Saturday, September 5, 2009

शिक्षक दिवस पर मिली अच्छी सीख

सुबह १० बजे ऑफिस के लिए निकली... देर हो चुकी थी....सामने भीड़ से भरी हुई लो फ्लोर बस दिखी । दिल्ली में तीन साल बिताने के बाद अब मुझे आदत हो चुकी है भीड़ वाली बसों में चढ़ने की .... आगे खड़े होने के बाद भी किसी भी अजनबी या यूँ कहें सहयात्रियों से कह कर पैसे पास करने की और फ़िर कही भी खड़े या बैठ कर भी टीकट लेने की ... जी हाँ हर परिस्थितियों में सफर करने की आदत हो चुकी है। आसानी से... बगैर किसी जान पहचान के अपना बोझा दूसरे के गोद में डाल देना यहाँ के लोगों की खासियत है। लेकिन आज जो कुछ भी हुआ उसने हर अजनबियों पर विश्वास ना करने की सीख ज़रूर दे दी।
बस में काफ़ी भीड़ थी... मैं आगे महिलाओं वाली सीट के पास जाकर खड़ी हो गई। पर्स से पैसे निकाल कर टिकट के लिए आगे एक सज्जन को पास कर दी ... उन्होंने भीड़ में ही आगे एक दूसरे बन्दे को, जो कंडक्टर के करीब खड़ा था, पैसे पास कर दिया । पाँच मिनट गुज़र गए ... दस मिनट ...दो स्टाप भी आया और चला गया । मैंने उन सज्जन से पूछा- क्या हुआ? उन्हें ख़ुद नही पता था ... फ़िर उन्होंने इधर - उधर देखा और पता चला की जिसे उन्होंने पैसे दिए थे वो बन्दा ही गायब है यानी किसी स्टाप पर वो पैसे के साथ उतर गया। मुझे समझ नही आ रहा था की मैं क्या करुँ। तभी वो सज्जन जिन्हें मैंने पैसा दिया था अपने पॉकेट से पैसे निकाल कर टिकट के लिए दे दिए .... मेरे लाख मना करने पर भी वे नही माने ... मै उन्हें पैसे देती रही पर वे नही लिए। मैंने उनसे ये भी कहा की लॉस तो मेरा होना था फ़िर आप क्यों अपने पॉकेट से दे रहे हैं ... पर वो नही माने।
उसके बाद तो बस में इसी घटना की चर्चा होती रही। बाद में आने वाले जितने यात्री थे वे किसी को भी पैसा पास कर रहे थे ...वो लेने से इनकार कर दे रहा था ... सभी सबको सलाह दे रहे थे की अपना टिकट ख़ुद लो ।
चाहे जिस कारन से भी पैसे लेकर वो बन्दा चला गया हो लेकिन उसने वहां मौजूद हर व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर से विश्वास उठा दिया... वही वो सज्जन जिन्होंने इस घटना की मौन रूप से नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पॉकेट से पैसे दे दिए... ये अहसास दिलाते हैं की अच्छाई और सच्चाई इस दुनिया में अभी भी बरक़रार है।

8 comments:

bhawna said...

...........ab ye hum par hai ki hum kise follow karte hain ,practically(badmashi !?) jo utar gaya ya emotionally(basically we all r emotional )jisne natik jimmedari samjhi ?

महेन्द्र मिश्र said...

समस्त गुरुओ को नमन और प्रणाम

राजीव तनेजा said...

इस दुनिया में हर तरह के लोग बसते हैँ

Mithilesh dubey said...

बहुत सही लिखा है आपने कि इस संसार मे अच्छे व बुरे दोनो प्रकार के लोग होते है। किसी एक को मानकर सभी को सही या बुरा नही माना जा सकता है।

बाल पत्रिका आईना said...

abhi mere jaise log hai priyambara jeeeeeeeee

मीत said...

ये दुनिया रंगबिरंगी....
पर आप अपने विशवास को कायम रखिये प्रिय कहीं ऐसा ना हो इस अविश्वास के चक्कर में पढ़ कर आप इमानदार पर भी विशवास ना करें...
हो सकता है की उसे उन पैसों की ज्यादा जरुरत हो...
मीत

डिम्पल said...

aap ki 3 post padhi..baki fir kabhi..achhe sansmaran hai...keep writing

Anonymous said...

अब भी मिलते हैं लोग मुझ जैसे, हाँ,शरीफ़ों का अब भी अकाल नहीं

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