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मृगमरीचिका



कोमल नाम था उसका...दिखने में भी बेहद कोमल थी, हालांकि नैन नक्श साधारण थे लेकिन चेहरे पर पानी थाएक अलग सा आकर्षण। बेहद संवेदनशील और कोमल मन था - कोमल का घर की सबसे बड़ी और दुलारी बेटी। उम्र करीब सोलह साल, लेकिन जिम्मेदारियाँ घर की बड़ी बेटी होने के नाते औरों से थोड़ी ज़्यादा। घर की छोटी बड़ी ज़िम्मेदारियो से जब फुर्सत मिलती तो कोमल पहुँच जाती अपनी कल्पनाओं की दुनिया में, जहाँ वो होती और होती सिर्फ़ उसकी सोंच, जिन्हें वो कविताओं, कहानियों और चित्रों की शक्ल देकर एक छोटी-सी संदूकची में कैद कर देती। बड़े जतन से और सबकी नजरों से छिपाकर संदूकची को अपने कमरे में रखती ताकि गलती से भी किसी की नजर वहाँ तक ना पहुचे। दरअसल परिवार में पाबंदियाँ कुछ ज़्यादा थी, लड़कियों का पढ़ना लिखना तो ठीक था, लेकिन उसका जीवन में इस्तेमाल करना सख्त मना था। सोचने पर कोई पाबंदी नही थी लेकिन अगर उन्हें शब्दों में ढाल दिया जाए तो लड़की के बिगड़ने और मुखर होने का खतरा था, और तब अच्छी लड़कियाँ ज़्यादा बोला नही करती थीं।

कोमल को संगीत का भी बहुत शौक था और प्रारंभिक शिक्षा भी अपने दादाजी को देख-सुन कर उसने पा लिया था। आवाज़ भी इतनी सुरीली कि जब भी गुनगुनाती तो लगता मानो गले में सरस्वती बसती हो लेकिन जब बात आगे की शिक्षा की आयी तो कहा जाने लगा  "अच्छे घर कि लड़कियाँ ये सब नही करतीं। " इसका भी एक उपाय कोमल ने ढूँढ लिया था अक्सर शाम ढले वो ट्रांजिस्टर ले कर छत पर पहुँच जाती और संगीत की लय में डूबती उतराती दूर क्षितिज पर सूरज को घंटों निहारती तब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के गाने विविध भारती पर छाये रहते थे। कोमल भी लता जी के गानों की दीवानी थी। 'नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है, ग़र याद रहे ' उसके पसंदीदा गानों में से एक था। इस गाने को सुनते-सुनते अक्सर उसकी आँखें भर आती थी। पूरा गाना कंठस्थ था उसे , जब भी ये गाना बजता, वो भी गुनगुनाने लगती।

तब एकल परिवार का चलन कम ही था कोमल का परिवार भी एक बड़े कुनबे जैसा था संयुक्त परिवार में हर खुशी और गम हाथो हांथ बाँट लिए जाते थे इन सबके बीच सपने बुनते और कल्पनाओं की उड़ान भरते कोमल के दिन कैसे गुजर जाते, पता ही नही चलता था समय गुजरता गया और कोमल सत्रह की हो चुकी थी। अठारह होते होते दूर शहर के एक संपन्न और संभ्रांत परिवार में उसका रिश्ता तय हो गया लड़का प्रोफेसर था और उम्र में उससे करीब दस साल बड़ा था एक दिन कोमल की माँ ने कहा- "बिटिया अब कुछ दिनों में तुम अपने ससुराल चली जाओगी वहाँ तुम्हारा ख्याल रखने के लिए हमसब नहीं होंगे। तब तुम्हें अपने साथ-साथ पूरे परिवार का ख्याल रखना होगा।" कोमल ने तब धीमे स्वर में नजरें झुकाये सिर्फ़ इतना ही कहा -"मुझे अभी पढ़ने दो माँ। " " बेटी तुम्हारी शादी हो जाए फिर अपने पति के घर जाकर खूब पढ़ना।" कोमल की माँ ने कहा कोमल ने बड़ी खामोशी से तब इस फैसले को भी हँसते मुस्कुराते दिल से अपना लिया अब उसकी कल्पनाओं ने और विस्तार ले लिया। आँखों में ख्वाब सजने लगे। इस रिश्ते को लेकर वो भी बहुत उत्साहित थी। परिवार संपन्न होने के साथ ही साथ काफी प्रगतिशील भी था।

