तुम कहो

वो शाम याद करो

जब मैं हार कर रो रही थी।

तुमने कहा था

उठो, लडो और आगे बढ़ो

मैं लड़ी और आगे बढ़ी

तुमने कहा और आगे बढ़ो

मैं और आगे बढ़ी

मैं आगे बढ़ती गई

और अब तुम कह रहो हो वापस आ जाओ

क्या सम्भव है वापस आ पाना।

Comments

mehek said…
bahut sundar bhav hai kavita ke,vapas anna bahut mushkil sahi,namumkin nahi,
संदीप said…
माफ कीजिए महक, लेकिन आपने कविता ठीक से नहीं पढ़ी शायद...

यहां मुमकिन या नामुमकिन की बात ही नहीं हो रही और जो बात और भावनाएं व्‍यक्‍त हुए हैं उन पर लिखना उसी तरह होगा, जैसे हम लोगों की शिक्षा पद्धति के चलते प्रसंग सहित व्‍याख्‍या लिखाई जाती है..

प्रियम्‍बरा...बस इतना ही कहूंगा कि कविता अच्‍छी है..आप अच्‍छे कवियों को पढ़ना अपनी आदत में शुमार कर लें...आप बेहतरीने तरीके से अपने विचार व्‍यक्‍त कर सकती हैं...लिखना जारी रखिए...
lumarshahabadi said…
suno g sab sahi ba baki niyat thik hokhe k chahi

Popular posts from this blog

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

‘आई ऍम फैन युसु’