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Showing posts from December 8, 2013

अन्तर्द्वन्द

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ड़ती हूँ एक मुकदमा
हर रोज़ मैं
कभी तुम्हें कटघरे में रखती हूँ
तो कभी तुम्हारी तरफ़ से
जिरह भी मैं करती हूँ
तब सवाल भी मेरे होते हैं
और जवाब भी मैं ही देती हूँ
जिरह के इस खेल में...
रात सुबह में तब्दील हो जाती है
और, सुबह रात में....
पर, ना ही कभी तुम जीत पाते हो
और ना मैं .
यूँ लगता है जैसे
मस्तिष्क कि जटिल बनावट में
'तुम'
अटक से गए हो कही.



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