यूँ ही ....









हरचन्द ना तू हबीब है, ना है रकीब मेरा,
तो भी अबस है ये जीस्त जिसमें तू नही।
तेरी सोहबत हयातो-मौत- ही सही फिर भी,
ज़िन्दगी अब तुझसे पहली-सी मोहब्बत ना रही ।




© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

Popular posts from this blog

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

‘आई ऍम फैन युसु’