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Showing posts from 2013

अह्सास ( लघु कथा 2)

तुमने जो बोरोलिन का ट्यूब दिया था... बहुत सम्हाल कर रखी थी मै. उसके साथ ही एहसास हुआ था तुम्हारे प्यार का...ये भी एहसास हुआ था कि तुम्हे मेरी कितनी परवाह है. सुनो... बोरोलिन का ट्यूब खत्म होने को है...क्या तुम्हारा प्यार भी ?

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

अन्तर्द्वन्द

ड़ती हूँ एक मुकदमा
हर रोज़ मैं
कभी तुम्हें कटघरे में रखती हूँ
तो कभी तुम्हारी तरफ़ से
जिरह भी मैं करती हूँ
तब सवाल भी मेरे होते हैं
और जवाब भी मैं ही देती हूँ
जिरह के इस खेल में...
रात सुबह में तब्दील हो जाती है
और, सुबह रात में....
पर, ना ही कभी तुम जीत पाते हो
और ना मैं .
यूँ लगता है जैसे
मस्तिष्क कि जटिल बनावट में
'तुम'
अटक से गए हो कही.



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!


पड़ोस कि कुछ बातें और बचपन कि यादें

तीन मंज़िल वाले मकान के दूसरी मंज़िल पर स्थित है मेरा छोटा सा फ्लैट. फ्लैट्स आपस में इस तरह से जुड़े हुए हैं कि ऊपर वाले या नीचे वाले फ्लैट में सामान्य आवाज़ में भी बातें कि जाए तो हमारे फ्लैट में स्पष्ट सुनायी देती है. हम अपने किचन में काम करते रहते है...और हर फ्लैट कि ख़बर हो जाती है कि कहाँ क्या हो रहा है. हमारे फ्लैट के बिलकुल ऊपर वाले फ्लैट में जो परिवार रहता है उसमें पति पत्नी और दो बच्चे शामिल है. सनी बेटे का नाम है तीन या चार साल का होगा.  मई में उस परिवार में परी का आगमन हुआ है. पहले अक्सर उस घर से ज़ोर ज़ोर से झगड़ने कि आवाजें आती रहती थी. कभी कभी तो उनकी वजह से हमारी नींद खराब हो जाती थी. परी के आने के बाद से माहौल में थोड़ी शान्ति है. बस सब उस में ही व्यस्त रहते है... परी को ये चाहिए... परी को वो चाहिये. सुनकर (देख नही पाती) अच्छा लगता है कि घर में बेटी का आना वहाँ के लिये सुखद है.

बिलकुल नीचे वाले फ्लैट में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते है. अंकल कि उम्र क़रीब पचहत्तर साल होगी. उन्हें ऊँचा सुनायी देता है. पोपली ज़ुबान है उनकी. आंटी चिल्ला चिल्ला कर उनसे बात करती है... और उन्हें क…

अंधभक्ति का स्याह सच

ल कुछ चैनल्स पर डिस्कशन चल रहा था... विषय था 'आसाराम'. डिस्कशन में ढेर सारे मुद्दे उठ रहे थे... लेकिन जो बात मुझे बार बार खटक रही थी वो थी आरोपी को बार - बार 'संत' से संबोधित करना या फिर नाम के अंत में 'बापू' संबोधन का प्रयोग . एक तो हमारे देश में वैसे ही इतने 'भक्त' भरे पड़े है, एक व्यक्ति ने किसी कि भक्ति शुरू कि तो पूरा हुजूम उसके  पिछे चल पड़ता है. आश्रम शुरू करना  व्यवसाय बनता जा रहा है. ऐसी घटनाये होती रहती है फिर भी अनुयायियों कि संख्या में कोई कमी नही आती. लाखों का चंदा ऐसे ही  किसी तथाकथित गुरुओं को समर्पित कर दिया जाता है और फिर ऐसे लोग उसे नाजायज तरीके से खर्च करते है.

