यादें










तुम्हारी तरफ से आती हुई पुरवैया के लिए खोल दिया मैंने अपने घर के सभी दरवाज़े -झरोखे इस चाहत में कि उस गुलाबी हवा की थोड़ी सी रंगत स्वयं में समाहित कर सकूँ हवा में तैरती नमी को भी महसूस कर सकी मैं देर तक जाने कब वो नमी बूँद बनकर छलक आई गालों पर… 


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Comments

सुन्दर प्रस्तुति !
आज आपके ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा अप्पकी रचनाओ को पढ़कर , और एक अच्छे ब्लॉग फॉलो करने का अवसर मिला !
Priyambara Buxi said…
जी आभार आपका

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