Tuesday, July 29, 2014

यादें










तुम्हारी तरफ से आती हुई पुरवैया के लिए खोल दिया मैंने अपने घर के सभी दरवाज़े -झरोखे इस चाहत में कि उस गुलाबी हवा की थोड़ी सी रंगत स्वयं में समाहित कर सकूँ हवा में तैरती नमी को भी महसूस कर सकी मैं देर तक जाने कब वो नमी बूँद बनकर छलक आई गालों पर… 


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4 comments:

Shishir Pathak said...

:)

संजय भास्‍कर said...

सुन्दर प्रस्तुति !
आज आपके ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा अप्पकी रचनाओ को पढ़कर , और एक अच्छे ब्लॉग फॉलो करने का अवसर मिला !

Priyambara Buxi said...

जी आभार आपका

teetooraj said...

Excellent poem.

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

का मथS तार... क्षीर समुद्र...का खोजS तार...अनंत भगवान... मिललें... ना। यूँ तो हमारे घर में पूजा पाठ ज़्यादा नहीं हुआ करता था। 'बाबा-अ...