ये भी सोचने वाली बात है कि आम लोगों कि आख़िर ऐसी कौन सी भावना काम करती है जो वे आसानी से किसी के भक्त बन जाते है. भक्त ही नही अंधभक्त बन जाते है और ऐसे गुरुओं को बापू, संत, भगवान से संबोधित करने लगते है. उन गुरुओं का कहा पत्थर कि लकीर हो जाता है... उनकी वजह से खान पान, रहन सहन भी बदल जाता है. यहाँ तक कि अगर कोई उसके खिलाफ बोले तो वो भी दुश्मन हो जाता है. भी कभी ऐसा लगता है कि …

'आत्मविश्वास' (लघु कथा)

रात के डेढ़ बज रहे है, यामिनी बार बार अपने हाथों को धोये जा रही है. इसी हाथ को उसके गन्दे हांथो ने पकड़ा था. उस मंझोले कद वाले पिशाच पर थप्पड़ का भी कोई असर नही था. लोगों कि आवाज़ सुनते ही अन्धेरे में कहीं गायब हो गया वो. अगर लोग नही आए होते तो...? यामिनी अपने हाथों को बार बार धोकर उस एहसास... उस डर को धोना चाह रही है, जो कहीं ना कहीं उसके आत्मविश्वास को कम कर रहा है .



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आख़िर जिया ने ऐसा क्यों किया ?

जिया खान नही रही. वैसे एक अदाकारा के तौर पर वे मुझे कुछ ख़ास पसंद नही थी, किन्तु जिस तरीके से उन्होंने अपनी ज़िंदगी खत्म कर ली, एक महिला के तौर पर ना चाहते हुए भी मैं उस से जुड़ती चली गयी. एक समय तो ऐसा लगा कि कुछ देर और उसकी कहानी टी वी पर देखी तो भावनात्मक रुप से कमजोर हो जाऊँगी.
एक 25 साल कि प्यार में पागल युवती, जिसने अपने प्यार को साबित करने के लिए अंततः खुदकुशी का सहारा लिया . प्यार में पागल होने का पता भी उसके पत्र से चलता है, जिसपर उसके हस्ताक्षर भी नही है... जिसमें बहुत ही निजी बातें भी लिखी गयी है, जिसे चैनल वाले बार बार दिखा रहे है. जिन बातों को उसने  अब तक सबसे छिपाया होगा वो सार्वजनिक हो चुका है.

ज कि पीढ़ी "मूव ऑन" वाली है... जब तक प्यार है तब तक रिश्ता है नही तो रास्ते अलग. किसी के लिए जान देने जैसी घटनाएँ अब 'रेअर' होती हैं. आमतौर पर ऐसे कदम अत्यधिक गुस्से में या अत्यधिक डिप्रेशन के कारण उठाते हुए ही अब तक देखा, सुना या पढ़ा है. फिर किसी दुसरे की वजह से ख़ुद को खत्म कर देना ये कहाँ तक सही है ?  

मेरे दिमाग में बार बार यही सवाल आ रहा है कि आख़िर जिया न…

पापा आपकी बहुत याद आती है.

मई माह कि शुरुआत हो गयी. ना चाहते हुए भी कुछ यादें कभी पीछा नही छोड़तीं. 2012 का यही तो महीना था जब अन्तिम बार पापा को सही से बैठते हुए और चलते हुए देखे थे. क़रीब बीस दिनों कि छुट्टी लेकर घर गए थे... पापा के हर डाइट कि ज़िम्मेदारी मेरी थी, समय पर नही लेने पर गुस्साते भी थे. बीस दिन देखते देखते बीत गए और फिर आ गया मेरे दिल्ली आने का दिन.... पहली बार पापा को इतना भावुक देखे... उन्होंने कहा - "मेरी बेटी आज जा रही है हम कुछ नही खाएँगे."  हम अपने हाथों से खिचड़ी बनाये थे,  पापा से कहे मेरा मन रखने के लिए खा लीजिए... मेरी जिद पर वो दो चम्मच खा लिए. पहली बार पापा को इतना भावुक देख हमे अच्छा नही लग रहा था, लेकिन हमे क्या पता था कि वास्तव में उन्हें भी ये एहसास था कि अब उनके पास ज़्यादा दिन नही है.


...और फिर अगस्त महीने में जब घर गए.... पापा कि स्थिति देख कर बहुत घबराहट हुयी साथ ही अफसोस भी हुआ, तब तो वो उस स्थिति में भी नही थे जो मेरी जिद पर दो चम्मच पी भी सके.      


