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Showing posts from September 4, 2011

नो पर्सोनल क्वेश्चन प्लीज़

प्रवासी भारतीय सम्मलेन के दौरान मेरी मुलाक़ात अमेरिका में वकालत कर रही एक महिला से हुई. हालांकि वे रहनेवाली भारत की ही थी लेकिन दस साल पहले वे अमेरिका में बस गयी . उनसे हमनें बहुत सी बातें की कुछ उनके कार्यों के बारे में कुछ भारत और अमेरिका की कार्यप्रणाली में अंतर को लेकर... ऐसी ही ढेरों बातें हुई. उन्होंने भी बड़ी ही जिंदादिली से सभी प्रश्नों का जवाब दिया. हालाँकि यहाँ की अव्यवस्था से वो थोड़ी क्षुब्ध ज़रूर नज़र आई.... लेकिन हमारी बातें चलती रही. तभी एक और सज्जन आये और हमारी बातचीत में शामिल हो गए . वे भी भारत भ्रमण पर ही थे ... नमस्ते के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ . बातें होती रही तभी महाशय ने महिला वकील से पूछा की आपकी शादी हो चुकी है उन्होंने कहा हां... फिर महाशय ने पूछा की पतिदेव क्या करते हैं... महिला का जवाब था " क्या मैंने आपसे आपकी पत्नी के बारे में पूछा ... नहीं ना , फिर आपको क्यों इतनी जिज्ञासा है मेरे पति को लेकर और मैं क्यों बताऊँ की मेरे पति क्या करते हैं." ये सारी बातें उन्होंने चेहरे पर मुस्कराहट के साथ कही.... वो साहब का चेहरा देखने लायक था. बस दो मिनट…

बूंदों की स्वरलहरी

बारिश की बूंदों में सबकुछ धुल गया... सारी चिंताएं... सारी फिक्र. कभी कभी मन करता है की बस भीगती रहूँ... बिना कुछ सोचे, बिना किसी की परवाह किये. बिलकुल उन्मुक्त ... जैसे आज सुबह बारिश में बच्चे भीग रहे थे.... बस वैसे ही... कुछ नहीं सिर्फ मैं और बारिश की बूँदें . अक्सर बरसातों में मैं चुपचाप बूंदों को निहारती रहती हूँ...बूंदों की स्वरलहरी, बीच बीच में बादलों की गर्जन मानो कोई संगीत पैदा कर रहे हो... या फिर बूँदें किसी जिद्दी बच्चे की तरह स्कूल बंक कर भाग रही हो और बादल हेडमास्टर की तरह गुस्से से गरज रहा हो ....और... और बिजली रानी टीचर की तरह आँखें दिखा कर बच्चों को डरा रही हो रही. इन बूंदों को देखते हुए न जाने ऐसी कितनी कल्पनाएँ मेरे दिलोदिमाग को रोमांचित और आह्लादित कर देती हैं.जाने क्यों भीगना मुझे बचपन से ही बेहद पसंद है.... हाँ अगर हाथों में चाय की प्याली हो तो फिर बारिश और भी अच्छी लगती है. आज बहुत दिनों बाद मुझे दिल्ली भली लगी . बिलकुल धुली धुली सी दिल्ली... और मैंने आरा को बिलकुल याद नहीं किया.






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