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ये हौसला…
















स दिन गार्गी उदास सी घर के कामों में उलझी थी।  उसकी उदासी को समझ पाना बहुत ही आसान था, क्योंकि जब वो खुश - प्रफुल्लित रहती है, या तो कोई प्यारा सा बांग्ला गीत गुनगुनाती रहेगी या फिर यहां की बातें - वहाँ की बातें बांग्ला मिक्स टूटी फूटी हिन्दी में बताती रहेगी, जिसमें अक्सर लिंग भेद की त्रुटियाँ भी होती थीं, हालांकि करीब  चार - पांच  सालों के हमारे साथ ने उसकी हिंदी में काफी सुधार ला दिया था। अपने नाम के बिलकुल उलट - निरक्षर, अव्वल दर्जे की नासमझ, जिसे कोई भी चकमा दे जाता, रोज़ बेवक़ूफ़ बनती। मज़ाक  करते हुए मै अक्सर उससे पूछा करती कि आखिर तुम्हारा नाम गार्गी किसने रख दिया, पता है गार्गी कितनी पढ़ी लिखी विदुषी महिला का नाम था, वो मेरी बातें सुनती और हंसती…हाँ लेकिन वो बंगाली खूबसूरती से भरी पूरी थी, दुबली पतली सी…बड़ी बड़ी आँखों वाली । अक्सर अपनी बातें मुझसे साझा करती थी -  चाहे तकलीफ - परेशानियां हो या फिर कोई खुशी की बात, यहां तक कि अगर किसी ने उसके मेहनताने की रकम भी बढ़ाई तो भी बेहद खुश होकर बताएगी। कभी किसी की बुराई करते करते नाराज़ हो जाएगी तो कभी किसी की तारीफ़ करते करते बेहद खुश। हमदोनों के बीच दोस्ती का एक रिश्ता सा बन गया था।  वो सारे हिसाब-किताब मुझसे करवाती, मै अक्सर पैसे के सही रख रखाव, सेविंग को लेकर उसे समझाती रहती थी - कभी कभी डांट भी लगाती थी।  


उस दिन बर्तन धुलते समय कुछ ज़्यादा ही आवाज़ कर रहे थे।  काफी देर तक मैं उसे यूँ ही उदासी के साथ बेमन से काम करते हुए देखती रही। आखिरकार मेरे से रहा न गया, मैंने डपटते हुए पूछ ही लिया - “ क्या है गार्गी, सारे बर्तन तोड़ेगी क्या? काहे का गुस्सा है ?” ऐसा लगा जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं।  मैंने फिर चिल्लाया -  “गार्गी - सुनायी नहीं दे रहा, अगर कोई परेशानी है तो बताओ मुझे।” वह यंत्रवत चुपचाप सी आकर मेरे पास बैठ गयी। उसके चेहरे की चमक गायब थी ,बिलकुल फीका सा चेहरा, बड़ी बड़ी आँखों में एक उदासी तैर रही थी, थोड़ी खोयी खोयी सी लग रही थी ।


उसके निस्तेज से चेहरे को देख मेरा गुस्सा एकदम से काफूर हो गया और आवाज़ में आयी तेज़ी की जगह विनम्रता ने ले ली। मैंने फिर पूछा - “क्या हुआ ?” गार्गी ने मायूसी के साथ जवाब दिया- “ क्या बताएं दीदी वो फिर आ गया है।” मैंने पूछा - “कौन तुम्हारा पति ?” उसने हाँ में सर हिलाया। मैंने कहा - “अरे ये तो अच्छी बात है। ”  वो एकदम से बिफर पडी “ क्या अच्छी बात है दीदी, उसका आना मेरे लिए तो किसी नरक से कम नहीं।” मेरे प्रत्युत्तर का इंतज़ार किये बगैर वो बोलती रही “जब जब आता है मुझे एक नया दर्द दे जाता  है।  मार पीट कर मेरे साथ पत्नी वाले सारे सुख भोगता है,  गर्भवती बनाता है, फिर अकेला छोड़ कर भाग जाता है। ये देखिये दीदी।” वो अपने चेहरे और गर्दन पर उभरे चोट के निशान दिखाने के लिए अपने लम्बे झाडूनुमा बाल को एक तरफ कर के चेहरा मेरी ओर झुकाई। मैंने ध्यान से उसके चेहरे को देखा - जगह जगह चोट के निशान थे।   गाल थोड़े सूजे हुए थे,  होठ पर और गर्दन के पास नीले - काले निशान थे। थोड़ा रुक कर बोली - “दीदी कष्ट सिर्फ नौ महीने का नहीं होता है ना, उसको पालना पोसना भी तो होता है। मैं अकेले कैसे करती हूँ सबकुछ मै ही जानती हूँ।” मैं बोल पडी  “अरे शादी तो तुम्हारी पसंद से ही हुई थी, फिर ये सब।”


