Tuesday, January 13, 2015

क्षणिकाएँ


१.





मेट्रो की ज़िन्दगी
कंक्रीट का जंगल
मशीन से लोग
खोजती रही
खुद को
दिख रही थी
दूर तक
सिर्फ धुंध ।


२.










परेशानियों के थपेड़े
यादों की रेत से
बहा ले गए
कई अनमोल पल
शेष रह गया
तो सिर्फ
तुम्हारे
प्यार का मोती
जो
अब भी बंद है
मन की सीपी में कहीं।


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

2 comments:

ऋता शेखर मधु said...

वाह...सुन्दर भावपूर्ण क्षणिकाएँ !!

Priyambara Buxi said...

हौसला बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ऋता शेखर मधु जी

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

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