Tuesday, December 10, 2013

अन्तर्द्वन्द







ड़ती हूँ एक मुकदमा
हर रोज़ मैं
कभी तुम्हें कटघरे में रखती हूँ
तो कभी तुम्हारी तरफ़ से
जिरह भी मैं करती हूँ
तब सवाल भी मेरे होते हैं
और जवाब भी मैं ही देती हूँ
जिरह के इस खेल में...
रात सुबह में तब्दील हो जाती है
और, सुबह रात में....
पर, ना ही कभी तुम जीत पाते हो
और ना मैं .
यूँ लगता है जैसे
मस्तिष्क कि जटिल बनावट में
'तुम'
अटक से गए हो कही.



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3 comments:

Siddharth Vallabh said...

बहुत उम्दा प्रयास और उतना ही खूबसूरत कैप्शन फ़ोटो.
ऐसी खूबसूरत रचनायें उम्मीद जगाती हैं ....
सिद्धार्थ

प्रियम्बरा said...

शुक्रिया सिद्धार्थ... हौसला बढ़ाने के साथ ही कमियाँ बताने कि भी ज़रूरत है.

Siddharth Vallabh said...

जी , अवश्य प्रियम्बरा जी !! एक बार हमे उस योग्य तो हो जाने दें..... फिर कमियां भी गिना देंगे....एक सुधि पाठक की भाँति l

अभी तो छोटे छितौने की तरह खिलखिलाने में ही पर्याप्त आनंद की अनुभूति हो रही है.
साभार-- सिद्धार्थ

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