ये बात इसलिए मुझे पता थी क्योंकि जाने कितनी बार उसने अपनी शादी के किस्से सुनाये थे। पति के रूप सौंदर्य के गुण गाये थे।  वो पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव से आती थी, जहां लोगों के जीवन यापन का मुख्य साधन मछली व्यापार था। पिता मछलियाँ पकड़ते और बेचा करते थे। ठीक - ठाक आमदनी थी। गार्गी पांच भाई बहनों में मंझली यानि तीसरे नंबर पर आती थी।  जिस से शादी तय हुई उस से शादी नहीं हो सकी, क्योंकि जिस दिन उसका छेका होना था उसी दिन लड़के के बहन की बच्चे पैदा करते हुए मौत हो गयी। बस उस घर के लिए शादी से पहले ही लड़की अपशकुनी हो गयी। लड़के का जिगरी दोस्त था किमराज , उसे वो भा गयी, उसने शादी का प्रस्ताव भेज दिया। लड़का देखने में सुन्दर था, उसका अपना घर था, उसके पास  अपनी मछली पकड़ने वाली नाव थी और ये उस गाँव के लिए बड़ी बात थी।  गार्गी के घर वालों ने हाँ कर दी, लेकिन किमराज की माँ इस शादी के सख्त खिलाफ हो गयी, लेकिन उसने  सबके खिलाफ जाकर गार्गी से शादी कर ली, तब गार्गी की उम्र महज़ चौदह साल थी। ये सबकुछ उसके लिए किसी सुन्दर सपने की तरह था और किमराज उसका “हीरो” बन चुका था। परेशानी तब शुरू हुई जब सास ने उसे घर में रखने से इंकार कर दिया। वो पिता के घर रहती थी, पति भी उस से मिलने वही आता, कुछ महीने ही गुज़रे थे कि गार्गी की माँ को अहसास हुआ की गार्गी ‘माँ’ बनने वाली है। परेशानी यही से शुरू हुई। कमाई उतनी ही, खर्च बढ़ने लगे। घर में पैसे को लेकर लड़ाई झगडे शुरू हो गए, आखिरकार ज़िद करके गार्गी पति के साथ दिल्ली आ गयी। उन दिनों उनकी माली हालत बेहद खराब थी, किसी तरह मेहनत मज़दूरी कर, थोड़े से चावल का इंतज़ाम हो जाता और फिर माड़ भात उनका खाना होता। बेहद मुश्किल भरे दिन थे वे, बेटी के जन्म के बाद जब उसने भी घर - घर जाकर चौका बर्तन का काम करना शुरू किया तब कही जाकर उनकी हालत में थोड़ा सुधार आया ।  


उसकी शादी का किस्सा किसी फ़िल्मी कहानी की तरह लगता था ।  लेकिन उस दिन जो बातें उसने बतायी वो एक दुसरी ही कहानी पर से पर्दा उठा रही थी।  ऐसी कहानी जो कल्पना की कोमल और रूमानी दुनिया से परे थी, यथार्थ के धरातल की सच्ची कहानी…कठोर…कड़वाहट से भरी कहानी। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा - “ चाहो तो चल कर उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवा सकती हो। जहां ज़रूरत होगी, जैसी भी सहायता चाहिए होगी हम हमेशा साथ रहेंगे।” वो बोली- “ नहीं दीदी पुलिस में जाने पर तो मामला और बढ़ जाएगा। दो दिन में चला जाएगा।” उसका निर्णय था, फिर मैंने ज़्यादा दबाव नहीं डाला।


तीन बेटियों की माँ गार्गी मेरे यहां करीब चार पांच सालों से काम कर रही है, लेकिन कभी मैंने उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में इतना विस्तार से जानने की कोशिश नहीं की, वो जितनी बातें रस लेकर सुनाती, मैं उतना ही सुनती रही और सिर्फ उतना ही जानती भी थी।  लेकिन आज मुझे बेहद अफ़सोस हो रहा था कि कभी मैंने ये जानने की कोशिश क्यों नहीं की कि ये हमेशा हँसते और गुनगुनाते रहने वाली गार्गी की कहीं कोई परेशानी तो नहीं है।


