Thursday, September 25, 2014

विरह अगन












विरह अगन में जलता मन, मिलने को तरस रहा है
बूँद-बूँद हिय का दरिया, नयनों से बरस रहा है
'पी' को जोहूँ, राह निहारूं, मन मेरा बौराए
जब भी पिया सपनों में आते जिया हरस रहा है

ये जो जानती मोर पिया, अब ना कभी आएगा
ऐसे ही यादों में आकर, मुझको भरमाएगा
जाने नहीं देती उसको, दूर सौतन के देस
अब ना आए मोर पिया तो ये हंसा उड़ जाएगा। 


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