Tuesday, June 13, 2017

वक़्त की क़ैद में ज़िन्दगी है मगर...





















राह कंटीली और पथरीली, हौस’ला टूट रहा है,
जिस्म-रूह-अहसास-बंधन,सबकुछ छूट रहा है।
सुर्ख सपने और फूल सुनहरे, ये तो बीती बातें हैं,
कथा-कहानी, खेल पुराने, खो गई ये सौगातें हैं।
मौत लगे है अब रूमानी,
आँखों से न गिरता पानी।
दुःख-चिंता से टूटा नाता,
राग-रंग अब कुछ न भाता ।
यादों का प्यारा आँगन अब पीछे छूट रहा है,
राह कंटीली और पथरीली, हौस’ला टूट रहा है।



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