Monday, December 17, 2012

बुरा स्वप्न

आँखों की पुतली में हरकत 
एक आस 
शायद अभी खुलेंगी आँखें 
और हम पुनः जुट जाएंगे
इशारों को  समझने में 
लेकिन 
पलकें मूँद गयी 
स्थिर हो गयी पुतलियाँ 
धडकनें थम गयी 
चेहरे पर असीम शान्ति 
हथेलियों की गर्माहट घटने लगी 
क्षण भर में 
बर्फ हो गयी हथेलियाँ 
हर तरफ सिसकियाँ 
लेकिन मैं गुम थी 
विचारों के 
उथल पुथल में -
मृत्यु इतनी शीतल है 
फिर 
गर्म - खारे पानी का ये सैलाब क्यों 
जब मृत्यु इतनी शांत है 
फिर क्यों जूझना 
भावनाओं के तूफ़ान से 
मृत्यु तो सबसे बड़ा सच है 
फिर झूठी ज़िन्दगी से मोह क्यों ??    




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Thursday, July 19, 2012

मैनेज करने का गुण


हमारे देश में ज़्यादातर महिलाओं को मैनज करने में महारत हासिल है. चाहे गाँव हो या शहर, रसोई हो या घर हर जगह उनका  मैनजमेंट सफल होता है.   कल  ही हमारी कामवाली बता रही थी की कैसे बड़ी बेटी के जन्म के  समय उसके पास खाने क लिए कुछ नहीं होता था बावजूद इसके वो पल गयी और आज वो तेरह साल की है, ये भी तो एक तरह का मैनेज करना ही है .  
कुछ ऐसा ही  दिल्ली  मेट्रो में भी देखने को मिलता है खासतौर पर महिलाओं क डब्बे में, हमें लगता है मैनेज करने का उस से बड़ा उदाहरण कोई हो नहीं सकता. डिब्बे में तिल रखने की जगह नहीं होती पर धन्य है इस कोच में सफ़र करने वाली महिलाएं पैर रखने की जगह बना ही लेती है और फिर अगले स्टेशन पर और महिलाओं के अन्दर आने का रास्ता भी बना लेती है. भले अन्दर एयर कंडीशंड कोच में भी घुटन होने लगे... खुशबु और बदबू के मिले जुले स्वरुप से उबकाई आने लगे , लेकिन मैनेज करने में कोई कमी नहीं. कभी कभी तो ऐसा लगता है की कोच में महिलाएं नहीं बल्कि गेहू की बोरियां है जिन्हें ज्यादा से ज्यादा अटाने के लिए मैनेज किया जा रहा है. धन्य है ये मैनेज का गुण, जो यहाँ जन्मजात मिल जाता है.    

व्यंग्य, मैनेज करने का गुण
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Friday, February 24, 2012

घट रही संख्या बेटियों की



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Tuesday, January 24, 2012

भागम भाग

सभी भाग रहे हैं कोई मेट्रो के लिए भाग रहा है, कोई मेट्रो में सीट पाने के लिए भाग रहा है... कोई मेट्रो बदलने के लिए भाग रहा है... सभी भाग रहे हैं. कोई बस के लिए, तो कोई ऑटो के लिए तो कोई रिक्शा के लिए, भाग सभी रहे है. हर तरफ भागम भाग ... ऐसा लगता है की सबके अन्दर एक डर है की कही उन्होंने भागना बंद किया तो वे पिछड़ जायेंगे. मै भी उन में से ही एक हूँ... मै भी भाग रही हूँ... ये बात और है की मै रूकना चाहती हूँ... थम जाना चाहती हूँ , लेकिन ये भी एक कटु सच है की अब रूकना संभव नहीं, बस भागते जाना है. अब तो बस इस भागम भाग में ही खुशी ढूँढनी है