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Showing posts from June 15, 2014

खाली कुर्सी

उस खाली कुर्सी को जब भी देखती हूँ एक टीस सी उठती है कि कभी तुम वहाँ मौजूद थे।






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नासूर (त्रिवेणी)

थिरकती बूँदें, मद्धम हवा, सिंदूरी साँझ और तुम्हारा साथ, आगोश में सिमटे हुए ‘हम’ कहीं दूर निकल जाए - ऐसे हसीं ख्वाब अक्सर नासूर बन जाते हैं।
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