नासूर (त्रिवेणी)















थिरकती बूँदें, मद्धम हवा, सिंदूरी साँझ और तुम्हारा साथ, आगोश में सिमटे हुए ‘हम’ कहीं दूर निकल जाए - ऐसे हसीं ख्वाब अक्सर नासूर बन जाते हैं।  

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

Popular posts from this blog

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

‘आई ऍम फैन युसु’