स्त्री


बदलते घर के साथ अक्सर
छूट जाती है थोड़ी सी वो भी
हर बार समा जाती है एक नए खोल में
पहन लेती है एक अलग चेहरा
समय की मांग के अनुसार भरती है स्वांग
फिर किसी रोज़-
असहनीय पीड़ा और बेचैनी से गुज़रते हुए
स्त्री उतारती है अपनी केंचुली
निकलती है बिलकुल नई होकर
विरोध, मायूसी और शिथिलता उसके कदम रोकते हैं
लेकिन वो रूकती नहीं
अदम्य जिजीविषा के साथ निकल पड़ती है स्व की तलाश में
वो समझ जाती है ओढ़े गये जीवन से कहीं बेहतर होता है

जीना, उन्मुक्तता के साथ, एक पूर्णता के साथ



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

Popular posts from this blog

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

‘आई ऍम फैन युसु’