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Showing posts from January 20, 2013

गोरा

न दिनों दूरदर्शन पर धारावाहिक  "गोरा"  देख रही हूँ।  सप्ताह में दो दिन आता है और तीन हफ्ते से मैं इसे देख रही हूँ .... ना कोई हल्ला - गुल्ला, ना ही तेज़ संगीत और ना ही एक ही दृश्य का बार - बार  दोहराव।  पार्श्व संगीत में बाउली गायकों की सुमधुर  आवाज़ और बांगला संगीत बहुत ही कर्णप्रिय लगते है। हालांकि तकनिकी खामियां इस धारावाहिक में नज़र आती है लेकिन ये उपन्यास मुझे इतना प्रिय है की उन खामियों के बावजूद मैं खुद को उन्हें देखने से नहीं रोक पाती।  
रविन्द्र नाथ टैगोर की लिखी हुई इस किताब का हिंदी अनुवाद पढने का मौका मिला जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी ... और तब से आज तक मैं ना ही उस उपन्यास को और ना ही उसके मुख्य चरित्र को भूल पायी हूँ।   "गोरा" को पढ़ते हुए उस चरित्र की कल्पना अनायास ही हो जाया करती थी हालांकि धारावाहिक के चरित्र और उसमे कोई समानता नहीं है।  इस धारावाहिक की एक और खासियत है की इसके एक - एक डायलोग को आप सुन सकते हैं .... बस यहाँ भी ब्रेक का झमेला है जो बीच बीच में धारावाहिक की एकाग्रता तोड़ देता है।   

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यादें .... ये यादें

काश की यादों को मिटाया जा सकता .... काश की हम बीते दिनों को वापिस ला पाते, पर सच है की ये संभव नहीं है। पिछले दिनों घर की सफाई करते हुए ऐसी ही यादों के ज्वार भाटे को मैंने महसूस किया।  घर शिफ्ट करने के बाद ये पहला मौका था जब मैं झाड पोंछ करने के साथ ही एक - एक सामान खोल - खोल कर देख रही थी और ज़रूरी चीज़ों को संभाल रही थी, गैर ज़रूरी चीज़ों को फ़ेंक रही थी। 
पिछले साल 1 मार्च को  हम इस नए फ्लैट में शिफ्ट किये तब पापा भी हमारे साथ थे।  इससे पहले वाले फ्लैट में करीब 5 साल हमने गुज़ारा .... वे पांच साल एक एक कर आँखों के सामने से गुजरने लगे .... क़ानून से लेकर इंश्युरेंस तक की किताबें, कोट, पेंसिल, इरेज़र, डायरी ....  पापा की दवाइयां, प्रिस्क्रिप्शन, टोर्च  और साथ ही आइसक्रीम स्टिक का वो बण्डल जिससे रेडिएशन के साथ साथ पापा को माउथ एक्सर्साइस करना था ।  एक एक चीज़ें याद आने लगी .... हालाँकि उन यादों से मै  अपना पीछा छुडाना चाहती थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका । समय चाहे कितनी भी धुल की परतें चढ़ा दे लेकिन यादें कभी मिटती नहीं .....       
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