फितरत (त्रिवेणी )







यूँ तो चमकता माहताब था हमसफ़र उसका,
फिर क्यों सिमट आयी आफताब की बाहों में रात

मुद्दतें बीत गयी इश्क़ ज़हीन ना हुआ।




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