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ये यादें ....

यादों के तंग गलियारों से गुज़रते हुए अक्सर रूह छिल जाती हैं।  लहूलुहान होने के बाद भी उन गलियारों से गुजरने के मोह से खुद को रोक नहीं पाती।  पुरानी डायरियों को पढ़ने का मोह छोड़ नहीं पाती। दिमाग चाहता है पढ़ना बंद करूँ , और मन उसे बार बार पढ़ना चाहता है।  दोस्त कहते हैं आत्ममुग्धा ना बनूँ, दूसरों की चीज़ें पढूं जो मेरी सोच को विस्तार दे सके।  क्या बताऊँ उन्हें कि ये, उपन्यासों से बेहतर लगती है, जिसकी मुख्य किरदार मैं ही तो हूँ। मेरे आस पास की घटनाएं जो कभी रुलाती है कभी गुदगुदाती हैं, पुरानी यादों को ताज़ा कर जाती हैं। © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

उदास चाँद

आज चाँद बहुत उदास था, हर ओर पसरी थी , गहरी-डरावनी  अंतहीन रात - सितारों की किरचें चुभती रहीं थीं, होश खोने तक- रूह के ज़ख्म,  कहाँ नज़र आते हैं, बस दे जाते हैं अंतहीन दर्द या, बन जाते हैं नासूर।  © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

यादें क्या हैं ?

या दें क्या हैं ? एक आदत जो प्राथमिकताओं के अनुसार सिमट जाती हैं किसी दिवार के कोने में दफ़्न हो जाती हैं डायरी के पन्नों में कहीं या फिर कैद हो जाती है किसी मेज की दराज में गुज़रते वक़्त के साथ ही चढ़ जाती हैं उस पर समय की परतें और जब ये परतें उतरती हैं तो यादें बन जाती है सैंकड़ों चीटियाँ जो रक्त के साथ धमनियों से होती हुई पहुँच जाती है मस्तिष्क में और उन्हें तब तक नोचती हैं जब तक असहनीय दर्द हर सोच को शिथिल ना कर दे यादें बन जाती हैं ह्रदय की सुषुप्त ज्वालामुखी जो सुलगता रहता है और एक दिन फूट पड़ता है लावा बन आँखों से यादें ही तो हैं! © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

आज़ादी

क फ़स में कैद कर दो सांस चाहे,  जुबां पर ताले जड़ दो सारे पंख नोच डालो, या पैरों में बेड़ियां मढ़ दो हीर सी मौत दे दो या ज़िंदा ही दफन कर दो रूह आज़ाद है मेरी जां इश्क़ के गीत गाएगी   इश्क़ की लय में थिरकेगी फूल सी खिलखिलाएगी । © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

कृष्ण

बचपन से ही कृष्ण का चरित्र मुझे आकर्षित करता रहा है। हो सकता है इसका कारण बचपन में कत्थक सीखना रहा हो...जिसमें अधिकतर टुकड़े-भाव नृत्य कृष्ण के चरित्र पर ही आधारित हुआ करते थे । एक वजह ये भी हो सकता है कि हमारे घर में जन्माष्टमी बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती थी। मैं कृष्ण के बारे में जितना सुनती , जितना पढ़ती....उनके प्रति प्रेम और भी बढ़ता जाता, उनका किरदार और भी दिलचस्प लगता। वहीं राम के बारे में ज़्यादा करीब से जानने की कभी इच्छा नहीं हुई, मुझे अक्सर ये लगता कि जो व्यक्ति  एक गर्भवती स्त्री को अपनी इज़्ज़त के लिए घर से निकाल सकता है वो पुरुषोत्तम कैसे हो सकता है? आज से करीब 15 साल पहले मर्यादा पुरुषोत्तम राम और कृष्ण पर मेरा किसी से विवाद हुआ तब मैं लिखी थी- तुम कहते हो  बदल दूं अपनी पसंद मिटा दूं ह्रदय से कृष्ण को और अंकित कर लूँ वहाँ राम का नाम तुम भूल जाते हो  पसंद बनाई नहीं जाती वह तो स्वतः उत्पन्न होती है यूँ तो अंतर है दोनों में एक युग का या यूँ कह लो कि एक छलिया है  तो दूजा पुरुषों में उत्तम राम पर क्या करूं  मुझे कान्हा सच्चा ल...

यूँ ही ....

हरचन्द ना तू हबीब है, ना है रकीब मेरा, तो भी अबस है ये जीस्त जिसमें तू नही। तेरी सोहबत हयातो-मौत- ही सही फिर भी, ज़िन्दगी अब तुझसे पहली-सी मोहब्बत ना रही । © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

चिड़ियाँ

शाम हो चली थी।  सारे बच्चे छत पर उधम मचा रहे थे।  उनकी धमा चौकड़ी की आवाज़ से बिट्टी का  पढ़ाई से ध्यान बार बार उचट रहा था, लेकिन फिर पापा की घूरती आँखें, उसके ध्यान को वापिस ७ के पहाड़ा पर टिका दे रही थी । अब वो ज़ोर ज़ोर से पहाड़ा याद कर रही थी "सात एकम सात, सात दूनी चाॉदह"  तभी आवाज़ आई "हमार चिरैयाँ बोलेला बउवा के मनवा डोलेला" बिट्टी अपने पिता की ओर देखी, उनका ध्यान कहीं और था।  वह तुरंत खिड़की पर पहुँच कर नीचे झाँकने लगी। मोम से बनी रंग बिरंगी छोटी छोटी चिड़ियाँ ।  उसकी इच्छा हुई की बस अभी सब में प्राण आ जाए और सब सचमुच की चिड़ियाँ बन जाए ।  वो मोम की चिड़ियों की सुंदरता में डूबी हुई थी ।  तभी नीचे से चिड़िया वाले ने पूछा - "का बबी चिरैयाँ चाहीं का, आठ आना में एगो। " बिट्टी ने ना में सर हिलाया ।  फेरी वाले ने पुचकारते हुए कहा " जाए द आठ आना में तू दुगो ले लिहा।" बिट्टी फिर ना में सर हिला कर वापिस पिता के पास ...