नीलाभ अपने घर का इकलौता बेटा था बहुत लाड़ प्यार में पला बढ़ा देखते ही देखते वो दिन भी गया जब कोमल नीलाभ की होने जा रही थी। घर से जाने का दुःख तो था लेकिन नए परिवार को लेकर आंखों में सपने सजाये माता पिता का आँगन छोड़ अब वह पति के घर की रौनक बन चुकी थी शुरुआत के दिनों में नए लोगों से मिलने-जुलने में सारा दिन गुजर जाता इसलिए मायके की याद थोड़ी कम ही आती थी लेकिन दिन गुजरने के साथ ही कोमल को बड़े घर के अकेलेपन का एहसास भी होने लगा अब अक्सर पुराने दिनों को याद करना और उसकी ही छटपटाहट में जीना उसकी दिनचर्या हो गयी थी मायके की याद अक्सर पालकों को भिंगो जाती इतने बड़े घर में गिने-चुने ही लोग थे और सभी उम्र में उससे बड़े यहाँ अपना दुःख वो किसी से नही बाँट सकती थी परिपक्वता के लिहाज से उसकी उम्र भी तो कम ही थी मायके में तो सबकुछ अपने छोटे भाई बहनों से साझा कर लेती थी रगड़ा भी - झगड़ा भी यहाँ तो बात करने के लिए भी कोई नहीं था। नीलाभ को कॉलेज के कामों से फुर्सत नहीं थी, सुबह उठता और छात्रों को ट्यूशन पढ़ाने में व्यस्त हो जाता फिर कॉलेज चला जाता, शाम को जब कॉलेज से वापिस आता तो अपने स्टडी रूम में चला जाता, देर रात तक पढ़ाई करता रहता। कोमल धीरे धीरे बहुत अकेलापन महसूस करने लगी थी। सास ससुर के साथ उतना खुलापन नहीं था कि अपनी बातें साझा कर सके। हालाँकि नीलाभ ने कभी भी कोमल पर किसी तरह की पाबंदी नही लगायी यहाँ उसे घूमने की, पढ़ने की, लिखने की, सोंचने की, सपने बुनने की - हर तरह की आज़ादी थी नीलाभ अक्सर कोमल से कहता रहता " घर से बाहर निकलो, लोगो से मिलो , अपना एक सर्किल बनाओ।" "अकेले कहाँ घूमने जाऊं, इस से अच्छा तो घर पर ही रहूँ"- कोमल भी मुस्कुरा कर जवाब देती। कोमल का मन अब किसी भी चीज़ में नहीं लगता था अब तो इस अकेलेपन को ही कोमल ने अपनी नियती मान ली थी अक्सर एक उदासी-सी घेरे रहती, घर के सारे कामों को करते हुए, अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए भी एक खालीपन गया था उसकी ज़िन्दगी में। जब तक नीलाभ पास रहता ,खुश रहती लेकिन नीलाभ के पास कोमल के साथ व्यतीत करने के लिए ज़यादा वक़्त ही कहाँ था। नीलाभ की ख़ुशी तो किताबों में सीमित थी ,किताब ही उसकी दुनिया थी। जाने अनजाने ही सही कोमल उपेक्षित होने लगी थी। कुछ समय बाद कोमल ने लोगो से मिलना जुलना और भी कम कर दिया। एक बेचैनी उतर आयी थी उसके अन्दर एक एक कर सारे सपने अब धूमिल होने लगे थे

इसी अकेलेपन के दिनों में कोमल ने अपना एक साझीदार बना लिया - उसकी अपनी डायरी। फिर से कहानी ,कविताएं ,कल्पनाएं डायरी के पन्नों में सहेजे जाने लगे। कल्पनाएं उड़ान भरने लगी, उसकी अपनी दुनिया फिर से बस गयी। अब वो अकेले मुस्कुरा भी लेती, उदास भी हो जाती, रूठ भी जाती और मान भी जाती कभी कभार अब खुद से भी बातें भी करने लगती थी। उसकी दुनिया सिर्फ उस तक ही सिमट कर रह गयी थी। अक्सर रात को भी कोमल जाग जाती और फिर अपनी दुनिया में खो जाती। अचानक एक दिन नीलाभ की नींद खुली तो देखा कोमल घबराई बैठी थी। घर अस्त व्यस्त था. नीलाभ ने उसे शांत किया फिर गिलास में पीने के लिए पानी दिया I " क्या हुआ, क्यों घबरा गयी थी ? " कोमल ने कुछ नहीं कहा चुपचाप नीलाभ की गोद में सर छिपा लिया। अब ये रोज़ का सिलसिला हो गया था, कभी कोमल यूँ ही नाराज हो जाती, तो कभी डर कर रात भर जागती रह जाती। कभी खाने को ज़हरीला बता सारा खाना फेंक देती। ये घटनाएं दिन--दिन बढ़ने लगी, और हर रोज़ की शिकायत अब नीलाभ तक पहुचने लगी I नीलाभ को परिस्थिति की गम्भीरता का अंदाज़ा हुआ। कोमल को भी ये अहसास तो था कि उसके साथ कुछ हो रहा है जिस पर उसका नियंत्रण नहीं। जब नीलाभ ने डॉक्टर से जांच की बात कही तो पहले तो कोमल टाल मटोल की, फिर मान गयी।

