Skip to main content

वेल बिहाव्ड वूमेन ररली मेक हिस्ट्री





लक्ष्मीनगर से पार्लियामेन्ट तक आना और वो भी ऑफिस टाइम यानी सुबह ९ बजे से एग्यारह बजे के बिच, कोई आसान काम नही है । ट्रैफिक की बाढ़ होती है... ऐसा लगता है की जाने कहाँ बहा ले जायेगी। उस समय कोई भी निकलना नही चाहता, यहाँ तक की ऑटो वाले भी ऑफिस का नाम लेने पर कन्नी कटाने लगते हैं। शुक्रवार को मै ऑफिस जा रहीथी।आई टी ओ पर ट्रैफिक करीब पन्द्रह मीनट से रुकी हुई थी । ऐसे बोरियत भरे समय में ध्यान इधर उधर भटकता रहता है। मैं भी सामने खड़ी हर गाड़ी को देख रही थी उसपर लिखे कैप्शंस को पढ़ रही थी। एक पञ्च लाइन ने मेरा ध्यान अपनी और खिंचा और मेरे अन्दर उस गाड़ी के मालिक को देखने की इच्छा हुई। लाइन इंग्लिश में था "वेल बिहाव्ड वूमेन ररली मेक हिस्ट्री". पता नहीं क्यों मैं उस पंक्ति को पढने के बाद पुरे रास्ते उसपर सोंचती रही की क्या जो लिखा है वो सच है... सही है। मुझे लगा की शायद बिल्कुल सही है। घर से बाहर निकलने के बाद एक लड़की हर काम के लिए संघर्ष करना पड़ता है... लड़ना पड़ता है। अगर वो किसी से भी अच्छे से बात करे तो सामने वाला उसे कमज़ोर समझ या तो उसका फायदा उठाने की कोशिश करता है या फ़िर उसे दबाया जाता है। ऐसे मैं परिस्थिति ही ऐसी हो जाती है जो लड़कियों को लड़ने पर मजबूर कर देती है। हर बार आत्मरक्षा के लिए तैयार महिलाऐं कब वेल बिहाव्ड से ईल बिहाव्ड हो जाती हैं पता ही नहीं चलता।

Comments

मीत said…
absolutaly truth....
seema gupta said…
दीप मल्लिका दीपावली - आपके परिवारजनों, मित्रों, स्नेहीजनों व शुभ चिंतकों के लिये सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी कामना के साथ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ दीपावली एवं नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
seema gupta said…
दीप मल्लिका दीपावली - आपके परिवारजनों, मित्रों, स्नेहीजनों व शुभ चिंतकों के लिये सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी कामना के साथ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ दीपावली एवं नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
लड़कियों ने अपनी लड़ाई लड़ना शुरु कर दिया तो दुनिया सुधर जाएगी।

दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
प्रकाशपर्व आप के और आप के परिवार के लिए सर्वांग समृद्धि लाए।
रचना said…
हर बार आत्मरक्षा के लिए तैयार महिलाऐं कब वेल बिहाव्ड से ईल बिहाव्ड हो जाती हैं पता ही नहीं चलता।
illbehaved no one wants to but sometimes its neccessary to give back in the same coin to make people understand that woman can also hit back
. even in this virtual world of blogging we had to fight a battle to make others understand and few of us were call

ashaaleen but who cares at least i dont
दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
Even well behaved guys rarely make impression.

Nice guys finish last.

Applies universally, regardless of men or women.
Bandmru said…
kya baat hai mam kya khub likha hai aapne. pasand aaya....
bahut khub .....
lambe aarse baad aai hain blog pr.

bahut khub......