समय बीत जाता है... पर यादें कभी नही मिटती. उनके जाने के बाद समझ आया कि उस दिन पापा इतने भावुक क्यों हुए थे. पापा आपकी…

जीवन चक्र

दिल्ली का छोटा सा मेरा घर, और घर में है एक छोटी सी बालकनी. बालकनी में मैंने लकड़ी का एक छोटा सा रेक रखा हुआ है. एक दिन मैंने देखा एक कबूतरी बड़े ही जतन से वहाँ घोसला बना रही है, उसके जतन और मेहनत को देखते हुए मुझे उससे एक अलग सा लगाव हो गया. कुछ दिनों में उसने वहाँ अंडे दिए, मैं हर रोज़ देखा करती थी कि अंडे कि क्या हालत है, कबूतरी कैसी है, लंबे अंतराल तक सेने के बाद उस से चूजे निकल आए. उस दिन मेरी खुशी का ठिकाना नही था. ढेर सारी तस्वीरें ली... ऐसा लग रहा था जैसे अब वो मेरे परिवार का, मेरे घर का, मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गए हो. फिर एक दिन मैंने देखा एक कबूतर आकर उसे और उसके चूजों को चोंच से मार रहा है, उसके घोंसले को तोड़ रहा है. मैंने उसे भगाया, रात में देर तक उसकी सुरक्षा के लिए मैं दरवाज़ा खोले बालकनी में बैठी रही. जब देखी सबकुछ शांत है, फिर जाकर सो गयी. सुबह उठने के साथ सबसे पहले बालकनी में गयी.... वहाँ का नजारा दिल दहलाने वाला था. दोनों चूजे मरे पड़े थे, उसका घोस्ला टूटा हुआ था. थोड़ी देर बाद कौवे आए और शोरगुल के साथ उन चूजों को उठा कर ले गए. उसके बाद मैंने तय कर लिया कि अब मै कभी…

महिला हूँ... कमजोर नही

सुबह अनजाने नंबर से संदेश आया, एक महिला मुझसे सुझाव माँग रही थी. वो ख़ुद एक न्यूज़ चैनल में काम करती है, वहाँ उसके सहकर्मियों ने उसे मानसिक रुप से प्रताड़ित किया था, उसका सवाल था वो क्या करे? पहले मुझे समझ नही आया कि मुझे जवाब देना चाहिए या नही, फिर ऐसा लगा कि हो सकता है इस वक्त वाकई उसे इसकी ज़रूरत हो,  एक महिला होने के नाते उसकी सहायता करना मुझे अपना फर्ज़ लगा और मैंने तुरंत जवाब दिया कि अपने कार्यालय में पता करो महिला सेल है या नही अगर नही हो तो तुरन्त अपने बॉस के पास जाओ और सारी बातें बता दो. उसका जवाब आया, नही ये काफ़ी व्यक्तिगत मामला है, इसलिए बॉस को नही बता सकती.  कभी उस सहकर्मी से अच्छे रिश्ते थे जो अब काफ़ी बिगड़ गया है, और आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गया है, वो हमारा मोबाइल ले लिया है जिसमे सारा डेटा है, नंबर्स है,  मैं चाहती हूँ पोलिस के पास शिकायत दर्ज करवा दूँ. मैंने कहा कि तब तुमने मुझसे सुझाव क्यो माँगा ? तुम्हे तुरंत पुलिस शिकायत दर्ज करवानी चाहिए थी . मेरी इस प्रतिक्रिया के बाद उसका जवाब आया, अमृता प्रीतम जी ने कहा था " जन्मों कि बात मैं नही जानती, लेकिन कोई दूसरा ज…

पुराने दिनों को याद कर रही थी..... कुछ यादें

सुनो,
(गिन्नि, निधि, श्वेता, भोली, सोनल,  शिल्पी)