नीलाभ कोमल को लेकर डॉक्टर के पास पंहुचा। डॉक्टर ने कोमल से एक दोस्त की तरह ढेर सारी बातें की, उसके बाद कोमल को बाहर भेज दिया गया और नीलाभ से कोमल की बीमारी पर चर्चा होने लगी। डॉक्टर ने कहा- " कोमल को 'सिजोफ्रेनिआ' है। " नीलाभ स्पष्ट तौर पर नहीं समझ पाया कि ये क्या बीमारी है, हालांकि उसने इसका नाम तो सुना था, ये भी पता था कि कुछ 'मानसिक' स्वास्थय से ही सम्बंधित है। उसने चिंतित होकर डॉक्टर से पूछा- "कृपया विस्तार से बताएं कि ये है क्या ?" डॉक्टर ने बताया- "ये वो स्थिति होती है जब कल्पना और यथार्थ के बीच की रेखा टूट जाती है। व्यक्ति एक भ्रम में जीने लगता है। कल्पनाएं सच लगने लगती हैं और सच कभी कभी झूठा लगता है। कभी आवाज़ सुनायी देती है, तो कभी मन आशंकाओं से डर जाता है।" नीलाभ के लिए ये किसी झटके से कम नहीं था। कोमल कभी ऐसे दौर से भी गुज़रेगी उसने तो सोचा भी नहीं था। उसने डॉक्टर से पूछा " क्या इसका इलाज सम्भव है? अगर हां तो कितना लंबा चलेगा ?" डॉक्टर ने कहा - " निश्चिन्त रहिये दवा के साथ ही इन्हें आप सब के प्यार और देखभाल की ज़रूरत है। ये जल्दी ही ठीक हो जाएँगी। " अब नीलाभ को अपनी गलती का अहसास हो रहा था। अब वह ज़्यादा से ज़्यादा समय कोमल के साथ बिताने लगा। उसकी हर ज़रूरत का ख्याल खुद रखता, दवा से लेकर खाना तक सबकुछ कोमल समय पर ले, इसका ध्यान रखता। लेकिन गुज़रा वक़्त कब वापिस आता है, कोमल की बीमारी बहुत ज़्यादा बढ़ चुकी थी। उसकी कल्पनाएं ही अब उसकी दुनिया थी, उसका पति, उसका घर, उसके बच्चे, सब इसी कल्पना का हिस्सा थे। इस दुनिया में जीते हुए कभी वो ठहाके लगाकर हंसती, तो कभी एकदम से डर जाती, कभी ज़ोर ज़ोर से रोने लगती। नीलाभ की कोशिश होती जितना हो सके कोमल के साथ ही रहे। मुश्किलें बढ़ती जा रही थी। अब नीलाभ का भी किताबों से नाता टूटने लगा था।

इसी दौरान एक दिन कोमल की डायरी नीलाभ के हाथ लगी, फिर एक एक कर उसकी आँखों के सामने हर वो पल नाचने लगा जब उसने अनजाने में ही सही कोमल को अकेला छोड़ दिया था। कोमल की इस स्थिति का दोषी वो खुद को ठहराने लगा। इसी अपराध- बोध से उपजी घुटन ने एक दिन उसकी जान ले ली। नीलाभ की मौत के झटके ने थोड़े दिनों के लिए कोमल की सोच की दिशा मोड़ दी, लेकिन अब तो अकेलापन और भी बढ़ गया था। कोमल की कल्पनाएं फिर से पंख पसारने लगी , मन मृगमरीचिका बन गया I
नीलाभ का ना होना कोमल के लिए अस्वीकार्य था उसका मन ये सच मानने के लिए तैयार नहीं था कि अब नीलाभ नहीं हैं फिर वो भी समय आया जब यथार्थ और कल्पना के बीच की बारीक रेखा भी टूट गयी कोमल की कल्पनाएं यथार्थ का अमली जामा पहने उसे बुला रही थी। उन्ही कल्पनाओं में एक ऐसा शहर था जहां आज भी उसका पति ज़िंदा था और उसका इंतज़ार कर रहा था। कोमल के चेहरे पर मुस्कराहट तैर गयी। वक्त के सितम कम हसीं नहीं... वक्त से परे अगर मिल गए कहीं.…रेडियो पर यही गाना बज रहा था। कोमल भी गुनगुनाने लगी, साथ ही अपने कपडे एक बैग में पैक कर निकल पडी उसी शहर की ओर जहां नीलाभ उसे बुला रहा था।
                                    

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