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'आत्मविश्वास' (लघु कथा)


रात के डेढ़ बज रहे है, यामिनी बार बार अपने हाथों को धोये जा रही है. इसी हाथ को उसके गन्दे हांथो ने पकड़ा था. उस मंझोले कद वाले पिशाच पर थप्पड़ का भी कोई असर नही था. लोगों कि आवाज़ सुनते ही अन्धेरे में कहीं गायब हो गया वो. अगर लोग नही आए होते तो...? यामिनी अपने हाथों को बार बार धोकर उस एहसास... उस डर को धोना चाह रही है, जो कहीं ना कहीं उसके आत्मविश्वास को कम कर रहा है .



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

कुछ सच अधूरे होते हैं वैसे ही जैसे दीवार पर टंगे फोटो फ्रेम में रिश्ते. अब विश्वास के लायक तो अपनी ही आत्मा नहीं रही फिर आत्मविश्वास कहाँ से आये. अपनी ही पहलु में खंजर छिपे होते हैं अब तो..... कम से कम ऑब्जरवेशन रिपोर्ट तो यही बताती है. वैसे अच्छा प्रयास था .मेरी तरफ से एक like बनता है.

Siddharth Vallabh.
शुक्रिया... सिधार्थ वल्लभ... वैसे आत्मा हमेशा विश्वास के काबिल ही होती है, एक घटना थोड़ी देर के लिए आत्मविश्वास को कम कर सकती है, लेकिन तोड़ नही सकती. नई सुबह हमेशा इंतज़ार करती है.
यहाँ आत्मा से मेरा मतलब अपने लोगों से था. अपने लोग ,जो हमारे साथ रहते- बसते हैं वैसे ही जैसे आत्मा जिस्म में बसती है. ऑब्जरवेशन रिपोर्ट यही कहती है कि आत्मविश्वास का हनन सबसे ज्यादा इन्ही अपनों के द्वारा होता है क्योंकि सबसे ज्यादा विश्वास के काबिल यही तो होते हैं.अभी चार दिन पहले आरा का न्यूज़ पढ़ा था जिसने बहुत मुझे बुरी तरह झकझोरा है. बच्चे अगर बाप पे भी भरोसा ना करें तो फिर किस पे करें. शायद उसी घटना की प्रतिक्रिया थी मेरी.
प्रतिक्रिया होनी चाहिए बिलकुल होनी चाहिए... अच्छा लगा कि सम्वेदनशीलता अब भी बाकी है.
Thanks and waiting for next vision... Hope will come shortly.
Shishir Pathak said…
I M WAITING FOR FEW MORE COMPOSITIONS TOO....

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