दूसरे दिन ही किमराज चला गया। यहां चला गया कहना उचित नहीं होगा…भाग गया कहना बेहतर होगा, मोहल्ले की ही एक अधेड़ विधवा के साथ भाग गया ।  गार्गी का रो रोकर बुरा हाल था।  तीनों बेटियां सहमी हुयी थी। बड़ी बेटी को तो कुछ - कुछ समझ में भी आ रहा था, बाकी दोनों तो कुछ समझने के लिए बहुत ही छोटी थी। मैंने गार्गी को चुप कराया और समझाया कि अगर वो कमज़ोर पड़ जाएगी तो बच्चों का क्या होगा।  


वो दिन और आज का दिन मैंने उसे फिर कभी रोते नहीं देखा। घर की माली हालत ठीक नहीं थी सो स्थिति सामान्य होने में कुछ महीने निकल गए। अब घर की ज़िम्मेदारी पूरी तरह गार्गी के ही कंधे पर आ चुकी थी, हालांकि पहले भी थी लेकिन तब कहीं न कहीं एक आश्वासन था कि पति का साथ तो है ही। किसी तरह भाग दौड़ कर के बेटियों का सरकारी स्कूल में नामांकन भी हो गया।  बड़ी बेटी बारह - तेरह साल की हो चुकी थी। एक दिन गार्गी ने बताया की उसके लिए एक बंगाली परिवार से रिश्ता आया है। मुझे गुस्सा आ गया, मैंने कहा - “अभी तेरे पति को तुझे छोड़कर भागे हुए साल भी नहीं लगा है, तू भी वही गलती करने जा रही है जो तेरे माँ बाप ने की।  छोटी उम्र में पढ़ाई छुड़वाकर शादी करवा रही है, ये भी वैसे ही बेवक़ूफ़ बनेगी जैसे तू बनती है। कम से कम मैट्रिक तक की पढ़ाई तो कर लेने दे फिर चाहे शादी करवा देना, बुरे समय में अपने पैरों पर खड़ा तो हो सकेगी। ” थोड़ी देर तक तो वो सर झुकाये चुप बैठी रही, फिर मायूसी के साथ कहा - “दीदी तीन तीन बेटियां है, अकेले कमाने वाले हम हैं, घर का खर्च निकाल पाना ही बहुत मुश्किल होता है।  कभी कभी तो भूखे सोने की नौबत आ जाती है, ऐसे में अगर बिना पैसे दिए बेटी की शादी हो जाती है तो फिर इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।  वो परिवार भी अपने ही गाँव का ही है। ” मैं फिर कुछ नहीं बोल सकी।  सच ही तो था, उसके लिए घर का खर्च ही निकाल पाना मुश्किल हो रहा था, उस पर बेटियों की शादी की ज़िम्मेदारी…और मै किसी नेता की तरह भाषण बाज़ी कर रही थी, जिसका आमतौर पर आम आदमी से कोई सरोकार नहीं होता है। व्यवहारिक तौर पर सोचा जाए तो शायद गार्गी बिलकुल सही थी, लेकिन फिर मुझे उस तेरह साल की नन्ही का ख्याल आया, सोचने लगी उस बेचारी का क्या दोष है, खेलने की उम्र में शादी के बाद ज़िम्मेदारियों का बोझ क्या वह उठा पाएगी, ज़िम्मेदारियों के नीचे दब कर उसका बचपन तो मर ही जाएगा, उसकी मासूमियत खो जाएगी। कई ख्याल और सवाल दिमाग को मथ रहे थे, एक तरफ बाल विवाह को रोकने के लिए बनायी गयी सरकारी नीतियों पर से विश्वास ख़त्म हो रहा था , वहीं उन गैर सरकारी संस्थाओं का भी ख्याल आ रहा था, जो बचपन बचाने का दावा करती हैं, खुद पर अफ़सोस हो रहा था कि मैं अपनी आँखों के सामने सबकुछ होते हुए देख रही थी पर कुछ कर नहीं सकती थी…और इन सब के बीच बड़े दुःख की बात ये थी कि एक बचपन ख़त्म होने को था। मैं  यही सोच रही थी कि काश कुछ ऐसा चमत्कार हो जाए और एक बच्ची का बचपन बच जाए।


