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Showing posts from March 12, 2017

कहानी 'समानांतर' का प्रकाशन

http://www.grihshobha.in/parallel-1998

आज ये कहानी भी मिल गई, जिसने मेरे अंदर ये आत्मविश्वास जगाया कि मेरा लिखा प्रकाशन योग्य है...प्रथम कहानी जिसके प्रकाशन पर मेहनताना भी मिला था....संपादक को धन्यवाद....😊😊


http://www.grihshobha.in/parallel-1998

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

प्रकाशित कहानी 'सीलन'

संपादक का धन्यवाद...
http://www.sarita.in/story/seelan

कोई भीड़ नहीं, ना हीं कोई कारवाँ, धीमी गति से अग्रसर हूँ...कदम दर कदम😊😊...कहानी लेखन के लिए जिसने ज़ोर दिया था, प्रेरित किया था, अचानक गायब... सोची थी अब लिख नहीं पाऊँगी कभी, लेकिन लेखन अब भी जारी है.. ये कहानी प्रकाशन में भेजने के बाद भूल ही गई थी... अचानक एक दिन पता चला कि सरिता में ये कहानी प्रकाशित हो चुकी है...

http://www.sarita.in/story/seelan



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

यादें...

उन दिनों भी सकरात के बाद ऐसी ही धूप हुआ करती। हम बच्चे छत पर धमा चौकड़ी करते। मम्मी और पड़ोस की चाचियाँ छत पर बैठ कर या तो आचार के लिए निम्बू घिसती या फिर साग तोड़ती। निम्बू घिसने के चलते आस पास का हिस्सा पीला पड़ जाता था।हमें भी कहा जाता पर हम बचपन से ही कामचोर ठहरे, जान बचाकर भाग लेते थे।
पापा को चने का साग बहुत पसंद था और पालक बिलकुल भी नहीं खाते थे, मम्मी की पसंद पापा की पसंद के बिलकुल उलट थी...सच कहूँ तो सिर्फ खाने के मामले में ही नहीं बल्कि हर मामले में दोनों की पसंद अलग थी। लेकिन मम्मी पापा की पसंद का ख्याल रखती और पापा मम्मी की पसंद का।
चने के साग की सफाई और बनाना बहुत समय लगाने वाला काम था। मीठी धूप में मम्मी और चाचियों की बातें चलती रहती, हम सब ऊधम मचाते रहते। अचानक किसी की इच्छा हो जाती कच्चा ही चने के साग को खाने की। भरवां मिर्च का आचार ,आम का आचार, नमक और निम्बू के साथ चने के साग की सफाई और खवाई शुरू हो जाती। उसमें हमारा भी योगदान होता। वो दौर था डेक और लाउड स्पीकर वाला। दिनभर क़यामत से क़यामत तक, आशिकी और मैंने प्यार किया, फूल और काँटे के गाने बजते रहते।सिंघाड़ा का आचार और आलू…