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Showing posts from November 30, 2014

अनाम रिश्ता

ख़िज़ाँ का मौसम था पर खुशनुमा सा था -  सर्द दिन थे और बंद लिफ़ाफ़े से तुम। गुज़रते वक्त में खुली किताब हो गए जिसके हर पन्ने से वाकिफ थी मैं।    जाने -अनजाने एक रिश्ते का आशियाँ सजा लिया था हमने।   साझा किया था शामो - सुबह गोया एक रूह के दो जिस्म हो।

मेरे रहबर समय कब एक सा होता है - बेरंग हुए गुलाबी लम्हे बाँझ हुआ मोहब्बत का दरख़्त दफना दिया हर ख्वाब को। अरमानों के थपेड़ों में बमुश्किल सम्हाले रखा खुद को।

सोचती हूँ - साल  की आखिरी रात