Skip to main content

आख़िर जिया ने ऐसा क्यों किया ?





जिया खान नही रही. वैसे एक अदाकारा के तौर पर वे मुझे कुछ ख़ास पसंद नही थी, किन्तु जिस तरीके से उन्होंने अपनी ज़िंदगी खत्म कर ली, एक महिला के तौर पर ना चाहते हुए भी मैं उस से जुड़ती चली गयी. एक समय तो ऐसा लगा कि कुछ देर और उसकी कहानी टी वी पर देखी तो भावनात्मक रुप से कमजोर हो जाऊँगी.
एक 25 साल कि प्यार में पागल युवती, जिसने अपने प्यार को साबित करने के लिए अंततः खुदकुशी का सहारा लिया . प्यार में पागल होने का पता भी उसके पत्र से चलता है, जिसपर उसके हस्ताक्षर भी नही है... जिसमें बहुत ही निजी बातें भी लिखी गयी है, जिसे चैनल वाले बार बार दिखा रहे है. जिन बातों को उसने  अब तक सबसे छिपाया होगा वो सार्वजनिक हो चुका है.

ज कि पीढ़ी "मूव ऑन" वाली है... जब तक प्यार है तब तक रिश्ता है नही तो रास्ते अलग. किसी के लिए जान देने जैसी घटनाएँ अब 'रेअर' होती हैं. आमतौर पर ऐसे कदम अत्यधिक गुस्से में या अत्यधिक डिप्रेशन के कारण उठाते हुए ही अब तक देखा, सुना या पढ़ा है. फिर किसी दुसरे की वजह से ख़ुद को खत्म कर देना ये कहाँ तक सही है ?  

मेरे दिमाग में बार बार यही सवाल आ रहा है कि आख़िर जिया ने ऐसा क्यों किया ? क्या 25 साल कि उम्र में उसे ये एहसास हो गया कि बस अब ज़िंदगी में कुछ रखा नही है... या सच में वो कुछ साबित करना चाहती थी... या फिर ये फैसला बेहद तनाव में लिया गया था. जो भी हो सच यही है कि मामले को उलझा छोड़, सबको सकते में डाल... जिया अब इस दुनिया में नही रही.


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

Shishir Pathak said…
i equally feel bad particularly for the reason she raised that she had to abort her child...this may has caused a trauma n forced her to take such unfortunate decision....rest in peace
Yes Shishir...what i feel i have written... but that was really an unfortunate decison.

Popular posts from this blog

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी नहीं बल्कि मनुष्य एक सामूहिक प्राणी है। पहले जाति विशेष का समूह, फिर धर्म विशेष, फिर गाँव विशेष, शहर विशेष, क्षेत्र विशेष, राज्य विशेष, भाषा विशेष, देश विशेष, विचारधारा विशेष- सुविधानुसार हम सब अपने-अपने समूह में शामिल रहते हैं। इतना ही नहीं ये सामूहिक विभेद का काम विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर भी चलता रहता है। बंटवारे का बीज तो हम सब बचपन से ही अपने मन में बोये रहते हैं। समय-समय पर कोई महापुरुष या स्त्री इसमें खाद पानी दे जाते हैं, और ये फलने फूलने लगते हैं। फेसबुक और व्हाट्सएप्प जैसे सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म भी समूह बनाने की सहूलियतें दे रहा है। यहाँ भी लोग सामूहिक बँटवारे को बड़े प्यार से अपना रहे। अगर आपको सामूहिक बँटवारा पसंद नहीं तो भी लोग आपको बाँट कर ही रहेंगे। कोई आपको जातिगत समूह में शामिल करेगा तो कोई शहर, राज्य, पेशेगत समूह में शामिल करेगा, लेकिन बँटवारा ज़रूरी है।
बँटवारे के बाद शुरू होता है सामूहिक बड़ाई और बढ़ावा देने का सिलसिला। तू मेरी पीठ थपथपा मैं तेरी थपथपाऊँ, और अगर किसी और समूह वाले ने किसी दूसरे समूह के लोगों पर टिप्पणी कर दी तो 'च…

बुरा स्वप्न

आँखों की पुतली में हरकत 
एक आस  शायद अभी खुलेंगी आँखें  और हम पुनः जुट जाएंगे इशारों को  समझने में  लेकिन  पलकें मूँद गयी  स्थिर हो गयी पुतलियाँ  धडकनें थम गयी  चेहरे पर असीम शान्ति  हथेलियों की गर्माहट घटने लगी  क्षण भर में  बर्फ हो गयी हथेलियाँ  हर तरफ सिसकियाँ  लेकिन मैं गुम थी  विचारों के  उथल पुथल में - मृत्यु इतनी शीतल है  फिर  गर्म - खारे पानी का ये सैलाब क्यों  जब मृत्यु इतनी शांत है  फिर क्यों जूझना  भावनाओं के तूफ़ान से  मृत्यु तो सबसे बड़ा सच है  फिर झूठी ज़िन्दगी से मोह क्यों ??    



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

महिला दिवस पर कार्यक्रमों, संदेशों, कविताओं की झड़ी लग गई है। सारे लोग अपने अपने तरीकों से महिलाओं को सशक्त करने/होने की बात कर रहे। महिला दिवस पर स्री सशक्तिकरण का जितना भी राग अलापें लेकिन ये सच है कि एक सशक्त महिला सबकी आँखों का काँटा होती है। जब वो अपने बलबूते आगे बढ़ती है, उसे कदम दर कदम अपने चरित्र को लेकर अग्नि परीक्षा देनी होती है। अगर वो सिंगल/अनब्याही है, तो हर रोज़ उसे लोगों की स्कैनर दृष्टि से गुज़रना पड़ता है। अक्सर पुरुषों की दृष्टि उसमें अपने ऑप्शन्स तलाशती रहती हैं। उम्र, जाति, खानदान यहां तक कि उनके सेक्सुअल अभिरुचि पर भी सवाल किये जाते हैं।  एकबार एक बहुत ही वरिष्ठ व्यक्ति, जो दिल्ली  में वरिष्ठ पत्रकार है, ने पूछा था, “तुमने शादी नहीं की? अकेली रहती हो या लिव इन में ? तुम्हारा पार्टनर कौन है? “ मतलब ये कि “एक महिला अकेले रहती है, कमाती है, खाती है “  ये बात किसी से हजम नहीं होती। तीस साल की होने के साथ ही शादी का ठप्पा लगना ज़रूरी हो जाता है, अगर शादी नहीं की और हँसते हुए पूरे उत्साह के साथ  जीवन गुज़ार रही तो लोगों को वैसी महिलाएं संदिग्ध नज़र आने लगती हैं। लोग अक्सर उनकी …