Popular posts from this blog

बुरा स्वप्न

आँखों की पुतली में हरकत 
एक आस  शायद अभी खुलेंगी आँखें  और हम पुनः जुट जाएंगे इशारों को  समझने में  लेकिन  पलकें मूँद गयी  स्थिर हो गयी पुतलियाँ  धडकनें थम गयी  चेहरे पर असीम शान्ति  हथेलियों की गर्माहट घटने लगी  क्षण भर में  बर्फ हो गयी हथेलियाँ  हर तरफ सिसकियाँ  लेकिन मैं गुम थी  विचारों के  उथल पुथल में - मृत्यु इतनी शीतल है  फिर  गर्म - खारे पानी का ये सैलाब क्यों  जब मृत्यु इतनी शांत है  फिर क्यों जूझना  भावनाओं के तूफ़ान से  मृत्यु तो सबसे बड़ा सच है  फिर झूठी ज़िन्दगी से मोह क्यों ??    



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

महिला दिवस पर कार्यक्रमों, संदेशों, कविताओं की झड़ी लग गई है। सारे लोग अपने अपने तरीकों से महिलाओं को सशक्त करने/होने की बात कर रहे। महिला दिवस पर स्री सशक्तिकरण का जितना भी राग अलापें लेकिन ये सच है कि एक सशक्त महिला सबकी आँखों का काँटा होती है। जब वो अपने बलबूते आगे बढ़ती है, उसे कदम दर कदम अपने चरित्र को लेकर अग्नि परीक्षा देनी होती है। अगर वो सिंगल/अनब्याही है, तो हर रोज़ उसे लोगों की स्कैनर दृष्टि से गुज़रना पड़ता है। अक्सर पुरुषों की दृष्टि उसमें अपने ऑप्शन्स तलाशती रहती हैं। उम्र, जाति, खानदान यहां तक कि उनके सेक्सुअल अभिरुचि पर भी सवाल किये जाते हैं।  एकबार एक बहुत ही वरिष्ठ व्यक्ति, जो दिल्ली  में वरिष्ठ पत्रकार है, ने पूछा था, “तुमने शादी नहीं की? अकेली रहती हो या लिव इन में ? तुम्हारा पार्टनर कौन है? “ मतलब ये कि “एक महिला अकेले रहती है, कमाती है, खाती है “  ये बात किसी से हजम नहीं होती। तीस साल की होने के साथ ही शादी का ठप्पा लगना ज़रूरी हो जाता है, अगर शादी नहीं की और हँसते हुए पूरे उत्साह के साथ  जीवन गुज़ार रही तो लोगों को वैसी महिलाएं संदिग्ध नज़र आने लगती हैं। लोग अक्सर उनकी …

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी नहीं बल्कि मनुष्य एक सामूहिक प्राणी है। पहले जाति विशेष का समूह, फिर धर्म विशेष, फिर गाँव विशेष, शहर विशेष, क्षेत्र विशेष, राज्य विशेष, भाषा विशेष, देश विशेष, विचारधारा विशेष- सुविधानुसार हम सब अपने-अपने समूह में शामिल रहते हैं। इतना ही नहीं ये सामूहिक विभेद का काम विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर भी चलता रहता है। बंटवारे का बीज तो हम सब बचपन से ही अपने मन में बोये रहते हैं। समय-समय पर कोई महापुरुष या स्त्री इसमें खाद पानी दे जाते हैं, और ये फलने फूलने लगते हैं। फेसबुक और व्हाट्सएप्प जैसे सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म भी समूह बनाने की सहूलियतें दे रहा है। यहाँ भी लोग सामूहिक बँटवारे को बड़े प्यार से अपना रहे। अगर आपको सामूहिक बँटवारा पसंद नहीं तो भी लोग आपको बाँट कर ही रहेंगे। कोई आपको जातिगत समूह में शामिल करेगा तो कोई शहर, राज्य, पेशेगत समूह में शामिल करेगा, लेकिन बँटवारा ज़रूरी है।
बँटवारे के बाद शुरू होता है सामूहिक बड़ाई और बढ़ावा देने का सिलसिला। तू मेरी पीठ थपथपा मैं तेरी थपथपाऊँ, और अगर किसी और समूह वाले ने किसी दूसरे समूह के लोगों पर टिप्पणी कर दी तो 'च…