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महिला हूँ... कमजोर नही


सुबह अनजाने नंबर से संदेश आया, एक महिला मुझसे सुझाव माँग रही थी. वो ख़ुद एक न्यूज़ चैनल में काम करती है, वहाँ उसके सहकर्मियों ने उसे मानसिक रुप से प्रताड़ित किया था, उसका सवाल था वो क्या करे? पहले मुझे समझ नही आया कि मुझे जवाब देना चाहिए या नही, फिर ऐसा लगा कि हो सकता है इस वक्त वाकई उसे इसकी ज़रूरत हो,  एक महिला होने के नाते उसकी सहायता करना मुझे अपना फर्ज़ लगा और मैंने तुरंत जवाब दिया कि अपने कार्यालय में पता करो महिला सेल है या नही अगर नही हो तो तुरन्त अपने बॉस के पास जाओ और सारी बातें बता दो. उसका जवाब आया, नही ये काफ़ी व्यक्तिगत मामला है, इसलिए बॉस को नही बता सकती.  कभी उस सहकर्मी से अच्छे रिश्ते थे जो अब काफ़ी बिगड़ गया है, और आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गया है, वो हमारा मोबाइल ले लिया है जिसमे सारा डेटा है, नंबर्स है,  मैं चाहती हूँ पोलिस के पास शिकायत दर्ज करवा दूँ. मैंने कहा कि तब तुमने मुझसे सुझाव क्यो माँगा ? तुम्हे तुरंत पुलिस शिकायत दर्ज करवानी चाहिए थी . मेरी इस प्रतिक्रिया के बाद उसका जवाब आया, अमृता प्रीतम जी ने कहा था " जन्मों कि बात मैं नही जानती, लेकिन कोई दूसरा जन्म हो तो...इस जन्म में कई बार लगा कि औरत होना गुनाह् है... लेकिन यही गुनाह् मैं फिर से करना चाहूँगी" एक महिला होने के नाते शिकायत दर्ज करवाने से बेहतर सुझाव आपसे चाहती थी .
ये सारी बातें मेरे मन में ढेर सारे सवाल छोड़ गयी, पहला तो ये कि हम किसी को इतना हक कैसे दे देते हैं कि वो हमे इस तरह से  मानसिक क्षति पहुँचा सके, दूसरा ये कि बेहतर सुझाव क्या हो सकता था और तीसरा ये कि हम कब तक ख़ुद को महिला, कमजोर , निरीह मान कर दूसरों को उसका फायदा उठाने का हक दे सकते हैं ???


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