Thursday, December 22, 2016

स्त्री


बदलते घर के साथ अक्सर
छूट जाती है थोड़ी सी वो भी
हर बार समा जाती है एक नए खोल में
पहन लेती है एक अलग चेहरा
समय की मांग के अनुसार भरती है स्वांग
फिर किसी रोज़-
असहनीय पीड़ा और बेचैनी से गुज़रते हुए
स्त्री उतारती है अपनी केंचुली
निकलती है बिलकुल नई होकर
विरोध, मायूसी और शिथिलता उसके कदम रोकते हैं
लेकिन वो रूकती नहीं
अदम्य जिजीविषा के साथ निकल पड़ती है स्व की तलाश में
वो समझ जाती है ओढ़े गये जीवन से कहीं बेहतर होता है

जीना, उन्मुक्तता के साथ, एक पूर्णता के साथ



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