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Showing posts from December 18, 2016

मौत का चक्रव्यूह

अब तक गूँज रही है कानों में वो अधफँसी आवाज़ जो मनाया करती थी उत्सव अपने वजूद का । अधफँसी आवाज़ गुनगुनाती थी ज़िन्दगी के गीत, वो जीना चाहती थी, हाँ, वो जीना चाहती थी, तोड़कर, मौत के सारे चक्रव्यूह। लड़ती रही थी ताजिंदगी ज़िन्दगी की व्यूह रचनाओं से जानती थी जुगत उनसे निकल पाने की ।
उस रात अँधेरा घना था औघड़ ने ऐसा व्यूह रचा अंतिम चक्र में फँस कर रह गई अभिमन्यु की तरह वो आवाज़ खामोश हो गई सदा के लिए !!


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स्त्री

बदलते घर के साथ अक्सर छूट जाती है थोड़ी सी वो भी हर बार समा जाती है एक नए खोल में पहन लेती है एक अलग चेहरा समय की मांग के अनुसार भरती है स्वांग फिर किसी रोज़- असहनीय पीड़ा और बेचैनी से गुज़रते हुए स्त्री उतारती है अपनी केंचुली निकलती है बिलकुल नई होकर विरोध, मायूसी और शिथिलता उसके कदम रोकते हैं लेकिन वो रूकती नहीं अदम्य जिजीविषा के साथ निकल पड़ती है स्व की तलाश में वो समझ जाती है ओढ़े गये जीवन से कहीं बेहतर होता है
जीना, उन्मुक्तता के साथ, एक पूर्णता के साथ


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