Monday, June 16, 2014

नासूर (त्रिवेणी)















थिरकती बूँदें, मद्धम हवा, सिंदूरी साँझ और तुम्हारा साथ, आगोश में सिमटे हुए ‘हम’ कहीं दूर निकल जाए - ऐसे हसीं ख्वाब अक्सर नासूर बन जाते हैं।  

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

No comments:

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

का मथS तार... क्षीर समुद्र...का खोजS तार...अनंत भगवान... मिललें... ना। यूँ तो हमारे घर में पूजा पाठ ज़्यादा नहीं हुआ करता था। 'बाबा-अ...