Thursday, November 20, 2008

खामोशी और अँधेरा, फ़िर भी एक नया सवेरा

ईश्वर ने हम सबको सामान्य बनाया तब भी हम हमेशा किसी न किसी परेशानी को लेकर दुखी रहते हैं। हमें ऐसा लगता है की हमारी परेशानी से बढ़कर कोई परेशानी नही है। ईश्वर ने सारे दुःख हमारी झोली में डाल दिए हैं।
पर उन लोगों का क्या जिसे प्रकृति ने असामान्यता दे दी। बीते दिनों कुछ ऐसे ही लोगों से मिलने का मौका मिला। कुछ तो दिखने में इतने समान्य और सुंदर थे की उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता की वो सुन और बोल नहीं सकते। मुझे आश्चर्य और खुशी ये देखकर हुई की कुछ कंपनियों ने ऐसे ख़ास लोगों को अपने यहाँ काम दिया है, और ये लोग समान्य से बेहतर पर्फोमांस दे रहे हैं। इनमे सिखने की ललक औरों से ज़्यादा है। इनमे कुछ कलाकार हैं तो कुछ खिलाड़ी लेकिन अपनी बातों को लोगों के सामने नही रख पाने के कारन ये गुमनामी के अंधेरे में खो गए। इन में से हर एक के परिवार की एक अलग ही कहानी है। एक लड़का, जिसकी माँ मानसिक रोगी, पिता मूक - बधिर, पत्नी भी मूक - बधिर..... अब वो पिता बनने वाला है । उसे डर है की कहीं उसका होने वाला बच्चा भी मूक - बधिर ना हो जाए। एक और परिवार जहाँ माता - पिता और बेटा मूक - बधिर हैं लेकिन बेटे की पत्नी समान्य है। बेटा भी पिता बनने वाला है लेकिन पत्नी को डर है की कहीं वो भी अपने पिता और दादा दादी की तरह ना हो जाए। ये सारे लड़के दिखने में बेहद खूबसूरत, कंप्युटर पर हांथों की गति इतनी तेज़ और सधी हुई की हम लाख कोशिशों के बाद भी वैसी गति अब तक नहीं बना सके हैं। विभिन्न खेलों में भी माहिर, लेकिन ना सुन सकते हैं और ना ही बोल सकते हैं। फ़िर भी उनके चेहरे पर सुकून और संतुष्टि है, और कभी ना ख़त्म होने वाली एक प्यारी सी मुस्कान है।
वहीँ दूसरी तरफ़ एक ऐसे स्कूल में भी जाने का मौका मिला जहाँ बचपन से ही ऐसे ख़ास बच्चों को सिखाने की सुविधा है। इन बच्चों के साथ वहाँ ऐसे बच्चे भी हैं जो बिल्कुल सामान्य हैं। दोनों की संख्या बराबर है। इससे ये होता है की असामान्य और सामान्य दोनों बच्चे साथ खेलते हैं साथ ही पढ़ते हैं । दोनों को एक दूसरे की आदत हो जाती है। अगर ख़ास बच्चों को कुछ परेशानी होती है तो सामान्य बच्चे उनकी सहायता करते हैं। इनके मन में किसी भी तरह की कोई हिचकिचाहट नहीं होती है और ये एक दूसरे का साथ एन्जॉय करते हैं। यही तो नई सुबह का आगाज़ है शायद...?

4 comments:

makrand said...

bahut accha lekh

परमजीत बाली said...

बढिया पोस्ट है।बधाई।

Bandmru said...

kya baat hai bahut khub likh rahi hai. is tarah ke bachchen kafi tej aur tej hote hain. kash aap bal mahotsav men is saal judne wale jitu yani jitendra ko dekhti kya thik aapke lekh ke bachchhon ki tarah hai. pr ek nazar me usko dekh kr koi use ye nahi kah sakta ki wo gunga aur bahra hai. shayad mauka mila to mai uske foto ke saath uske har ek activity ko apne blog ke madhyam se launga. aachchha lika hai aapne mujhe bhi prerna mili ara ke us jitu ke bare men batane ke liye.

मीत said...

aise logo ke bare main padhkar bahut acha lagta hai, jo itne bebas hote hue bhi khush hain

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

का मथS तार... क्षीर समुद्र...का खोजS तार...अनंत भगवान... मिललें... ना। यूँ तो हमारे घर में पूजा पाठ ज़्यादा नहीं हुआ करता था। 'बाबा-अ...