अन्तर्द्वन्द







ड़ती हूँ एक मुकदमा
हर रोज़ मैं
कभी तुम्हें कटघरे में रखती हूँ
तो कभी तुम्हारी तरफ़ से
जिरह भी मैं करती हूँ
तब सवाल भी मेरे होते हैं
और जवाब भी मैं ही देती हूँ
जिरह के इस खेल में...
रात सुबह में तब्दील हो जाती है
और, सुबह रात में....
पर, ना ही कभी तुम जीत पाते हो
और ना मैं .
यूँ लगता है जैसे
मस्तिष्क कि जटिल बनावट में
'तुम'
अटक से गए हो कही.



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!


Comments

बहुत उम्दा प्रयास और उतना ही खूबसूरत कैप्शन फ़ोटो.
ऐसी खूबसूरत रचनायें उम्मीद जगाती हैं ....
सिद्धार्थ
शुक्रिया सिद्धार्थ... हौसला बढ़ाने के साथ ही कमियाँ बताने कि भी ज़रूरत है.
जी , अवश्य प्रियम्बरा जी !! एक बार हमे उस योग्य तो हो जाने दें..... फिर कमियां भी गिना देंगे....एक सुधि पाठक की भाँति l

अभी तो छोटे छितौने की तरह खिलखिलाने में ही पर्याप्त आनंद की अनुभूति हो रही है.
साभार-- सिद्धार्थ

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