लो एक बार फिर अपना बचपन जी जाएँ

गलती कि सज़ा मिलने पर एक साथ सभी खड़े हो जाएँ

उत्तर नही आने पर एक दुसरे को नकल करवाये

इन्दुबाला जीजी कि कक्षा में सब सो जाएँ

लमहर सहरिया पर पाँव थिरकाये

विज्ञान मेला में ऊधम मचाये

मोहन भइया और बोन्नी संग खूब सिटी बजाये

लड़का हो या लड़की डिक्की से ये पूछ कर आयें

ट्रेन में खिड़की के पास बैठने के लिए

आपस में लड़ जाएँ

एक दूसरे से फ़ोन पर घंटों बतियाएँ

बीना बात एक दूसरे के घर जाएँ

और,  ढेर सारे पत्र मित्र बनाएँ

चलो, एक बार फिर अपना बचपन जी जाएँ


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

मानसिकता

ज मेट्रो में दो महिलाओं कि बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि लोग कैसी कैसी मानसिकता लेकर जीते है. एक महिला दूसरी को समझाए जा रही थी कि मैडम आज के समय में महत्वपूर्ण सिर्फ़ माया है. अब देखिये लड़कियों का बलात्कार हो जाता है, उनकी ज़िंदगी बरबाद हो जाती है, उनके माँ - पिता को पैसे दे दिए जाते है और फिर वो चुप होजाते है. उनके पास उदाहरण भी पता नही कहाँ कहाँ से आ जा रहे थे.... यहाँ तक कि आजकल कि सारी लड़कियाँ जो अपने बलबूते अच्छी ज़िंदगी जी रही है उसे भी वो ग़लत नजर से ही देख रही थी उनका मानना था कि आज कल कि लड़कियाँ बमुश्किल दसवीं पास करती है और चार - पाँच हज़ार कि नौकरी करने लगती हैं लेकिन जितना खर्चीला जीवन जीती है कही से भी ये महसूस नही होता कि उनकी कमाई इतनी कम है, तो आख़िर उनके पास इतना रुपया आता कहाँ से है, इसी सब तरीके से आता है.

मैं सुन रही थी जब जवाब देने का सोचि तब तक वो मैडम उतर गयी... बड़ी कोफ्त हुई उनकी बातें सुनकर... क्या उनके विचार है. कम से कम अपनी सोच को लोगों कि सोच तो ना बनाइये... ऐसा आप सोचती है, लोग नही. कल को अगर आपकी बेटी के साथ ऐसा कुछ भी होता है तो शायद आपका रवै…

गोरा

न दिनों दूरदर्शन पर धारावाहिक  "गोरा"  देख रही हूँ।  सप्ताह में दो दिन आता है और तीन हफ्ते से मैं इसे देख रही हूँ .... ना कोई हल्ला - गुल्ला, ना ही तेज़ संगीत और ना ही एक ही दृश्य का बार - बार  दोहराव।  पार्श्व संगीत में बाउली गायकों की सुमधुर  आवाज़ और बांगला संगीत बहुत ही कर्णप्रिय लगते है। हालांकि तकनिकी खामियां इस धारावाहिक में नज़र आती है लेकिन ये उपन्यास मुझे इतना प्रिय है की उन खामियों के बावजूद मैं खुद को उन्हें देखने से नहीं रोक पाती।  
रविन्द्र नाथ टैगोर की लिखी हुई इस किताब का हिंदी अनुवाद पढने का मौका मिला जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी ... और तब से आज तक मैं ना ही उस उपन्यास को और ना ही उसके मुख्य चरित्र को भूल पायी हूँ।   "गोरा" को पढ़ते हुए उस चरित्र की कल्पना अनायास ही हो जाया करती थी हालांकि धारावाहिक के चरित्र और उसमे कोई समानता नहीं है।  इस धारावाहिक की एक और खासियत है की इसके एक - एक डायलोग को आप सुन सकते हैं .... बस यहाँ भी ब्रेक का झमेला है जो बीच बीच में धारावाहिक की एकाग्रता तोड़ देता है।   

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यादें .... ये यादें

काश की यादों को मिटाया जा सकता .... काश की हम बीते दिनों को वापिस ला पाते, पर सच है की ये संभव नहीं है। पिछले दिनों घर की सफाई करते हुए ऐसी ही यादों के ज्वार भाटे को मैंने महसूस किया।  घर शिफ्ट करने के बाद ये पहला मौका था जब मैं झाड पोंछ करने के साथ ही एक - एक सामान खोल - खोल कर देख रही थी और ज़रूरी चीज़ों को संभाल रही थी, गैर ज़रूरी चीज़ों को फ़ेंक रही थी। 
पिछले साल 1 मार्च को  हम इस नए फ्लैट में शिफ्ट किये तब पापा भी हमारे साथ थे।  इससे पहले वाले फ्लैट में करीब 5 साल हमने गुज़ारा .... वे पांच साल एक एक कर आँखों के सामने से गुजरने लगे .... क़ानून से लेकर इंश्युरेंस तक की किताबें, कोट, पेंसिल, इरेज़र, डायरी ....  पापा की दवाइयां, प्रिस्क्रिप्शन, टोर्च  और साथ ही आइसक्रीम स्टिक का वो बण्डल जिससे रेडिएशन के साथ साथ पापा को माउथ एक्सर्साइस करना था ।  एक एक चीज़ें याद आने लगी .... हालाँकि उन यादों से मै  अपना पीछा छुडाना चाहती थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका । समय चाहे कितनी भी धुल की परतें चढ़ा दे लेकिन यादें कभी मिटती नहीं .....       
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