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Showing posts from July 12, 2015

आत्मसात

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रकसां में डूबी, बादलों से उतरी थी,
नन्ही सतरंगी परियां -
मेरे घर की दहलीज़ पे
नाचती रही थी देर तक
फिर एक - एक कर समा गई
मेरी रूह में -
बारिश की बूंदों को, नाचते हुए, देखा है कभी ?
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एक ख्याल .... बस यूँ हीं

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ये रात अक्सर मुझ-सी लगती है, और बादल कुछ- कुछ, तुम-सा ! हँसता बादल, उदास रात,
आज मिले हैं, बरसों बाद।
(एक रात बादलों को भटकता देख उपजा एक ख्याल )

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