Thursday, September 18, 2014

मुक्तक १











कल के हमकदम आज किधर गए
ज़र्द पत्ते थे, पतझर में बिखर गए
परछाइयों से जुदा होना आसां न था
तेज़ हवा थी अहबाब भी मुकर गए

-------------प्रियम्बरा


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Tuesday, September 16, 2014

तूफ़ान ( त्रिवेणी )

















रक्तिम आस्मां और फिजां खामोश
तूफ़ान की तेज़ी से सहमा है चमन

बादलों ने खेली है खून की होली। 

..............प्रियम्बरा

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित! 

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

का मथS तार... क्षीर समुद्र...का खोजS तार...अनंत भगवान... मिललें... ना। यूँ तो हमारे घर में पूजा पाठ ज़्यादा नहीं हुआ करता था। 'बाबा-अ...