सुलगती यादें ...








सिगरेट के अधजले टुकड़ों
सी सुलगती यादें
तुम्हारे घुसपैठ की।
उस ठिठुरती शाम-
चोर दरवाज़े से
दाखिल हुए थे 'तुम'
और चंद दिनों में ही
जमा लिया था कब्ज़ा
मेरे मनःमस्तिष्क पर।

विरोध किया था मैंने
लड़ी भी थी तुमसे , लेकिन फिर
मै भी तो समर्पित हो गयी थी
एक लम्बे आत्मसंघर्ष के बाद।

अब तो तुम्हारा होना
उतना ही सच है -
जैसे सूरज  का उगना
चाँद का रूप बदलना।

लेकिन ये भी सच है
कि समानांतर चलते हुए भी
अब हमारी राहें शायद ही कभी
एक हो पाएं।






© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

vinars dawane said…
बहुत ही वास्तविक.... इस दौर के सच के बहुत ही करीब..
Priyambara Buxi said…
शुक्रिया

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