यादें .... ये यादें




काश की यादों को मिटाया जा सकता .... काश की हम बीते दिनों को वापिस ला पाते, पर सच है की ये संभव नहीं है। पिछले दिनों घर की सफाई करते हुए ऐसी ही यादों के ज्वार भाटे को मैंने महसूस किया।  घर शिफ्ट करने के बाद ये पहला मौका था जब मैं झाड पोंछ करने के साथ ही एक - एक सामान खोल - खोल कर देख रही थी और ज़रूरी चीज़ों को संभाल रही थी, गैर ज़रूरी चीज़ों को फ़ेंक रही थी। 
पिछले साल 1 मार्च को  हम इस नए फ्लैट में शिफ्ट किये तब पापा भी हमारे साथ थे।  इससे पहले वाले फ्लैट में करीब 5 साल हमने गुज़ारा .... वे पांच साल एक एक कर आँखों के सामने से गुजरने लगे .... क़ानून से लेकर इंश्युरेंस तक की किताबें, कोट, पेंसिल, इरेज़र, डायरी ....  पापा की दवाइयां, प्रिस्क्रिप्शन, टोर्च  और साथ ही आइसक्रीम स्टिक का वो बण्डल जिससे रेडिएशन के साथ साथ पापा को माउथ एक्सर्साइस करना था ।  एक एक चीज़ें याद आने लगी .... हालाँकि उन यादों से मै  अपना पीछा छुडाना चाहती थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका 
समय चाहे कितनी भी धुल की परतें चढ़ा दे लेकिन यादें कभी मिटती नहीं .....        

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Comments

Popular posts from this blog

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

‘आई ऍम फैन युसु’