफिस के ज्यादातर लोग जा चुके है सिर्फ़ जिनका काम है या फ़िर लाइव वाले लोग रुके हुए हैं । मैं अपने काम से परेशान हूँ एपिसोड अभी तक आउट नही हो सका है । दो बार आउट लगा चुकी , कुछ ना कुछ प्रॉब्लम हो रहा है। इन्ही सब उलझनों में फंसी मैं... जाने कब अपनी सोच में उलझ गई पता ही नही चला। छोटी ... मेरी सबसे अच्छी दोस्त ... जो कभी मेरे सबसे करीब थी । मेरी बहुत सी बातें जो सिर्फ़ वो जानती थी और उसकी बहुत सी बातें शायद सिर्फ़ मैं जानती थी। आज मुझसे कितनी दूर ... या शायद आज हमदोनो अजनबी बन चुके हैं। उसने ग्रीटिंग्स में लिखा था की जब मैं समय को पकड़ लूंगी तब हमदोनो साथ होंगे। आज न जाने कितने साल गुज़र चुके हैं ... हमदोनों की मुलाक़ात नहीं हुई। घर पर रहने के बावजूद ना वो मुझसे मिलने आई ना मुझे कुछ ख़ास इक्...

ग़रीबी का मज़ाक

'स्लम डॉग मिलिनेअर' फ़िल्म में काम कर के प्रसिद्धि पा चुकी रुबीना अचानक से कल फ़िर टीवी चैनेल्स पर छाई हुई थी ... कारण बताने की ज़रूरत नही... जिसने भी चैनेल्स को देखा होगा या आज सुबह का अखबार पढ़ा होगा उसे पता होगा। उस नन्ही सी कलाकार के माता पिता पर अपनी बेटी को बेचने का आरोप लगा है। किसी ने भी ख़बर के तह में जाने की कोशिश नही की। रुबीना के फोटो को भी खुलेआम दिखाया गया कुछ चैनेल के पास तो उसके शॉट्स भी आ गए थे... और ज़्यादा स्तरीय बनाने के लिए उसके पिता को लाइन अप कर के उनसे सवाल जवाब शुरू कर दिया ...किसी ने ये सोचने की ज़हमत नही उठाई की ऐसा करने से उस लड़की और उसके पिता की क्या हालत होगी । एक बात मेरी समझ में नही आई की जब अनजानी लड़कियों के खरीद फरोख्त की खबरें अगर हम दिखातें है या उनके बारे में लिखते हैं तो उसके नाम की जगह काल्पनिक नाम लिखते है चेहरा मोजेक कर के दिखातें है फ़िर रुबीना के साथ ऐसा क्यों नही हुआ। जो पत्रकार वहां स्टिंग करने पहुचे थे उनका चेहरा तो ढका हुआ था और वही इस लड़की का और इसके पिता का चेहरा खुला हुआ था। इससे तो ये ही लग रहा था की ये सब कुछ इन्टेंशनाली किया ...

... एक युग का अंत

प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी अब हमारे बीच नहीं रहे... दुखद समाचार । 12 दिसम्बर 2008 को मैं अपनी टीम के साथ उनके घर पर थी ... एक नए कार्यक्रम की शुरुआत के लिए उनका प्रोफाइल शूट करना था। प्रभाकर जी बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनसे जब बातें शुरू हुई तो एहसास हुआ कि उन्हें चल फ़िर नही पाने का कितना दुःख है। उन्होंने लेटे हुए ही हमसे बातें की।  उन्होंने कहा - "अब मैं ज़्यादा बोलने की स्थिति में तो हूँ नही, लेकिन आप लोग जो पूछेंगे मैं बताऊंगा ..... ।" जब उनसे उनकी श्रेष्ठ कृतियों में से एक 'आवारा मसीहा' के बारे में पूछा गया तो पहले तो वह उसे याद नहीं कर पाये, फ़िर जब उन्हें याद दिलाया गया तो वे बोल पड़े -  '"शरत चंद्र को मैंने बहुत करीब से जानने की कोशिश की तो पाया कि उन्हें हमेशा ग़लत समझा गया था।" मै कभी नही सोची थी कि कभी मैं उनसे मिल सकूंगी, बातें कर सकूंगी। वह दिन मेरी जिंदगी के कुछ अविस्मरणीय पलों में से एक था। प्रभाकर जी इससे भी दुखी थे कि जब से वे बिस्तर पर पड़े हैं उनसे मुलाक़ात करने वालों की संख्या कम हो गई है। हमेशा ...