उसके बाद जब भी गार्गी काम पर आती, हमारे बीच नन्ही की शादी को लेकर ही बातें होती।  मैं उसे समझाने की कोशिश करती की इतनी छोटी उम्र में शादी करवाकर वो नन्ही की ज़िंदगी बर्बाद कर रही है, लेकिन उसपर मेरी बातों का कोई असर ही नहीं होता …और मैं अपना सा मुंह लिए चुप हो जाती। गार्गी ने शादी के लिए हफ्ते भर की छुट्टियां ले ली और मैं हर बार उससे यही कहती रही कि एक बार और सोच लो, पति के किए की सज़ा बच्ची को मत दो। उसने मेरी एक नहीं सुनी। मैंने भी उससे कह दिया कि ना मैं इस   शादी के लिए किसी तरह की कोई सहायता करूंगी और ना ही इस शादी में शामिल होउंगी। उसकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर मायूसी, जाते जाते मुझसे बोली “ क्या करें दीदी इसी समाज में रहना है ना, बेटी की उम्र जितनी बढ़ेगी फिर उसी हिसाब से दहेज़ भी जुटाना होगा, अभी तो अपनी बिरादरी का लड़का मिल गया है,  और ज़्यादा खर्च भी नहीं है।”  मैंने कुछ नहीं बोला, हालांकि उसके चेहरे को देख कर ये अहसास ज़रूर हो रहा था कि वो भी इस शादी को लेकर बहुत खुश नहीं है, वो भी किसी उधेड़बुन में ही है। शादी वाले दिन सुबह - सुबह उसका फ़ोन आया।  मैंने उठाते ही कहा “ कोई फॉर्मेलिटी करने की ज़रूरत नहीं, मैंने तो पहले ही कहा था कि मै नहीं आ रही, फिर फ़ोन क्यों की।” उधर से गार्गी की आवाज़ आयी  “ दीदी मैंने शादी के लिए मना कर दिया।” मैंने कहा “ क्या ? गार्गी ये तू क्या बोल रही है,  तुझे पता तो है ?” गार्गी बोली - “ दीदी बार बार नन्ही का मासूम चेहरा सामने आ जा रहा था, आज सुबह वो बहुत रो रही थी, बार बार कह रही थी माँ मुझे पढ़ने दो अभी। आखिरकार नहीं रहा गया और मैंने निर्णय लिया कि जो गलती मेरे माँ बाप ने किया वो मैं बिलकुल नहीं करूंगी, अपने पति की गलती की सज़ा अपनी बच्ची को तो हरगिज़ नहीं दूंगी,  हाँ सारे रिश्तेदार मेरे खिलाफ बहुत कुछ बोल रहे हैं कोई बात नहीं।  कोई मुझे सनकी कह रहा है, तो कोई बच्ची का जीवन बर्बाद करने वाली माँ, लेकिन मैं  ही जानती हूँ की बच्ची का जीवन मैंने बर्बाद नहीं किया आबाद किया है।  दीदी आप सुन रही हैं ना, मैंने नन्ही को पढ़ने की आज़ादी दे दी है, उसके बचपन को मरने से रोक लिया है । आज मेरे दिल से एक बड़ा बोझ उतर गया। दीदी मैंने सही किया ना?”  

मुझसे कुछ जवाब देते नहीं बन रहा था, मैं सिर्फ इतना ही कह पायी “ गार्गी तुमने बहुत अच्छा किया।” आज मेरे भी दिल से एक बोझ उतर गया था, मैंने एक सुकून की सांस ली और आँखों से दो बूँद  छलक गए। सोच रही थी काश की हर गरीब घरों को एक गार्गी मिल जाए तो जाने कितनी नन्हियों का बचपन ख़त्म होने से बच जाए।  गार्गी ने फ़ोन रख दिया था और आज मैं, खुश होकर गीत गुनगुना रही थी “ये हौसला कैसे झुके, ये आरज़ू कैसे रुके, मंज़िल मुश्किल तो क्या धुंधला साहिल तो क्या तन्हा ये दिल तो क्या।”          
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

kuldeep thakur said…
सुंदर प्रस्तुति...
दिनांक 9/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
सादर...
कुलदीप ठाकुर
Priyambara Buxi said…
बहुत बहुत शुक्रिया
jyoti khare said…
मन को नम करती कहानी --- समाज एवं नई पीढ़ी को जीवन के प्रति सचेत भी करती है
भावुक मन को टटोलती प्रभावपूर्ण कहानी --
उत्कृष्ट
सादर

आग्रह है ----मेरे ब्लॉग में भी शामिल हों
शरद का चाँद -------
http://jyoti-khare.blogspot.in
Rohitas ghorela said…
आखिर तक आते आते रुआंस फुट पड़ा था
लेखनी की कसावट लाजवाब है.


मेरे ब्लॉग तक भी आइये,अच्छा लेगे तो ज्वाइन भी करें : सब थे उसकी मौत पर (ग़जल 2)
Priyambara Buxi said…
ज्योति खरे जी और रोहतास घरेला जी ह्रदयतल से धन्यवाद .
Bahut hi lajaawaab prastuti ... Bahut accha laga padh ke ....
मन को नम करती कहानी
Priyambara Buxi said…
पसंद करने के लिए शुक्रिया परी एम श्लोक और संजय भास्कर जी

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