Wednesday, January 28, 2015

शक (कहानी "समानांतर" का एक अंश)








सूरज की पहली किरण के साथ मीता नींद से जागी। ऐसा लग रहा था जैसे अपनी ज़िंदगी के कितने खुशनुमा पल उसने सोते हुए गुज़ार दिए थे। एक लम्बी और गहरी नींद के बाद आज वो जागी थी, बेहद ताज़गी महसूस कर रही थी वो। मीता पुरानी सभी यादों को अपनी ज़िंदगी से मिटा देना चाहती थी। राजन की दी हुई जिस पायल की रुनझुन से उसका मन नाच उठता था आज वही उसे बेड़ियां लगने लगी थीं, कुमकुम की बिंदी लगाकर वो अपना चेहरा घंटो आईना में निहारा करती थी आज वही उसे दाग से लगने लगे थे। 

मीता ने अपना लैपटॉप ओन किया और राजन को सारी बातें लिख डाली।  ये भी लिखा कि जिस दिन तुमने पहली बार मुझे शक की नज़र से देखा था सच कहूँ राजन तब ज़िंदगी में सिर्फ तुम थे, लेकिन मेरे प्रति तुम्हारा अविश्वास और मेरे लिए वक़्त नहीं होना, मुझे मोहन के करीब - और करीब लाता गया।  जब भी मुझे तुम्हारी ज़रूरत थी राजन, तुम मेरे पास नहीं थे लेकिन मोहन हमेशा साथ रहा और इसके लिए मै तुम्हारी हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगी, क्योंकि अगर तुम ऐसा नहीं करते तो मैं मोहन की अहमियत को कभी समझ नहीं पाती। मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना, मैं तुम्हारी दुनिया से बहुत दूर जा रही हूँ। इतना लिखने के बाद मीता ने गहरी सांस ली, सालों बाद वो इतनी तनावमुक्त और आज़ाद महसूस कर रही थी। उसने पायल उतार फेंके और कुमकुम की बिंदी मिटा कर उसकी जगह काली छोटी सी बिंदी, जो कॉलेज के दिनों में लगाया करती थी, एक बार फिर से सजा ली।  


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