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Showing posts from April 24, 2016

ओस की बूँद

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फलक पर चाँद -चांदनी गुनगुना रहे थे   सितारे कहकहे लगा रहे थे और, रात सिंड्रेला की तरह अपनी बेबसी पर रो रही थी।   उस रोज़, रात के अश्कों को समेट लिया   लॉन में उग आई नन्ही सी दूब ने भोर की पहली किरण के साथ ही आँखों में उतर आया इंद्रधनुष और खिलखिलाती हुई  अलमस्त सुबह ने अंगड़ाई ली।   


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इंतज़ार

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इससे पहले कि-
सभी यादें धुंधली पड़ने लगे
इंतज़ार की रातें नियति बन जाए
ज़िन्दगी की राहें ख़त्म होने को आए-
सिर्फ एक बार
चले आना
उस घरौंदे में,
जहां जी थी हमने 
थोड़ी सी ज़िन्दगी
देखे थे गुलाबी ख्वाब
सेंकी थी अपने हिस्से की धूप
चंद पल के लिए ही सही -

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