Friday, December 5, 2014

अनाम रिश्ता














ख़िज़ाँ का मौसम था
पर खुशनुमा सा था - 
सर्द दिन थे और
बंद लिफ़ाफ़े से तुम।
गुज़रते वक्त में
खुली किताब हो गए
जिसके हर पन्ने से
वाकिफ थी मैं।   
जाने -अनजाने
एक रिश्ते का आशियाँ
सजा लिया था हमने।  
साझा किया था
शामो - सुबह
गोया एक रूह के
दो जिस्म हो।


मेरे रहबर
समय कब एक सा होता है -
बेरंग हुए
गुलाबी लम्हे
बाँझ हुआ
मोहब्बत का दरख़्त
दफना दिया
हर ख्वाब को।
अरमानों के थपेड़ों में
बमुश्किल सम्हाले रखा
खुद को।


सोचती हूँ -
साल  की आखिरी रात
अनाम-अबूझ-अव्यक्त
रिश्ते के आशियाँ को
छोड़ जाऊं ।   


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